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वास्तु और सुखी गृहस्थ जीवन 

पति पत्नी के सुखी जीवन के लिये वास्तु की उपयोगिता

आज के भौतिक संसार में मनुष्य अध्यात्म को छोड़कर भौतिक सुखों के पीछे भाग रहा है। समय के अभाव ने उसे रिश्तों के प्रति उदासीन बना दिया है। किंतु आज भी मनुष्य अपने घर में संसार के सारे सुखों को भोगना चाहता है। इसके लिए हमें वैवाहिक जीवन को वास्तु से जोड़ना होगा। वास्तव में हम ऐसा क्या करें कि पति-पत्नी के बीच अहंकार की जगह प्रेम, प्रतियोगिता के स्थान पर सानिध्य मिले।

यद्यपि गृहस्थ जीवन में या व्याहारिक जीवन में कोई भी छोटा सा कारण एक बड़े कारण में परिवर्तित हो जाता है। चाहे वह आर्थिक हो या घर के अन्य सदस्यों को लेकर हो। इसका सीधा प्रभाव पति-पत्नी के आपसी संबंधों पर पड़ता है। इसलिए घर का वातावरण ऐसा होना चाहिए कि ऋणात्मक शक्तियां कम तथा सकारात्मक शक्तियां अधिक क्रियाशील हों। यह सब वास्तु के द्वारा ही संभव हो सकता है।

घर के ईशान कोण का बहुत ही महत्व है। यदि पति-पत्नी साथ बैठकर पूजा करें तो उनका आपस का अहंकार खत्म होकर संबंधों में मधुरता बढ़ेगी। गृहलक्ष्मी द्वारा संध्या के समय तुलसी में दीपक जलाने से नकारात्मक शक्तियों को कम किया जा सकता है। घर के हर कमरे के ईशान कोण को साफ रखें, विशेषकर शयनकक्ष के।

पति-पत्नी में आपस में वैमनस्यता का एक कारण सही दिशा में शयनकक्ष का न होना भी है। अगर दक्षिण-पश्चिम दिशाओं में स्थित कोने में बने कमरों में आपकी आवास व्यवस्था नहीं है तो प्रेम संबंध अच्छे के बजाए, कटुता भरे हो जाते हैं।

शयनकक्ष के लिए दक्षिण दिशा निर्धारित करने का कारण यह है कि इस दिशा का स्वामी यम, शक्ति एवं विश्रामदायक है। घर में आराम से सोने के लिए दक्षिण एवं नैऋत्य कोण उपयुक्त है। शयनकक्ष में पति-पत्नी का सामान्य फोटो होने के बजाए हंसता हुआ हो, तो वास्तु के अनुसार उचित रहता है।

घर के अंदर उत्तर-पूर्व दिशाओं के कोने के कक्ष में अगर शौचालय है तो पति-पत्नी का जीवन बड़ा अशांत रहता है। आर्थिक संकट व संतान सुख में कमी आती है। इसलिए शौचालय हटा देना ही उचित है। अगर हटाना संभव न हो तो शीशे के एक बर्तन में समुद्री नमक रखें। यह अगर सील जाए तो बदल दें। अगर यह संभव न हो तो मिट्टी के एक बर्तन में सेंधा नमक डालकर रखें।

घर के अंदर यदि रसोई सही दिशा में नहीं है तो ऐसी अवस्था में पति-पत्नी के विचार कभी नहीं मिलेंगे। रिश्तों में कड़वाहट दिनों-दिन बढ़ेगी। कारण अग्नि का कहीं ओर जलना। रसोई घर की सही दिशा है आग्नेय कोण। अगर आग्नेय दिशा में संभव नहीं है तो अन्य वैकल्पिक दिशाएं हैं। आग्नेय एवं दक्षिण के बीच, आग्नेय एवं पूर्व के बीच, वायव्य एवं उत्तर के बीच।

अत: यदि हम अपने वैवाहिक जीवन को सुखद एवं समृद्ध बनाना चाहते हैं और अपेक्षा करते हैं कि जीवन के सुंदर स्वप्न को साकार कर सकें। इसके लिए पूर्ण निष्ठा एवं श्रद्धा से वास्तु के उपायों को अपनाकर अपने जीवन में खुशहाली लाएं।

बिना तोड़-फोड़ के वास्तु दोष दूर करने के उपाय

एक सुंदर एवं दोषमुक्त घर हर व्यक्ति की कामना होती है। किंतु वास्तु विज्ञान के पर्याप्त ज्ञान के अभाव में भवन निर्माण में कुछ अशुभ तत्वों तथा वास्तु दोषों का समावेश हो जाता है। फलतः गृहस्वामी को विभिन्न आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक कष्टों का सामना करना पड़ता है। घर के निर्माण के बाद फिर से उसे तोड़कर दोषों को दूर करना कठिन होता है। ऐसे में हमारे ऋषि-मुनियों ने बिना तोड़-फोड़ किए इन दोषों को दूर करने के कुछ उपाय बताए हैं। उन्होंने प्रकृति की अनमोल देन सूर्य की किरणों, हवा और पृथ्वी की चुंबकीय शक्ति आदि के उचित उपयोग की सलाह दी है। यहां वास्तु दोषों के निवारण के निमित्त कुछ उपाय प्रस्तुत हैं जिन्हें अपना कर विभिन्न दिशाओं से जुड़े दोषों को दूर किया जा सकता है।

 

ईशान दिशा

 

  • यदि ईशान क्षेत्र की उत्तरी या पूर्वी दीवार कटी हो, तो उस कटे हुए भाग पर एक बड़ा शीशा लगाएं। इससे भवन का ईशान क्षेत्र प्रतीकात्मक रूप से बढ़ जाता है।

     

  • यदि ईशान कटा हो अथवा किसी अन्य कोण की दिशा बढ़ी हो, तो किसी साधु पुरुष अथवा अपने गुरु या बृहस्पति ग्रह या फिर ब्रह्मा जी का कोई चित्र अथवा मूर्ति या कोई अन्य प्रतीक चिह्न ईशान में रखें। गुरु की सेवा करना सर्वोत्तम उपाय है। बृहस्पति ईशान के स्वामी और देवताओं के गुरु हैं। कटे ईशान के दुष्प्रभाव को कम करने के लिए साधु पुरुषों को बेसन की बनी बर्फी या लड्डुओं का प्रसाद बांटना चाहिए।

     

  • यह क्षेत्र जलकुंड, कुआं अथवा पेयजल के किसी अन्य स्रोत हेतु सर्वोत्तम स्थान है। यदि यहां जल हो, तो चीनी मिट्टी के एक पात्र में जल और तुलसीदल या  फिर गुलदस्ता अथवा एक पात्र में फूलों की पंखुड़ियां और जल रखें। शुभ फल की प्राप्ति के लिए इस जल और फूलों को नित्य प्रति बदलते रहें।

     

  • अपने शयन कक्ष की ईशान दिशा की दीवार पर भोजन की तलाश में उड़ते शुभ पक्षियों का एक सुंदर चित्र लगाएं। कमाने हेतु बाहर निकलने से हिचकने वाले लोगों पर इसका चमत्कारी प्रभाव होता है। यह अकर्मण्य लोगों में नवीन उत्साह और ऊर्जा का संचार करता है।

     

  • बर्फ से ढके कैलाश पर्वत पर ध्यानस्थ योगी की मुद्रा में बैठे महादेव शिव का ऐसा फोटो, चित्र अथवा मूर्ति स्थापित करें, जिसमें उनके भाल पर चंद्रमा हो और लंबी जटाओं से गंगा जी निकल रही हों।

     

  • ईशान में विधिपूर्वक बृहस्पति यंत्र की स्थापना करें।

     

पूर्व दिशा

 

  • यदि पूर्व की दिशा कटी हो, तो पूर्वी दीवार पर एक बड़ा शीशा लगाएं। इससे भवन के पूर्वी क्षेत्र में प्रतीकात्मक वृद्धि होती है।

     

  • पूर्व की दिशा के कटे होने की स्थिति में  वहां सात घोड़ों के रथ पर सवार भगवान सूर्य देव की एक तस्वीर, मूर्ति अथवा चिह्न रखें।

     

  • सूर्योदय के समय सूर्य भगवान को जल का अर्य दें। अर्य देते समय गायत्री मंत्र का सात बार जप करें। पुरूष अपने पिता और स्त्री अपने स्वामी की सेवा करें।

     

  • प्रत्येक कक्ष के पूर्व में प्रातःकालीन सूर्य की प्रथम किरणों के प्रवेश हेतु एक खिड़की होनी चाहिए। यदि ऐसा संभव नहीं हो, तो उस भाग में सुनहरी या पीली रोशनी देने वाला बल्ब जलाएं।

     

  • पूर्व में लाल, सुनहरे और पीले रंग का प्रयोग करें। पूर्वी क्षेत्र में मिट्टी खोदकर जलकुंड बनाएं और उसमें लाल कमल उगाएं अथवा पूर्वी बगीचे में लाल गुलाब रोपें।

     

  • अपने शयन कक्ष की पूर्वी दीवार पर उदय होते हुए सूर्य की ओर पंक्तिबद्ध उड़ते हुए हंस, तोता, मोर आदि अथवा भोजन की तलाश में अपना घोंसला छोड़ने को तैयार शुभ पक्षियों का चित्र लगाएं। अकर्मण्य और कमाने हेतु बाहर जाने से हिचकने वाले व्यक्तियों के लिए यह जादुई छड़ी के समान काम करता है।

     

  • बंदरों को गुड़ और भुने चने खिलाएं।

     

  • पूर्व में सूर्य यंत्र की स्थापना विधि विधान पूर्वक करें।

     

आग्नेय दिश

 

  • यदि आग्नेय कोण पूर्व दिशा में बढ़ा हो, तो इसे काटकर वर्गाकार या आयताकार बनाएं।

     

  • शुद्ध बालू और मिट्टी से आग्नेय क्षेत्र के सभी गड्ढे इस प्रकार भर दें कि यह क्षेत्र ईशान और वायव्य से ऊंचा लेकिन नैर्ऋत्य से नीचा रहे।

     

  • यदि आग्नेय किसी भी प्रकार से कटा हो अथवा पर्याप्त रूप से खुला न हो, तो इस दिशा में लाल रंग का एक दीपक या बल्ब अग्नि देवता के सम्मान में   कार्य करते समय कम से कम एक प्रहर (तीन घंटे) तक जलाए रखें।

  • यदि आग्नेय कटा हो, तो इस दिशा में अग्नि देव की एक तस्वीर, मूर्ति या संकेत चिह्न रखें। गणेश जी की तस्वीर या मूर्ति रखने से भी उक्त दोष दूर होता है। अग्नि देव की स्तुति में ऋग्वेद में उल्लिखित पवित्र मंत्रों का उच्चारण करें।

     

  • आग्नेय कोण में दोष होने पर वहां भोजन में प्रयोग होने वाले फल, सब्जियां (सूर्यमुखी, पालक, तुलसी, गाजर आदि) और अदरक मिर्च, मेथी, हल्दी, पुदीना, कढ़+ी पत्ता आदि उगाएं अथवा मनीप्लांट लगाएं।

     

  • आग्नेय दिशा से आने वाली सूर्य किरणों को रोकने वाले सभी पेड़ों को हटाएं। इस दिशा में ऊंचे पेड़ न लगाएं

     

  • आग्नेय का स्वामी ग्रह शुक्र दाम्पत्य संबंधों का कारक है। अतः इस दिशा के दोषों को दूर करने के लिए अपने जीवनसाथी के प्रति प्रेम और आदर भाव रखें।

     

  • घर की स्त्रियों को नए रेश्मी परिधान, सौंदर्य प्रसाधन, सामग्री, सजावट के सामान और गहने आदि देकर हमेशा खुश रखें। यह सर्वोत्तम उपाय है।

     

  • प्रत्येक शुक्रवार को गाय को गेहूं का  आटा, चीनी और दही से बने पेड़े खिलाएं। प्रतिदिन रसोई में बनने वाली पहली रोटी गाय को खिलाएं। दोषयुक्त आग्नेय में गाय-बछड़े की सफेद संगमरमर से बनी मूर्ति या तस्वीर इतनी ऊंचाई पर लगाएं कि वह आसानी से दिखाई दे।

     

  • आग्नेय में शुक्र यंत्र की स्थापना विधिपूर्वक करें।

     

दक्षिण दिशा

 

  • यदि दक्षिणी क्षेत्र बढ़ा हो, तो उसे काटकर शेष क्षेत्र को वर्गाकार या आयताकार बनाएं। कटे भाग का विभिन्न प्रकार से उपयोग किया जा सकता है।

     

  • यदि दक्षिण में भवन की ऊंचाई के बराबर या उससे अधिक खुला क्षेत्र हो, तो ऊंचे पेड़ या घनी झाड़ियां उगाएं।

     

  • इस दिशा में कंक्रीट के बड़े और भारी गमलों में घर में रखने योग्य भारी प्रकृति के पौधे लगाएं।

     

  • यमराज अथवा मंगल ग्रह के मंत्रों का पाठ करें।

     

  • इस दिशा के स्वामी मंगल को प्रसन्न करने के लिए घर के बाहर लाल रंग का प्रयोग करें। दक्षिण दिशा के दोष अग्नि के सावधानीपूर्वक उपयोग और अग्नि तत्व प्रधान लोगों के प्रति उचित आदर भाव से दूर किए जा सकते हैंं।

     

  •  इस क्षेत्र की दक्षिणी दीवार पर हनुमान जी का लाल रंग का चित्र लगाएं।

     

  •  दक्षिण दिशा में विधिपूर्वक मंगल यंत्र की स्थापना करें।

     

नैर्ऋत्य दिशा

 

  • नैर्ऋत्य दिशा के बढ़े होने से असहनीय परेशानियां पैदा होती हैं। यदि यह क्षेत्र किसी भी प्रकार से बढ़ा हो, तो इसे वर्गाकार या आयताकार बनाएं।

     

  • रॉक गार्डन बनाने अथवा भारी मूर्तियां रखने हेतु नैर्ऋत्य सर्वोत्तम है। यदि यह क्षेत्र नैसर्गिक रूप से ऊंचा या टीलेनुमा हो या इस दिशा में ऊंचे भवन    अथवा पर्वत हों, तो इस ऊंची उठी जगह को ज्यों का त्यों छोड़ दें।

     

  • यदि नैर्ऋत्य दिशा में भवन की ऊंचाई के बराबर अथवा अधिक खुला क्षेत्र हो, तो यहां ऊंचे पेड़ या घनी झाड़ियां लगाएं। इसके अतिरिक्त घर के भीतर कंक्रीट के गमलों में भारी पेड़ पौधे लगाएं।

     

  • इस दिशा में भूतल पर अथवा ऊंचाई पर पानी का फव्वारा बनाएं।

     

  • राहु के मंत्रों का जप स्वयं करें अथवा किसी योग्य ब्राह्मण से कराएं।

     

  • श्राद्धकर्म का विधिपूर्वक संपादन कर अपने पूर्वजों की आत्माओं को तुष्ट करें। इस क्षेत्र की दक्षिणी दीवार पर मृत सदस्यों की एक तस्वीर लगाएं जिस पर पुष्पदम टंगी हों।

     

  • मिथ्याचारी, अनैतिक, क्रोधी अथवा समाज विरोधी लोगों से मित्रता न करें। वाणी पर नियंत्रण रखें

     

  • तांबे, चांदी, सोने अथवा स्टील से निर्मित सिक्के या नाग-नागिन के जोड़े की प्रार्थना कर उसे नैर्ऋत्य दिशा में दबा दें।

     

  • नैर्ऋत्य दिशा में राहु यंत्र की स्थापना विधिपूर्वक करें।

     

पश्चिम दिशा

 

  • यदि पश्चिम दिशा बढ़ी हुई हो, तो उसे काटकर वर्गाकार या आयताकार बनाएं।

     

  • यदि इस दिशा में भवन की ऊंचाई के बराबर या अधिक दूरी तक का  क्षेत्र खुला हो, तो वहां ऊंचे वृक्ष या घनी झाड़ियां लगाएं। इसके अतिरिक्त इस  दिशा में घर के पास बगीचे में लगाए जाने वाले सजावटी पेड़-पौधे जैसे इंडोर पाम, रबड़ प्लांट या अंबे्रला ट्री कंक्रीट के बड़े व भारी गमलों में लगा सकते हैं।

     

  • भूतल पर बहते पानी का स्रोत अथवा पानी का फव्वारा भी लगा सकते हैं।

     

  • पद्म पुराण में उल्लिखित नील शनि स्तोत्र अथवा शनि के किसी अन्य मंत्र का जप और दिशाधिपति वरुण की प्रार्थना करें।

     

  • सूर्यास्त के समय प्रार्थना के अलावा कोई भी अन्य शुभ कार्य न करें।

     

  • पश्चिम दिशा में शनि यंत्र की स्थापना विधिपूर्वक करें।

     

वायव्य दिशा

 

  • यदि वायव्य दिशा का भाग बढ़ा हुआ हो, तो उसे वर्गाकार या आयताकार बनाएं अथवा ईशान को बढ़ाएं।

     

  • यदि यह भाग घटा हो तो वहां मारुतिदेव की एक तस्वीर, मूर्ति या संकेत चिह्न लगाएं। हनुमान जी की तस्वीर या मूर्ति भी लगाई जा सकती है। इसके   अतिरिक्त पूर्णिमा के चंद्र की एक तस्वीर या चित्र भी लगाएं, दोषों से रक्षा होगी।

     

  • वायुदेव अथवा चंद्र के मंत्रों का जप तथा हनुमान चालीसा का पाठ श्रद्धापूर्वक करें।

     

  • पूर्णिमा की रात खाने की चीजों पर पहले चांद की किरणों को पड़ने दें और फिर उनका सवेन करें।

     

  • निर्मित भवन से बाहर खुला स्थान हो, तो वहां ऐसे वृक्ष लगाएं, जिनके मोटे चमचमाते पत्ते वायु में नृत्य करते हों।

     

  • वायव्य दिशा में बने कमरे में ताजे फूलों का गुलदस्ता रखें।

     

  • इस दिशा में एक छोटा फव्वारा या एक्वेरियम (मछलीघर) स्थापित करें।

     

  • अपनी मां का यथासंभव आदर करें, सुबह उठकर उनके चरण छूकर उनका आशीर्वाद लें और शुभ अवसरों पर उन्हें खीर खिलाएं।

     

  • प्रतिदिन सुबह, खासकर सोमवार को, गंगाजल में कच्चा दूध मिलाकर शिवलिंग पर चढ़ाएं और शिव चालीसा का पाठ श्रद्धापूर्वक करें।

     

  • वायव्य दिशा में प्राण-प्रतिष्ठित मारुति यंत्र एवं चंद्र यंत्र की स्थापना करें।

     

उत्तर दिशा

 

  • यदि उत्तर दिशा का भाग कटा हो, तो उत्तरी दीवार पर एक बड़ा आदमकद शीशा लगाएं।

     

  • यदि उत्तर का भाग घटा हो, तो इस दिशा में देवी लक्ष्मी अथवा चंद्र का फोटो, मूर्ति अथवा कोई संकेत चिह्न लगाएं। लक्ष्मी देवी चित्र में कमलासन पर

    विराजमान हों और स्वर्ण मुद्राएं गिरा रही हों।

 

  • विद्यार्थियों और संन्यासियों को उनके उपयुक्त अध्ययन सामग्री का दान देकर सहायता करें। उत्तर दिशा के स्वामी बुध से अध्ययन सामग्री का विचार किया जाता है।

     

  • दिशा में हल्के हरे रंग का पेंट करवाएं।

     

  • उत्तर क्षेत्र की उत्तरी दीवार पर तोतों का चित्र लगाएं। यह पढ़ाई में कमजोर बच्चों के लिए जादू का काम करता है।

     

  • इस दिशा में बुध यंत्र की स्थापना विधिपूर्वक करें। इसके अतिरिक्त कुबेर यंत्र अथवा लक्ष्मी यंत्र की  प्राण-प्रतिष्ठा कर स्थापित करें।

     

  • इस तरह ऊपर वर्णित ये सारे उपाय सहज व सरल हैं जिन्हें अपनाकर  जीवन को सुखमय किया जा सकता है।

 

लक्ष्मी आगमन के विशेष वास्तु उपचार l MONEY & VASTU

लक्ष्मी आगमन के विशेष वास्तु उपचार

 
 

वास्तु शास्त्र का आधार प्रकृति है। आकाश, अग्नि, जल, वायु एवं पृथ्वी इन पांच तत्वों को वास्तु-शास्त्र में पंचमहाभूत कहा गया है। शैनागम एवं अन्य दर्शन साहित्य में भी इन्हीं पंच तत्वों की प्रमुखता है। अरस्तु ने भी चार तत्वों की कल्पना की है। चीनी फेंगशुई में केवल दो तत्वों की प्रधानता है- वायु एवं जल की। वस्तुतः ये पंचतत्व सनातन हैं। ये मनुष्य ही नहीं बल्कि संपूर्ण चराचर जगत पर प्रभाव डालते हैं। वास्तु शास्त्र प्रकृति के साथ सामंजस्य एवं समरसता रखकर भवन निर्माण के सिद्धांतों का प्रतिपादन करता है। ये सिद्धांत मनुष्य जीवन से गहरे जुड़े हैं।

 

अथर्ववेद में कहा गया है-

 

पन्चवाहि वहत्यग्रमेशां प्रष्टयो युक्ता अनु सवहन्त।

 

अयातमस्य दस्ये नयातं पर नेदियोवर दवीय ॥ 10 /8

 

सृष्टिकर्ता परमेश्वर पृथ्वी, जल, तेज (अग्नि), प्रकाश, वायु व आकाश को रचकर, उन्हें संतुलित रखकर संसार को नियमपूर्वक चलाते हैं। मननशील विद्वान लोग उन्हें अपने भीतर जानकर संतुलित हो प्रबल प्रशस्त रहते हैं। इन्हीं पांच संतुलित तत्वों से निवास गृह व कार्य गृह आदि का वातावरण तथा वास्तु शुद्ध व संतुलित होता है, तब प्राणी की प्रगति होती है।

 

ऋग्वेद में कहा गया है-

 

ये आस्ते पश्त चरति यश्च पश्यति नो जनः।

 

तेषां सं हन्मो अक्षणि यथेदं हर्म्थ तथा।

 

प्रोस्ठेशया वहनेशया नारीर्यास्तल्पशीवरीः।

 

स्त्रिायो या : पुण्यगन्धास्ता सर्वाः स्वायपा मसि !!

 

हे गृहस्थ जनो ! गृह निर्माण इस प्रकार का हो कि सूर्य का प्रकाश सब दिशाओं से आए तथा सब प्रकार से ऋतु अनुकूल हो, ताकि परिवार स्वस्थ रहे। राह चलता राहगीर भी अंदर न झांक पाए, न ही गृह में वास करने वाले बाहर वालों को देख पाएं। ऐसे उत्तम गृह में गृहिणी की निज संतान उत्तम ही उत्तम होती है।

 

वास्तु शास्त्र तथा वास्तु कला का वैज्ञानिक और आध्यात्मिक आधार वेद और उपवेद हैं। भारतीय वाड्.मय में आधिभौतिक वास्तुकला (आर्किटेक्चर) तथा वास्तु-शास्त्र का जितना उच्चकोटि का विस्तृत विवरण ऋग्वेद, अथर्ववेद, यजुर्वेद में उपलब्ध है, उतना अन्य किसी साहित्य में नहीं।

 

गृह के मुख्य द्वार को गृहमुख माना जाता है। इसका वास्तु शास्त्र में विशेष महत्व है। यह परिवार व गृहस्वामी की शालीनता, समृद्धि व विद्वत्ता दर्शाता है। इसलिए मुख्य द्वार को हमेशा बाकी द्वारों की अपेक्षा बड़ा व सुसज्जित रखने की प्रथा रही है। पौराणिक भारतीय संस्कृति के अनुसार इसे कलश, नारियल व पुष्प, केले के पत्र या स्वास्तिक आदि से अथवा उनके चित्रों से सुसज्जित करना चाहिए।

 

मुख्य द्वार चार भुजाओं की चौखट वाला हो। इसे दहलीज भी कहते हैं। इससे निवास में गंदगी भी कम आती है तथा नकारात्मक ऊर्जाएं प्रवेश नहीं कर पातीं। प्रातः घर का जो भी व्यक्ति मुख्य द्वार खोले, उसे सर्वप्रथम दहलीज पर जल छिड़कना चाहिए, ताकि रात में वहां एकत्रित दूषित ऊर्जाएं  घुलकर बह जाएं और गृह में प्रवेश न कर पाएं।

 

गृहिणी को चाहिए कि वह प्रातः सर्वप्रथम घर की साफ-सफाई करे या कराए। तत्पश्चात स्वयं नहा-धोकर मुख्य प्रवेश द्वार के बाहर एकदम सामने स्थल पर सामर्थ्य के अनुसार रंगोली बनाए। यह भी नकारात्मक ऊर्जाओं को रोकती है। मुख्य प्रवेश द्वार के ऊपर केसरिया रंग से ९ग९ परिमाण का स्वास्तिक बनाकर लगाएं। मुख्य प्रवेश द्वार को हरे व पीले रंग से रंगना वास्तुसम्मत होता है।

 

खाना बनाना शुरू करने से पहले पाकशाला का साफ होना अति आवश्यक है। रोसोईये को चाहिए कि मंत्र पाठ से ईश्वर को याद करे और कहे कि मेरे हाथ से बना खाना स्वादिष्ट तथा सभी के लिए स्वास्थ्यवर्द्धक हो। पहली चपाती गाय के, दूसरी पक्षियों के तथा तीसरी कुत्ते के निमित्त बनाए। तदुपरांत परविार का भोजन आदि बनाए।

 

विशेष वास्तु उपचार

 

  • निवास गृह या कार्यालय में शुद्ध ऊर्जा के संचार हेतु  प्रातः व सायं शंख-ध्वनि करें। गुग्गुल युक्त धूप व अगरवत्ती प्रज्वलित करें तथा क्क का उच्चारण करते हुए समस्त गृह में धूम्र को घुमाएं।

     

  • प्रातः काल सूर्य को अर्य देकर सूर्य नमस्कार अवश्य करें।

     

  • यदि परिवार के सदस्यों का स्वास्थ्य अनुकूल रहेगा, तो गृह का स्वास्थ्य भी ठीक रहेगा। ध्यान रखें, आईने व झरोखों के शीशों पर धूल नहीं रहे। उन्हें प्रतिदिन साफ रखें। गृह की उत्तर दिशा में विभूषक फव्वारा या मछली कुंड रखें। इससे परिवार में समृद्धि की वृद्धि होती है।


वास्तु दोष निवारण के कुछ सरल उपाय

 
 

कभी-कभी दोषों का निवारण वास्तुशास्त्रीय ढंग से करना कठिन हो जाता है। ऐसे में  दिनचर्या के कुछ सामान्य नियमों का पालन करते हुए निम्नोक्त सरल उपाय कर इनका निवारण किया जा सकता है।

 

  • पूजा घर पूर्व-उत्तर (ईशान कोण) में होना चाहिए तथा पूजा यथासंभव प्रातः 06 से 08 बजे के बीच भूमि पर ऊनी आसन पर पूर्व या उत्तर की ओर मुंह करके बैठ कर ही करनी चाहिए।

  • पूजा घर के पास उत्तर-पूर्व (ईशान कोण) में सदैव जल का एक कलश भरकर रखना चाहिए। इससे घर में सपन्नता आती है। मकान के उत्तर पूर्व कोने को हमेशा खाली रखना चाहिए।

     

  • घर में कहीं भी झाड़ू को खड़ा करके नहीं रखना चाहिए। उसे पैर नहीं लगना चाहिए, न ही लांघा जाना चाहिए, अन्यथा घर में बरकत और धनागम के स्रोतों में वृद्धि नहीं होगी।

     

  • पूजाघर में तीन गणेशों की पूजा नहीं होनी चाहिए, अन्यथा घर में अशांति उत्पन्न हो सकती है। तीन माताओं तथा दो शंखों का एक साथ पूजन भी वर्जित है। धूप, आरती, दीप, पूजा अग्नि आदि को मुंह से फूंक मारकर नहीं बुझाएं। पूजा कक्ष में, धूप, अगरबत्ती व हवन कुंड हमेशा दक्षिण पूर्व में रखें।

     

  • घर में दरवाजे अपने आप खुलने व बंद होने वाले नहीं होने चाहिए। ऐसे दरवाजे अज्ञात भय पैदा करते हैं। दरवाजे खोलते तथा बंद करते समय सावधानी बरतें ताकि कर्कश आवाज नहीं हो। इससे घर में कलह होता है। इससे बचने के लिए दरवाजों पर स्टॉपर लगाएं तथा कब्जों में समय समय पर तेल डालें।

     

  • खिड़कियां खोलकर रखें, ताकि घर में रोशनी आती रहे।

     

  • घर के मुख्य द्वार पर गणपति को चढ़ाए गए सिंदूर से दायीं तरफ स्वास्तिक बनाएं।

     

  • महत्वपूर्ण कागजात हमेशा आलमारी में रखें। मुकदमे आदि से संबंधित कागजों को गल्ले, तिजोरी आदि में नहीं रखें, सारा धन मुदमेबाजी में खर्च हो     जाएगा।

     

  • घर में जूते-चप्पल इधर-उधर बिखरे हुए या उल्टे पड़े हुए नहीं हों, अन्यथा घर में अशांति होगी।

     

  • सामान्य स्थिति में संध्या के समय नहीं सोना चाहिए। रात को सोने से पूर्व कुछ समय अपने इष्टदेव का ध्यान जरूर करना चाहिए।

     

  • घर में पढ़ने वाले बच्चों का मुंह पूर्व तथा पढ़ाने वाले का उत्तर की ओर होना चाहिए।

     

  • घर के मध्य भाग में जूठे बर्तन साफ करने का स्थान नहीं बनाना चाहिए।

     

  • उत्तर-पूर्वी कोने को वायु प्रवेश हेतु खुला रखें, इससे मन और शरीर में ऊर्जा का संचार होगा।

     

  • अचल संपत्ति की सुरक्षा तथा परिवार की समृद्धि के लिए शौचालय, स्नानागार आदि दक्षिण-पश्चिम के कोने में बनाएं।

     

  • भोजन बनाते समय पहली रोटी अग्निदेव अर्पित करें या गाय खिलाएं, धनागम के स्रोत बढ़ेंगे।

     

  • पूजा-स्थान (ईशान कोण) में रोज सुबह श्री सूक्त, पुरुष सूक्त एवं हनुमान चालीसा का पाठ करें, घर में शांति  बनी रहेगी।

     

  • भवन के चारों ओर जल या गंगा जल छिड़कें।

     

  • घर के अहाते में कंटीले या जहरीले पेड़ जैसे बबूल, खेजड़ी आदि नहीं होने चाहिए, अन्यथा असुरक्षा का भय बना रहेगा।

     

  • कहीं जाने हेतु घर से रात्रि या दिन के ठीक १२ बजे न निकलें।

     

  • किसी महत्वपूर्ण काम हेतु दही खाकर या मछली का दर्शन कर घर से निकलें।

     

  • घर में या घर के बाहर नाली में पानी जमा नहीं रहने दें।

     

  • घर में मकड़ी का जाल नहीं लगने दें, अन्यथा धन की हानि होगी।

     

  • शयनकक्ष में कभी जूठे बर्तन नहीं रखें,  अन्यथा परिवार में क्लेश और धन की हानि हो सकती है।

     

  • भोजन यथासंभव आग्नेय कोण में पूर्व की ओर मुंह करके बनाना तथा पूर्व की ओर ही मुंह करके करना चाहिए।

वास्तु दोष निवारण के कुछ सरल उपाय

कभी-कभी दोषों का निवारण वास्तुशास्त्रीय ढंग से करना कठिन हो जाता है। ऐसे में  दिनचर्या के कुछ सामान्य नियमों का पालन करते हुए निम्नोक्त सरल उपाय कर इनका निवारण किया जा सकता है।

 

  • पूजा घर पूर्व-उत्तर (ईशान कोण) में होना चाहिए तथा पूजा यथासंभव प्रातः 06 से 08 बजे के बीच भूमि पर ऊनी आसन पर पूर्व या उत्तर की ओर मुंह करके बैठ कर ही करनी चाहिए।

  • पूजा घर के पास उत्तर-पूर्व (ईशान कोण) में सदैव जल का एक कलश भरकर रखना चाहिए। इससे घर में सपन्नता आती है। मकान के उत्तर पूर्व कोने को हमेशा खाली रखना चाहिए।

     

  • घर में कहीं भी झाड़ू को खड़ा करके नहीं रखना चाहिए। उसे पैर नहीं लगना चाहिए, न ही लांघा जाना चाहिए, अन्यथा घर में बरकत और धनागम के स्रोतों में वृद्धि नहीं होगी।

     

  • पूजाघर में तीन गणेशों की पूजा नहीं होनी चाहिए, अन्यथा घर में अशांति उत्पन्न हो सकती है। तीन माताओं तथा दो शंखों का एक साथ पूजन भी वर्जित है। धूप, आरती, दीप, पूजा अग्नि आदि को मुंह से फूंक मारकर नहीं बुझाएं। पूजा कक्ष में, धूप, अगरबत्ती व हवन कुंड हमेशा दक्षिण पूर्व में रखें।

     

  • घर में दरवाजे अपने आप खुलने व बंद होने वाले नहीं होने चाहिए। ऐसे दरवाजे अज्ञात भय पैदा करते हैं। दरवाजे खोलते तथा बंद करते समय सावधानी बरतें ताकि कर्कश आवाज नहीं हो। इससे घर में कलह होता है। इससे बचने के लिए दरवाजों पर स्टॉपर लगाएं तथा कब्जों में समय समय पर तेल डालें।

     

  • खिड़कियां खोलकर रखें, ताकि घर में रोशनी आती रहे।

     

  • घर के मुख्य द्वार पर गणपति को चढ़ाए गए सिंदूर से दायीं तरफ स्वास्तिक बनाएं।

     

  • महत्वपूर्ण कागजात हमेशा आलमारी में रखें। मुकदमे आदि से संबंधित कागजों को गल्ले, तिजोरी आदि में नहीं रखें, सारा धन मुदमेबाजी में खर्च हो     जाएगा।

     

  • घर में जूते-चप्पल इधर-उधर बिखरे हुए या उल्टे पड़े हुए नहीं हों, अन्यथा घर में अशांति होगी।

     

  • सामान्य स्थिति में संध्या के समय नहीं सोना चाहिए। रात को सोने से पूर्व कुछ समय अपने इष्टदेव का ध्यान जरूर करना चाहिए।

     

  • घर में पढ़ने वाले बच्चों का मुंह पूर्व तथा पढ़ाने वाले का उत्तर की ओर होना चाहिए।

     

  • घर के मध्य भाग में जूठे बर्तन साफ करने का स्थान नहीं बनाना चाहिए।

     

  • उत्तर-पूर्वी कोने को वायु प्रवेश हेतु खुला रखें, इससे मन और शरीर में ऊर्जा का संचार होगा।

     

  • अचल संपत्ति की सुरक्षा तथा परिवार की समृद्धि के लिए शौचालय, स्नानागार आदि दक्षिण-पश्चिम के कोने में बनाएं।

     

  • भोजन बनाते समय पहली रोटी अग्निदेव अर्पित करें या गाय खिलाएं, धनागम के स्रोत बढ़ेंगे।

     

  • पूजा-स्थान (ईशान कोण) में रोज सुबह श्री सूक्त, पुरुष सूक्त एवं हनुमान चालीसा का पाठ करें, घर में शांति  बनी रहेगी।

     

  • भवन के चारों ओर जल या गंगा जल छिड़कें।

     

  • घर के अहाते में कंटीले या जहरीले पेड़ जैसे बबूल, खेजड़ी आदि नहीं होने चाहिए, अन्यथा असुरक्षा का भय बना रहेगा।

     

  • कहीं जाने हेतु घर से रात्रि या दिन के ठीक १२ बजे न निकलें।

     

  • किसी महत्वपूर्ण काम हेतु दही खाकर या मछली का दर्शन कर घर से निकलें।

     

  • घर में या घर के बाहर नाली में पानी जमा नहीं रहने दें।

     

  • घर में मकड़ी का जाल नहीं लगने दें, अन्यथा धन की हानि होगी।

     

  • शयनकक्ष में कभी जूठे बर्तन नहीं रखें,  अन्यथा परिवार में क्लेश और धन की हानि हो सकती है।

     

  • भोजन यथासंभव आग्नेय कोण में पूर्व की ओर मुंह करके बनाना तथा पूर्व की ओर ही मुंह करके करना चाहिए।

वास्तुशास्त्र में कार्यालय प्रबंघन

वास्तुशास्त्र में कार्यालय प्रबंघन

किसी भी वास्तु खंड में सर्वश्रेष्ठ स्थिति दक्षिण दिशा की मानी गई है। वास्तु संबंघी किसी भी पुराने वास्तुशास्त्र में दक्षिण-पश्चिम को प्रमुख स्थान नहीं दिया गया है। प्राचीन योजनाओं में दक्षिण-पश्चिम में शस्त्रागार के लिए स्थान बताया है। लगभग सभी शास्त्रों मे वास्तु खंड में दक्षिण दिशा तथा जन्मपत्रिका में दशम भाव (दक्षिण दिशा) को सर्वश्रेष्ठ बताया गया है

 

अत: स्वामी, मैनेजिंग डायरेक्टर, चीफ एक्जीक्यूटिव ऑफिसर या स्वमी की अनुपस्थिति में कार्यालय में द्वितीय स्थान रखने वाले अघिकारी को बैठाना चाहिए। उन्हें यदि उत्तर की ओर मुंह करके बैठाया जाए तो श्रेष्ठ रहता है अन्यथा पूर्व में मुख करके भी बैठाया जा सकता है।

 

यदि गलती से मुख्य कार्यकारी अघिकारी अग्निकोण में बैठे व उसका अघीनस्थ अघिकारी दक्षिण में बैठे तो थोडे दिनों में ही दोनों का अहम टकराने लगेगा और अघीनस्थ अघिकारी अपने वरिष्ठ की आज्ञा का उल्लंघन करने की स्थिति में आ जाएगा।

 

 

इसी भांति यदि मुख्य अघिकारी उत्तर, पश्चिम या पूर्व में बैठे तथा कनिष्ठ अघिकारी दक्षिण, दक्षिण-पूर्व या दक्षिण-पश्चि में बैठे तो भी वरिष्ठतम अघिकारी का नियंत्रण कार्यालय पर नहीं रह पाएगा तथा कार्यालय में अराजकता फैल जाएगी। 

वायव्य कोण में बैठने वाले कर्मचारी प्राय: थोडे समय बाद वहां कम बैठना शुरू कर देते हैं तथा कुछ अघिक समय बीत जाने के बाद वे अन्यत्र कहीं नौकरी पकडने की कोशिश करते हैं। उन्हें अघिक वेतन पर काम मिल भी जाता है। यह कोण माकेटिंग करने वाले व्यक्तियों के लिए श्रेष्ठ है। कोई भी कार्यालय प्रभारी यह चाहेगा कि माकेर्टिग से संबंघित व्यक्ति हमेशा मार्केट में ही रहे। वायव्य कोण में कुछ गुण ही ऎसा है कि व्यक्ति के मन में उच्चाटन की भावनाएं पैदा होती है, इसीलिए विवाह योग्य कन्याओं के लिए भी यही जगह प्रशस्त बताई गई है परंतु 10वीं, 12वीं में पढने वाली लडकियों के लिए वायव्य कोण में सोना खतरनाक है क्योंकि उनका मन घर में नहीं लगेगा। 

अग्निकोण में उन कर्मचारियों को स्थान दिया जा सकता है जिनका दिमागी कार्य है तथा जो शोघ कार्य करते रहते हैं। नित नवीन योजनाएँ बनाने वाले कर्मचारियों को भी वहां स्थान दिया जा सकता है। टैस्टिंग लेबोरेटरी भी यहां स्थापित की जा सकती है। अग्निकोण में यदि अघिक वर्षो तक बैठना पडे तो स्वभाव में आवेश आने लगता है। इसका नुकसान अघीनस्थ को तो झेलनासंस्थान को भी झेलना पड सकता है। अग्निकोण में उन्हीं कर्मचारियों को बैठाया जाना चाहिए जिनसे पब्लिक रिलेशंस के कार्य नहीं कराए जाते हों। ऎसे कर्मचारियों को किसी बीम या तहखाने के ऊपर भी नहीं बैठाया जाना चाहिए।

 

 ईशान कोण में यदि वरिष्ठ अघिकारी बैंठे तो भी उत्तम नहीं माना जाता क्योंकि आवश्यक रूप से अन्य शक्तिशाली स्थानों पर अघीनस्थ कर्मचारियों को बैठना पडेगा। ईशान कोण में अपेक्षाकृत कनिष्ठ एवं उन लोगों को बैठाया जाना चाहिए जो वाक्पटु हों और मुस्कुराकर अभिवादन कर सकें।

 

प्राय: सभी स्थितियों में कर्मचारियों को उत्तराभिमुख बैठना चाहिए और ऎसा न हो सकते की स्थिति में पूर्वाभिमुख बैठनाचाहिए। 

 

भारी-भरकम अलमारियाँ या रैक्स नैऋत्य कोण में रखा जाना उचित होता है। ऊंचे या भारी सामान को उत्तर या ईशान कोण में रखने से कार्यालय में बाघाएं उत्पन्नहो जाती है।

बीच में, मघ्य स्थान में अर्थात ब्रास्थान में भी भारी-भरकम सामान या स्थायी स्ट्रक्चर नहीं बनाया जाना चाहिए। बीम या गढा भी यहां नहीं होना चाहिए।

 

ज्योतिष-वास्तु रहस्य

वास्तु: भूमि का चयन और मिट्टी का स्वरूप


वास्तु के प्राचीन शास्त्रों में उल्लेख किया गया है कि निर्माण के लिए भूमि का चयन करते समय मिट्टी के स्वरूप की परख अवश्य की जाए। अन्य पहलुओं के साथ-साथ वह भी महत्वपूर्ण कारक है। वास्तु में मिट्टी को उसके रंग, स्वाद और महक के आधार पर चार श्रेणियों में बांटा गया है- ब्राह्मण , क्षत्रिय , वैश्य व शूद्र। जो मिट्टी श्वेत, थोड़ी लाल, भीनी-भीनी महक वाली और उपजाऊ होती है वह आवास तथा व्यावसायिक कार्यों के लिए बहुत शुभ होती है। काले वर्ण की दुर्गंधित और तीखे स्वाद वाली मिट्टी को अशुभ माना जाता है।

मिट्टी का विश्लेषण मिट्टी में निहित पंचतत्वों के गुणों के आधार पर किया जाता है। वास्तु संबंधी शास्त्रों में मिट्टी की विशेषताओं की व्याख्या रूप, रस , गंध , रंग , आकार , स्पर्श व ढलान के आधार पर की गई है और उसे ब्राह्मण , क्षत्रिय , वैश्य तथा शूद्र श्रेणियों में विभाजित किया गया है।
मिट्टी की विशेषताओं का रहने वाले लोगों पर निश्चित रूप से प्रभाव पड़ता है। वास्तुशास्त्र के अनुसार अलग-अलग श्रेणी की मिट्टी विभिन्न वर्ग और श्रेणी के निवासियों के लिए उपयुक्त होती है। उदाहरण के लिए ब्राह्मणी भूमि बुद्धिजीवियों , वैज्ञानिकों व धार्मिक नेताओं के लिए अच्छी मानी जाती है। इसका रंग श्वेत होता है , महक अच्छी होती है और स्वाद मीठा होता है। प्राचीन समय में देखा गया था कि अलग-अलग प्रकार की मिट्टी की जैविक संरचना और विशेषताएं अलग-अलग तरह के लोगों के लिए अनुकूल सिद्ध होती है और प्रभामंडल को और प्रभावी बनाती है।

मिट्टी की विशेषताओं और वहां रहने वाले लोगों के गुणों में परस्पर संबंध होता है। इनके सही मेल से वांछित लाभ अर्जित किया जा सकता है। ध्यान रखें कि यह वर्गीकरण जाति के आधार पर नहीं किया गया है, बल्कि व्यवसाय , कार्य के स्वरूप व मूल प्रवृत्ति के आधार पर किया गया है।

मिट्टी की जांच
प्राकृतिक आपदाओं जैसे भूचाल , चक्रवात आदि की विनाशक शक्ति को झेलने में कोई भवन कितना सक्षम है , यह इस बात पर निर्भर करता है कि भवन का मूल आधार अर्थात् मिट्टी कितनी उपयुक्त व सुदृढ़ है। हमारे मनीषियों ने भवन की सुदृढ़ता और स्थायित्व के लिए भूखंड की मिट्टी की
गुणवत्ता , शुभता और अनुकूलताएं नींव स्थापना और भूखंड के सही आकार की महत्ता पर बल दिया था।
वास्तुशास्त्र के अनुसार निर्माण उसी भूमि पर करना चाहिए, जिस भूमि की मिट्टी में घनत्व अधिक हो। आधुनिक समय में भी मिट्टी के अधिक घनत्व वाली भूमि को अच्छा माना जाता है और मिट्टी की सुदृढ़ता व उपयुक्तता की परख करने के लिए जांच की जाती है। यकीनन , हमारे पूर्वजों को भवन निर्माण संबंधी सभी पहलुओं का ज्ञान था। उन्हें न केवल वास्तुकला के सिद्धांतों का ज्ञान था, बल्कि मनुष्य में और उसके चारों ओर व्याप्त सूक्ष्म ब्रह्मांडीय ऊर्जा का भी पता था।
वास्तु में मिट्टी की शक्ति को परखने के लिए उसकी जांच करने की बात कही गई है, क्योंकि मिट्टी को ही भवन का पूरा भार वहन करना पड़ता है और प्राकृतिक शक्तियों और प्राकृतिक आपदाओं का सामना करना पड़ता है। हमारे प्राचीन वास्तु ग्रंथों में मिट्टी के घनत्व की जांच के लिए बहुत साधारण और सरल विधियां बताई गईं हैं।
भूखंड के बीच में एक हाथ लंबा, एक हाथ चौड़ा और एक हाथ गहरा गड्ढा खोदकर उसे उसमें से निकाली गई मिट्टी से ही भर देना चाहिए। यदि गड्ढे को अच्छी तरह भरने के बाद भी मिट्टी बच जाए तो वह भूमि घर बनाने के लिए उत्तम होती है। यदि उस मिट्टी से गड्ढा भर दिया जाए और मिट्टी न बचे तो भूमि मध्यम होती है और यदि गड्ढा भरने में मिट्टी कम पड़ जाए तो उस भूमि पर भवन निर्माण नहीं करना चाहिए।
मिट्टी को परखने के लिए खाली गड्ढे को शाम के समय पानी से भरकर छोड़ देना चाहिए। सुबह तक यदि इस गड्ढे में कुछ पानी बचे तो वह भूमि मकान बनाने के लिए शुभ होती है। यदि गड्ढे में गीली-गीली मिट्टी हो तो भूमि मध्यम होती है , यदि गड्ढे में पानी न हो और दरारें हो तो उस भूमि पर मकान नहीं बनाना चाहिए।

भूमि जांच का एक अन्य तरीका भूमि पर हल चलाकर भी किया जाता है। हल चलाने से ऊपरी सतह के हट जाने के बाद मिट्टी की सही जानकारी प्राप्त हो जाती है। यदि पशुओं की हड्डियां , बाल आदि मिले तो उस भूमि को निर्माण के लिए अशुभ माना जाता है। भूमि का मुख्य गुण उसका चिकनापन और ठोस होना माना गया है। रेतीली मिट्टी एक स्थिर भवन के निर्माण के लिए सही नहीं समझी जाती। दरारों वाली , चींटियों और दीमकों के बिल वाली , दलदली और ऊंची-नीची भूमि पर भवन निर्माण नहीं करना चाहिए।
अगर ऐसी भूमि पर भवन बनाना जरूरी हो तो उसकी ( 5.5-6 फुट तक) खुदाई कर उसमें अशुभ चीजों का शोधन करके बडे़ गोल पत्थरों और चिकनी मिट्टी से भरकर समतल कर लेना चाहिए। उसके बाद पानी से पूरे भूखंड को संचित कर फिर भवन निर्माण करवाना चाहिए।

वास्तु से बढाएं पिता-पुत्र में प्रेम

वास्तु से बढाएं पिता-पुत्र में प्रेम



वास्तु अध्ययन व अनुभव यह बताता है कि जिस भवन में वास्तु स्थिति गड़बड होती है, वहाँ व्यक्ति के पारिवारिक व व्यक्तिगत रिश्तों में अक्सर मतभेद, तनाव उत्पन्न होते रहते हैं। वास्तु में पूर्व ईशानजनित दोषों के कारण पिता-पुत्र के संबंधों में धीरे-धीरे गहरे मतभेद दूरियाँ उत्पन्न हो जाती हैं और साथ ही कई परिवारों को पुत्र हानि का भी सामना करना पड़ता है सूर्य को पुत्र का कारक ग्रह माना जाता है, जब भवन में ईशान व पूर्व वास्तु दोषयुक्त हो तो यह घाव में नमक का कार्य करता है। जिससे पिता-पुत्र जैसे संबंधों में तालमेल का भाव व पुत्र-पिता के प्रति दुर्भावना रखता है। वास्तु के माध्यम से पिता पुत्र के संबंधों को अति मधुर बनाया जा सकता है।

महत्वपूर्ण व उपयोगी तथ्य जो पिता-पुत्र के संबंधों को प्रभावित करते हैं :

-
ईशान (उत्तर-पूर्व) में भूखण्ड कटा हुआ नहीं होना चाहिए।
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भवन का भाग ईशान (उत्तर-पूर्व) में उठा होना अशुभ हैं। अगर यह उठा हुआ है तो पुत्र संबंधों में मधुरता व नजदीकी का आभाव रहेगा।
-
उत्तर-पूर्व (ईशान) में रसोई घर या शौचालय का होना भी पुत्र संबंधों को प्रभावित करता है। दोनों के स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ बनी रहती है।
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दबे हुए ईशान में निर्माण के दौरान अधिक ऊँचाई देना या भारी रखना भी पुत्र और पिता के संबंधों को कलह और परेशानी में डालता रहता है।
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ईशान (उत्तर-पूर्व) में स्टोर रूम, टीले या पर्वतनुमा आकृति के निर्माण से भी पिता-पुत्र के संबंधों में कटुता रहती है तथा दोनों एक-दूसरे पर दोषारोपण करते रहते हैं।
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इलेक्ट्रॉनिक आइटम या ज्वलनशील पदार्थ तथा गर्मी उत्पन्न करने वाले अन्य उपकरणों को ईशान (उत्तर-पूर्व) में रखने से पुत्र, पिता की बातों की अवज्ञा अर्थात्‌ अवहे‌लना करता रहता है, और समाज में बदनामी की स्थिति पर ला देता है।
-
इस दिशा में कूड़ेदान बनाने या कूड़ा रखने से भी पुत्र, पिता के प्रति दूषित भावना रखता हैं। यहाँ तक मारपीट की नौबत आ जाती है।
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ईशान कोण खंडित होने से पिता-पुत्र आपसी मामलों को लेकर सदैव लड़ते-झगड़ते रहते हैं।
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यदि कोई भूखंड उत्तर व दक्षिण में सँकरा तथा पूर्व व पश्चिम में लंबा है तो ऐसे भवन को सूर्यभेदी कहते हैं यहाँ भी पिता-पुत्र के संबंधों में अनबन की स्थिति सदैव रहती है। सेवा तो दूर वह पिता से बात करना तथा उसकी परछाई में भी नहीं आना चाहता है।

इस प्रकार ईशान कोण दोष अर्थात्‌ वास्तुजनित दोषों को सुधार कर पिता-पुत्र के संबंधों में अत्यंत मधुरता लाई जा सकती हैं। सूर्य संपूर्ण विश्व को ऊर्जा शक्ति प्रदान करता है तथा इसी के सहारे पौधों में प्रकाश संश्लेषण की क्रिया संचालित होती है तथा पराग कण खिलते हैं जिसके प्रभाव से वनस्पति ही नहीं बल्कि समूचा प्राणी जगत्‌ प्रभावित होता है। पूर्व व ईशानजनित दोषों से प्राकृतिक तौर पर प्राप्त होने वाली सकारात्मक ऊर्जा नहीं मिल पाती और पिता-पुत्र जैसे संबंधों में गहरे तनाव उत्पन्न हो जाते हैं। अतएव वास्तुजनित दोषों को समझते हुए ईशान की रक्षा यत्नपूर्वक करनी चाहिए।

निवास स्थान का चयन

निवास स्थान का चयन

निवास स्थान का चयन
स्वरशास्त्रानुसार किसी व्यक्ति के निवास के लिये उपयुक्त नगर और उसकी दिशा का चयन करते हैं।
सबसे पहले हम निवास के लिये उपयुक्त नगर के चयन को लेते हैं। नगर का चयन दो प्रकार से किया जाता है।
१॰ नगर और व्यक्ति की नामराशियों से।
२॰ नगर और व्यक्ति की कांकिणी संख्या के अनुसार।
नगर और व्यक्ति की नामराशियों से-
व्यक्ति की नामराशि से नगर की नामराशि १, ३, ४, ६, ७, ८ और १२वीं हो तो इनका फल क्रमशः शत्रुता, हानि, रोग, हानि, शत्रुता, रोग और रोग लिखा है। तथा २, ५, ९, १० और ११ हो तो इसका फल शुभ माना गया है। इसे इस प्रकार भी समझ सकते हैं।

नगर की राशि व्यक्ति की नामराशि
मेष वृष मिथुन कर्क सिंह कन्या तुला वृश्चिक धनु मकर कुम्भ मीन
मेष बैर रोग शुभ शुभ शुभ रोग बैर हानि शुभ रोग हानि शुभ
वृष शुभ बैर रोग शुभ शुभ शुभ रोग बैर हानि शुभ रोग हानि
मिथुन हानि शुभ बैर रोग शुभ शुभ शुभ रोग बैर हानि शुभ रोग
कर्क रोग हानि शुभ बैर रोग शुभ शुभ शुभ रोग बैर हानि शुभ
सिंह शुभ रोग हानि शुभ बैर रोग शुभ शुभ शुभ रोग बैर हानि
कन्या हानि शुभ रोग हानि शुभ बैर रोग शुभ शुभ शुभ रोग बैर
तुला शुभ हानि शुभ रोग हानि शुभ बैर रोग शुभ शुभ शुभ रोग
वृश्चिक रोग बैर हानि शुभ रोग हानि शुभ बैर रोग शुभ शुभ शुभ
धनु शुभ रोग बैर हानि शुभ रोग हानि शुभ बैर रोग शुभ शुभ
मकर शुभ शुभ रोग बैर हानि शुभ रोग हानि शुभ बैर रोग शुभ
कुम्भ शुभ शुभ शुभ रोग बैर हानि शुभ रोग हानि शुभ बैर रोग
मीन रोग शुभ शुभ शुभ रोग बैर हानि शुभ रोग हानि शुभ बैर

उदाहरण- श्री राजवीर सिंह चूरु में रहना चाहते हैं। क्योंकि उनकी नामराशि तुला से चूरु की नामराशि मेष सातवीं राशि है, अतः चूरु उनके लिये ठीक नहीं है। क्योंकि यहां उन्हें रोगग्रस्त रहना हो सकता है।

 राशि प्रथमाक्षर
मेष चू चे चो ला ली लू ले लो अ
वृष इ उ इ ए ओ बा बी बु बे बो
मिथुन का की कु घ ङ छु के को हा
कर्क ही हु हे हो डा डी डू डे डो
सिंह मा मी मू मे मो टा टी टू टे
कन्या टो पा पी पू ष ण ठ पे पो
तुला रा री रु रे रो ता ती तू ते
वृश्चिक तो ना नी नू ने नो या यि यू
धनु ये यो भा भी भु धा फा ढ़ा भे
मकर भो जा जी खी खू खे खो गा गी
कुम्भ गू गे गो सा सी सू से सो दा
मीन दी दू थ झ ञ दे दो चा ची

नगर और व्यक्ति की कांकिणी संख्या के अनुसार-
व्यक्ति की वर्गसंख्या को दोगुना कर उसमें नगर की वर्गसंख्या जोड़कर योगफल को आठ से भाग दें। जो शेष बचे वह उस व्यक्ति की कांकिणीसंख्या होगी।
इसी प्रकार नगर की वर्गसंख्या को दोगुना कर उसमें व्यक्ति की वर्गसंख्या जोड़कर योगफल को आठ से भाग दें। जो शेष बचे वह उस नगर की कांकिणीसंख्या होगी।
जिस नगर की कांकिणीसंख्या व्यक्ति की कांकिणीसंख्या से कम हो वह नगर व्यवसाय में लाभ की दृष्टि से उस व्यक्ति के निवास के लिये उपयुक्त होगा, अन्यथा नहीं। यदि नगर और व्यक्ति दोनों की कांकिणीसंख्या समान हो तो, वहां रहने से आय-व्यय बराबर रहता है। व्यक्ति की कांकिणीसंख्या नगर की कांकिणीसंख्या से जितनी अधीक होगी, वह नगर उस व्यक्ति के व्यवसाय के लिये उतना ही अधीक लाभप्रद रहेगा।

वर्ग वर्ग के वर्ण वर्गेश वर्ग संख्या वर्ग की दिशा
अवर्ग अ, इ, उ, ए, ऐ, ओ, औ गरुढ़ पूर्व
कवर्ग क, ख, ग, घ, ङ मार्जार आग्नेय
चवर्ग च, छ, ज, झ, ञ सिंह दक्षिण
टवर्ग ट, ठ, ड, ढ, ण श्वान नैऋत्य
तवर्ग त, थ, द, ध, न सर्प पश्चिम
पवर्ग प, फ, ब, भ, म मूषक वायव्य
यवर्ग य, र, ल, व मृग उत्तर
शवर्ग श, ष, स, ह मेष ईशान

उदाहरण- श्री राजवीर सिंह चूरु में रहना चाहते हैं। राजवीर सिंह की वर्गसंख्या ७ तथा चूरु की ३ है। अतः ७ * २ = १४ + ३ = १७ / ८ शेष बचा १ । यह राजवीर सिंह की कांकिणीसंख्या हुई।
३ * २ = ६ + ७ = १३ / 8 शेष बचे ५ । यह चूरु की कांकिणीसंख्या ५ हुई। अतः राजवीर सिंह की कांकिणीसंख्या चूरु की कांकिणीसंख्या से कम है, इसलिये राजवीर सिंह के लिये चूरु में रहना हानिप्रद है।

नगर का वर्ग कांकिणी व्यक्ति का वर्ग
अवर्ग (१) कवर्ग (२) चवर्ग (3) टवर्ग (4) तवर्ग (5) पवर्ग (6) यवर्ग (7) शवर्ग (8)
अवर्ग (१) व्यक्ति सम 5 लाभ 7 लाभ 1 हानि 3 हानि 5 लाभ 7 लाभ 1 हानि
नगर 4 5 6
7 0 1 2
कवर्ग (२) व्यक्ति 4 हानि 6 सम 0 हानि 2 लाभ 4 लाभ 6 लाभ 0 हानि 2 हानि
नगर 5 6 7 0 1 2 3 4
चवर्ग (3) व्यक्ति 5 हानि 7 लाभ 1 सम 3 लाभ 5 लाभ 7 लाभ 1 हानि 3 हानि
नगर 7 0 1 2 3 4 5 6
टवर्ग (4) व्यक्ति 6 लाभ 0 हानि 2 हानि 4 सम 6 लाभ 0 हानि 2 हानि 4 लाभ
नगर 1 2 3 4 5 6 7 0
तवर्ग (5) व्यक्ति 7 लाभ 1 हानि 3 हानि 5 हानि 7 सम 1 लाभ 3 लाभ 5 लाभ
नगर 3 4 5 6 7 0 1 2
पवर्ग (6) व्यक्ति 0 हानि 2 हानि 4 हानि 6 लाभ 0 हानि 2 सम 4 लाभ 6 लाभ
नगर 5 6 7 0 1 2 3 4
यवर्ग (7) व्यक्ति 1 हानि 3 लाभ 5 लाभ 7 लाभ 1 हानि 3 हानि 5 सम 7 लाभ
नगर 7 0 1 2 3 4 5 6
शवर्ग (8) व्यक्ति 2 लाभ 4 लाभ 6 लाभ 0 हानि 2 हानि 4 हानि 6 हानि 0 सम
नगर 1 2 3 4 5 6 7 0

उपरोक्त दोनों प्रकारों (नामराशि तथा कांकिणीसंख्या) से जो नगर निवास के लिये उपयुक्त सिद्ध हो जाये, उसी नगर में रहना चाहिये।
नगर चयन हो जाने पर उस नगर में निवास योग्य दिशा का चयन करना चाहिये। यह भी दो प्रकार से किया जाता हैः-
१॰ व्यक्ति की नामराशियों से।
२॰ व्यक्ति के वर्ग के आधार पर।

व्यक्ति की नामराशियों से

व्यक्ति की

नामराशि

नगर की दिशाएं
पूर्व आग्नेय दक्षिण नैऋत्य पश्चिम वायव्य उत्तर ईशान मध्य
मेष शुभ शुभ शुभ शुभ शुभ शुभ अशुभ शुभ शुभ
वृष शुभ शुभ शुभ शुभ शुभ शुभ शुभ शुभ अशुभ
मिथुन शुभ शुभ शुभ शुभ शुभ शुभ शुभ शुभ अशुभ
कर्क शुभ शुभ शुभ अशुभ शुभ शुभ शुभ शुभ शुभ
सिंह शुभ शुभ शुभ शुभ शुभ शुभ शुभ शुभ अशुभ
कन्या शुभ शुभ अशुभ शुभ शुभ शुभ शुभ शुभ शुभ
तुला शुभ शुभ शुभ शुभ शुभ अशुभ शुभ शुभ शुभ
वृश्चिक अशुभ शुभ शुभ शुभ शुभ शुभ शुभ शुभ शुभ
धनु शुभ शुभ शुभ शुभ अशुभ शुभ शुभ शुभ शुभ
मकर शुभ शुभ शुभ शुभ शुभ शुभ शुभ शुभ अशुभ
कुम्भ शुभ शुभ शुभ शुभ शुभ शुभ शुभ अशुभ शुभ
मीन शुभ अशुभ शुभ शुभ शुभ शुभ शुभ शुभ शुभ

व्यक्ति के वर्ग के आधार पर:-

व्यक्ति

का वर्ग

नगर की दिशाएं
पूर्व आग्नेय दक्षिण नैऋत्य पश्चिम वायव्य उत्तर ईशान मध्य
अवर्ग श्रेष्ठ शुभ शुभ सामान्य अशुभ सामान्य शुभ शुभ शुभ
कवर्ग शुभ श्रेष्ठ शुभ शुभ सामान्य अशुभ सामान्य शुभ शुभ
चवर्ग शुभ शुभ श्रेष्ठ शुभ शुभ सामान्य अशुभ सामान्य शुभ
टवर्ग सामान्य शुभ शुभ श्रेष्ठ शुभ शुभ सामान्य अशुभ शुभ
तवर्ग अशुभ सामान्य शुभ शुभ श्रेष्ठ शुभ शुभ सामान्य शुभ
पवर्ग सामान्य अशुभ सामान्य शुभ शुभ श्रेष्ठ शुभ शुभ शुभ
यवर्ग शुभ सामान्य अशुभ सामान्य शुभ शुभ श्रेष्ठ शुभ शुभ
शवर्ग शुभ शुभ सामान्य अशुभ सामान्य शुभ शुभ श्रेष्ठ शुभ

पूजाघर का वास्तु


 
पूजाघर, आपकी ईश्वर में आस्था का प्रतीक हैं। विश्वास और आस्था के साथ जब आप घर में भगवान को स्थान देते हैं, तो परिवार के कल्याण की कामना करते हैं। वास्तुशास्त्र में घर में पूजा का स्थान नियत करने के कई मार्गदर्शन दिए गए हैं, जिन्हें अपनाकर पूरे परिवार के लिए सुख-समृद्धि का वरण किया जा सकता है। चलिए, घर में पूजा का स्थान कहां होना चाहिए और किन बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए, इस पर नज़र डालें-

घर में पूजा का स्थान पूर्व दिशा में शुभ माना जाता है, क्योंकि पूर्व दिशा से सूर्य उगता है और धरती पर रोशनी का आगमन होता है। दक्षिण की दिशा में पूजा का स्थान शुभ नहीं माना जाता है।

घर में पूजास्थल के सम्बंध में वास्तुशास्त्र में कहा गया है कि उत्तर-पूर्व का स्थान भी भगवान का होता है और इस स्थान को भी पूजा के लिए तय किया जा सकता है। पूजा के समय व्यक्ति का चेहरा पूर्व या उत्तर की ओर होना चाहिए। पूर्व दिशा पूजा के लिए सबसे अच्छी दिशा मानी जाती है।

यदि पूर्व दिशा की ओर पूजा कर पाना सम्भव न हो, तो उत्तर दिशा की ओर मुंह करके पूजा करना उचित है। इससे व्यक्ति के जीवन में सुख व समृद्धि आती है।

विशेष स्थिति में पश्चिम की ओर मुंह करके पूजा भी की जा सकती है, लेकिन दक्षिण की तरफ मुंह करके पूजा करना अशुभ माना जाता है।

घर में पूजा का स्थान उत्तर-पूर्व दिशा में हो, तो घर के सदस्यों का स्वास्थ्य अच्छा रहता है और सुख-समृद्धि बनी रहती है।

पूजाघर उत्तर-पूर्व कोने में या उसके निकट होना चाहिए। उत्तर-पूर्व दिशा में मंदिर और पूजाघर में गणेश और लक्ष्मी जी की मूर्ति स्थापित करना, मंगलकारी होता है।

सूर्योदय और सूर्यास्त के समय आरती करना चाहिए। प्रात: सूर्यनमस्कार कर सकें, तो पूजन लाभ के साथ-साथ सेहत लाभ भी मिलेगा।

कुछ महत्वपूर्ण बातें
आजकल भिन्न-भिन्न प्रकार की धातुओं से मंदिर बनाए जाते हैं लेकिन घर में शुभता की दृष्टि से मंदिर लकड़ी, पत्थर और संगमरमर का होना चाहिए।

मंदिर इमारती लकड़ियों के बने होने चाहिए जैसे चंदन, शाल, चीड़, शीशम, सागौन आदि। पर जंगली लकड़ी से परहेज करना चाहिए जैसे नीम की लकड़ी।

मंदिर, गुम्बदाकार या पिरामिडनुमा होना शुभ माना जाता है। प्राचीन ग्रंथों में ऐसा लिखा गया है कि मंदिर में तीन गणपति, तीन दुर्गा, दो शिवलिंग, दो शंख, दो शालिग्राम, दो चंद्रमा, दो सूरज, द्वारिका के दो गोमती चक्र एक साथ, एक जगह पर नहीं रखने चाहिए।

ग्रह वास्तु के अनुसार, घर में पूजा के लिए डेढ़ इंच से छोटी और बारह इंच से बड़ी मूर्ति का प्रयोग नहीं करना चाहिए। बारह इंच से बड़ी मूर्ति की पूजा मंदिरों में की जाती है। घर में पीतल, अष्ठधातु की भी बड़े आकार की मूर्ति नहीं होनी चाहिए।

 

   किचन में पूजा स्थान

 
किचन में पूजा स्थान बनाना शुभ नहीं

जब कोई व्यक्ति घर बनाता है या घर का नवीनीकरण करता है, तो चाहता है कि उसका घर वास्तु के अनुसार बने। इसलिए चार बातों का ध्यान विशेष रूप से रखा जाता है कि घर में पूजा का स्थान ईशान कोण में, रसोई घर आग्नेय कोण में, मास्टर बेडरूम नैर्ऋत्य कोण में और लड़कियों व मेहमानों का कमरा वाचब्य कोण में होना चाहिए। यदि ये चारों सही जगह बन जाएं तो यह समझा जाता है कि मकान वास्तु सिद्धान्तों के अनुरूप बना है। किसी घर में यदि इनमें से कोई एक भी सही जगह पर न बना हो तो वास्तु के अनुसार घर को दोषपूर्ण मान लिया जाता है।

इनमें किचन अत्यन्त महत्वपूर्ण है। घर की गृहिणी का किचन से विशेष नाता रहता है। गृहणियां हमेशा इस बात का खयाल रखती हैं कि उनका किचन आग्नेय कोण में हो और यदि ऐसा नहीं हो तो किसी भी परेशानी का कारण किचन के वास्तुदोष पूर्ण होने को ही मान लिया जाता है, जो उचित नहीं है।

यह सही है कि घर के आग्नेय कोण में किचन का स्थान सर्वोत्तम है पर यदि संभव हो तो उसे किसी अन्य स्थान पर बनाया जा सकता है।

* आग्नेय कोण: किचन की यह स्थिति बहुत शुभ होती है । आग्नेय कोण में किचन होने पर घर की स्त्रियां खुश रहती हैं। घर में समस्त प्रकार के सुख रहते हैं।

* दक्षिण दिशा: इस दिशा में किचन होने से परिवार में मानसिक अशांति बनी रहती है। घर के मालिक को क्रोध अधिक आता है और उसका स्वास्थ्य साधारण रहता है।

* नैर्ऋत्य कोण: जिस घर में किचन दक्षिण या नैर्ऋत्य कोण में होता है उस घर की मालकिन ऊर्जा से भरपूर उत्साहित एवं रोमैंटिक मिजाज की होती है।

* पश्चिम दिशा: जिस घर में किचन पश्चिम दिशा में होता है, उस घर का सारा कार्य घर की मालकिन देखती है। उसे अपनी बहू बेटियों से काफी खुशियां प्राप्त होती हैं। घर की सभी महिला सदस्यों में आपसी तालमेल अच्छा बना रहते हैं, परंतु खाद्यान्न की बर्बादी जरूर ज्यादा होती है।

* वायत्य कोण: जिस घर का किचन वायत्य कोण में होता है, उसका मुखिया रोमैंटिक होता है। उसकी कई महिला मित्र होती हैं, किन्तु बेटी को गर्भाशय की समस्या और कभी कभी उसकी बदनामी भी होती है।

* उत्तर दिशा: जिस घर में किचन उत्तर दिशा में होता है, उसकी स्त्रियां बुद्धिमान तथा स्नेहशील होती हैं। उस परिवार के पुरूष सरलता से अपना कारोबार करते हैं और उन्हें धनार्जन में सफलता मिलती है।

* ईशान कोण: ईशान कोण में किचन होने पर परिवार के सदस्यों को सामान्य सफलता मिलती है। परिवार की बुजुर्ग महिला पत्नी, बड़ी बेटी या बड़ी बहु धार्मिक प्रवृति की होती है, परंतु घर में कलह भी होती है।

* पूर्व दिशा: जिस घर में पूर्व दिशा में किचन होता है, उसकी आय अच्छी होती है। घर की पूरी कमान पत्नी के पास होती है। पत्नी की खुशियों में कमी रहती है। साथ ही उसे पित्त गर्भाशय स्नायु तंत्र आदि से संबंधित रोग होने की संभावना रहती है।

किचन से जुड़ी कुछ अन्य जानकारियां निम्नलिखित हैं, जिनका किचन बनाते समय ध्यान रखना चाहिए-

* जिस घर में किचन के अंदर ही स्टोर हो, तो गृहस्वामी को अपनी नौकरी या व्यापार में काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। इन कठिनाइयों से बचाव के लिए किचन व स्टोर रूम अलग-अलग बनाने चाहिए।

* किचन व बाथरूम का एक सीध में साथ-साथ होना शुभ नहीं होता है। ऐसे घर में रहने वालों को जीवन यापन करने में काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। स्वास्थ्य भी ठीक नहीं रहता। ऐसे घर की कन्याओं के जीवन में अशांति रहती है।

* किचन में पूजा स्थान बनाना भी शुभ नहीं होता है। जिस घर में किचन के अंदर ही पूजा का स्थान होता है, उसमें रहने वाले गरम दिमाग के होते हैं। परिवार के किसी सदस्य को रक्त संबंधी शिकायत भी हो सकती है।

* घर के मुख्य द्वार के ठीक सामने किचन नहीं बनाना चाहिए। मुख्य द्वार के एकदम सामने का किचन गृहस्वामी के भाई के लिए अशुभ होता है।

* यदि किचन भूमिगत पानी की टंकी या कुएं के साथ लगा हो तो भाइयों में मतभेद रहते हैं। घर के स्वामी को धन कमाने के लिए बहुत यात्राएं करनी पड़ती हैं।

* घर की बैठक में भोजन बनाना या बैठक खाने के ठीक सामने किचन का होना अशुभ होता है। ऐसे में रिश्तेदारों के मध्य शत्रुता रहती है एवं बच्चों को शिक्षा प्राप्त करने में कठिनाइयां आती हैं।

* जिस घर में किचन मुख्य द्वार से जुड़ा हो, वहां प्रारंभ में पति-पत्नी के मध्य बहुत प्रेम रहता है घर का वातावरण भी सौहार्दपूर्ण रहता है, किन्तु कुछ समय बाद बिना कारण आपस में मतभेद पैदा होने लगते हैं।

अनुभव में पाया गया है कि जिनके घरों में किचन में भोजन बनाने के साधन जैसे गैस, स्टोव, माइक्रोवेव ओवन इत्यादि एक से अधिक होते हैं, उनमें आय के साधन भी एक से अधिक होते हैं। ऐसे परिवार के सभी सदस्यों को कम से कम एक समय भोजन साथ मिलकर करना चाहिए। ऐसा करने से आपसी संबंध मजबूत होते हैं तथा साथ मिलकर रहने की भावना भी बलवती होती है ।

वास्तु से लगाएँ खुशहाली के पेड़ पौधे


हमारी भारतीय संस्कृति में पेड़ों को देवता के रूप में पूजने की परंपरा रही है। ऐसी मान्यता है कि प्रत्येक व्यक्ति की राशि का एक प्रतिनिधि वृक्ष होता है। इसके सान्निध्य और रोपण से शुभफल मिलता है।

वास्तु में राशि के अनुसार पेड़ लगाना सकारात्मक फलदायक माना जाता है। सभी लोगों को घरों में पेड़ लगाने के बारे में शुभाशुभ जानना आवश्यक होता है।

अष्टदिग्पाल वृक्ष : प्रत्येक दिशा में एक प्रतिनिधि वृक्ष दिग्पाल के रूप में दिशाओं की रक्षा करता है। आठ दिशाओं के प्रतिनिधि वृक्ष भवन तथा भूमि पर लगाने से मंगलकारी होते हैं।

इसके तहत उत्तर में जामुन, उत्तर पूर्व में हवन, उत्तर पश्चिम में सादड़, पश्चिम में कदम्ब, दक्षिण पश्चिम में चंदन, दक्षिण में आँवला पूर्व में बाँस तथा दक्षिण पूर्व में गूलर अष्टदिग्पाल वृक्ष पाए जाते हैं।

किस राशि में कौन- सा पौधा शुभ रहेगा आइए जाने:-
मेष लाल चंदन
मिथुन कटहल
सिंह पाडल
कर्क पलास
तुला मौलसिरी
कन्या आम
धनु पीपल
वृश्चिक खैर
कुंभ कैगर खैर
मकर शीशम
वृष सप्तपर्णी
मीन बरगद

वास्तु में पर्स की भूमिका l VASTU AUR PURSE

वास्तु में पर्स की भूमिका


आखिर पर्स का ही वास्तु क्यों? क्योंकि मेरे विचार से हम सब के जीवन में पर्स एक महत्वपूर्ण भूमिका रखता है. जैसे मासिक वेतन मिला तो गया पर्स में अर्थात पूरे महीने की आमदनी को हमने पर्स के हवाले कर दिया. वस्तुओं के खरीद-फरोख्त में भी पर्स सामने आता है किसी वस्तु को खरीदने से नुक्सान हुआ तो किसी में फायदा हुआ या कभी पर्स पाकेटमार ने पार कर दिया तो कभी पर्स में रखे धन की बरकत खत्म हो जाती है सुबह रुपये रखो और शाम आते ही पर्स खाली. इन्हीं बातो को ध्यान में रख कर यदि हम पर्स को वास्तु के नियमों के अनुसार रखे तो हमे पर्स के द्वारा भी बरकत मिल सकती है और धन के नुक्सान से बच सकते है.
आज का युग ऐसे दौर से गुजर रहा है जिसमें कि प्रत्येक व्यक्ति जल्द से जल्द अपनी समस्त महत्वाकांक्षा को पूरा करना चाहता है तथा उस उद्देश्य की पूर्ति को प्राप्त करने के लिए वह सारे यत्न भी करता है वास्तु को ही लें तो आज कल सभी जानते है कि वास्तु का प्रयोग प्रत्येक क्षेत्र में होने लगा है जैसे घर का वास्तु, ऑफिस का वास्तु, दूकान का वास्तु, आपकी कार का वास्तु आदि-आदि. क्या कभी किसी ने यह विचार किया कि जो वस्तु हमेशा हमारे पास होती है वह पर्स का वास्तु क्यों नहीं ?


आज विज्ञान नए नए आविष्कार कर हमारी कल्पनाओं को साकार करने में अग्रसर है तो वास्तु शास्त्र में भी रहस्य छुपे है आवश्यकता है इन्हें समझ कर निकालने की और समाज की भलाई हेतु उसका प्रयोग कर उनकी इच्छाओं की पूर्ती करें. जिस प्रकार हमारे आस-पास का वातावरण या विशेष वस्तुएँ हमारें जीवन को प्रभावित करती है.उसी तरह से हमारा पर्स भी अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने में सक्षम है.


 एक जमानें में तिजौरी का घर,दूकान आदि में बड़ा महत्व होता था क्यों ? क्योंकि वही एकमात्र धन को संग्रह करने का स्थान था. समय बीता और तिजौरी का स्थान धीरे धीरे हटने लगा,परिणाम स्वरूप आज तिजौरी बहुत कम यदा-कदा ही मिलती है. वास्तु में तिजौरी का वर्णन मिलता है. पिछले कई वर्षो से पर्स का चलन बड़ने लगा है और पर्स महिलाओं के हाथ में होना एक फैशन का रूप भी बन गया है. पुरुष वर्ग भी पर्स के बिना धन नहीं रखते. मेरे अनुभव में तिजौरी और पर्स में कोई विशेष अन्तर नहीं रहा. दैनिक कार्यों में पर्स की महत्ता ज्यादा है,
आपके पर्स का आकार, रंग आपके पर्स में रखे हुए सामान आपके जीवन में होने वाली छोटी से छोटी घटना के सूचक होते है. आज मै पर्स रखने के वास्तु शास्त्र के नियम आपके सामने रख रहा हूं.
        १          मेष,सिंह, और धनु राशि वाले अपना पर्स लाल या नारंगी रंग का रखे. तो लाभ होगा.        २        वृष,कन्या, और मकर राशि वालों को भूरे रंग का पर्स तथा मटमैले रंग का पर्स बहुत फायदा पंहुचायगा.        ३        मिथुन,तुला, और कुम्भ राशि वाले यदि नीले रंग व सफ़ेद रंग का प्रयोग करते है    तो मानसिक स्थति के साथ साथ धन के के आगमन के रास्ते भी खुलेंगे.
       ४        कर्क,वृश्चिक, और मीन राशि को तो हमेशा हरा रंग और सफ़ेद रंग का प्रयोग अपने पर्स में करना लाभदायक रहेगा.       ५        रात्री में सोते समय पर्स कभी भी सिरहाने ना रख कर उसे हमेशा अलमारी में रखें.        ६         पर्स में रूपये कभी भी मोड या फोल्ड कर ना रखे.        ७        पर्स में कभी भी रुपयों के साथ कोई बिल-रसीद या टिकट ना रखे इससे विवाद बड़ता है .        ८        पर्स में सिक्कों की व्यवस्था अलग हो तथा बंद कर के रखें पर्स खोलते समय सिक्का नीचे नहीं गिरना चाहिये.इससे अपव्यय बढता है.       ९         पर्स में चाबी को ना रखें.       १०      शौच के समय या शौचालय में पर्स आगे वाली जेब में रखे.      ११       प्रत्येक जन्म दिवस पर अपने पर्स में एक नोट (छोटा या बड़ा) पर अपने पिता या माता के हाथों से केसर का तिलक लगा कर पूरे वर्ष के लिए रख दे. अगले जन्म दिवस पर किसी कन्या को दें.पुन:माता या पिता से तिलक करवा कर वर्ष हेतु रख लें.      १२      अपने पर्स में किसी पूर्णिमा को लाल रेशमी कपडे में चुटकी भर या २१ दाने अखंडित चावल बाँध कर छुपा कर रखने से बेवजह खर्च नहीं होता है.      १३      यदि पर्स कभी फट या कट जाय तुरंत बदल दें.      १४      यदि कर्ज का ब्याज देना हो तो वह रूपये पर्स में भूल कर भी ना रखे . रखोगे तो कर्ज नहीं उतरेगा. बल्कि और चड़ने की संभावना रहेगी.       १५      पर्स बायीं जेब में रखना अति शुभ माना गया है.पर्स में कभी भी बीड़ी/सिगरेट या गुटखा आदि ना रखें.



इन सब बातों का ध्यान रख कर पर्स से समृधी प्राप्त कर सकते है.

धन आने का समय