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राहु द्वारा निर्मित योग और उनका फल (Yoga related with Rahu and thier results)

image Yoga related with Rahu

राहु को अंग्रेजी में ड्रैगन हेड के नाम से जाना जाता है.पौराणिक ग्रंथों में भी इसे सर्प का सिर कहा गया है.केतु के साथ मिलकर यह कालसर्प नामक अशुभ योग का निर्माण करता है.यह इसी प्रकार विभिन्न ग्रहों एवं स्थान में रहकर यह अलग अलग योग बनाता है.

अष्टलक्ष्मी योग - Ashtalakshmi yoga
वैदिक ज्योतिष में राहु नैसर्गिक पापी ग्रह के रूप में जाना जाता है.इस ग्रह की अपनी कोई राशि नहीं है अत: जिस राशि में होता है उस राशि के स्वामी अथवा भाव के अनुसार फल देता है.राहु जब छठे भाव में स्थित होता है और केन्द्र में गुरू होता है तब यह अष्टलक्ष्मी योग (Ashtalakshmi yoga) नामक शुभ योग का निर्माण करता है.  अष्टलक्ष्मी योग (Ashtalakshmi yoga) में राहु अपना पाप पूर्ण स्वभाव त्यागकर गुरू के समान उत्तम फल देता है. अष्टलक्ष्मी योग (Ashtalakshmi yoga) जिस व्यक्ति की कुण्डली में बनता है वह व्यक्ति ईश्वर के प्रति आस्थावान होता है.इनका व्यक्तित्व शांत होता है.इन्हें यश और मान सम्मान मिलता है.लक्ष्मी देवी की इनपर कृपा रहती है.

लग्न कारक योग - Lagna Karaka Yoga
राहु द्वारा निर्मित शुभ योगों में लग्न कारक योग ( Lagna Karaka Yoga) का नाम भी प्रमुख है. लग्न कारक योग ( Lagna Karaka Yoga)  मेष, वृष एवं कर्क लग्न वालों की कुण्डली में तब बनता है जबकि राहु द्वितीय, नवम अथवा दशम भाव में नहीं होता है.जिस व्यक्ति की कुण्डली में लग्न कारक योग ( Lagna Karaka Yoga) उपस्थित होता है उसे राहु की अशुभता का सामना नहीं करना होता है. राहु इनके लिए शुभ कारक होता है जिससे दुर्घटना की संभावना कम रहती है.स्वास्थ्य उत्तम रहता है.आर्थिक स्थिति अच्छी रहती है एवं सुखी जीवन जीते हैं.

परिभाषा योग (Paribhasha Yoga)
जिस व्यक्ति की कुण्डली में राहु परिभाषा योग (Paribhasha Yoga) का निर्माण करता है.वह व्यक्ति राहु के कोप से मुक्त रहता है.यह योग जन्मपत्री में तब निर्मित होता है जब राहु लग्न में स्थित हो अथवा तृतीय, छठे या एकादश भाव में उपस्थित हो और उस पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो.राहु का परिभाषा योग (Paribhasha Yoga) व्यक्ति को आर्थिक लाभ देता है.स्वास्थ्य को उत्तम बनाये रखता है.इस योग से प्रभावित व्यक्ति के कार्य आसानी से बन जाते हैं.

कपट योग (Kapata Yoga)
दो पापी ग्रह राहु और शनि जब जन्मपत्री में क्रमश: एकादश और षष्टम में उपस्थित होते हैं तो कपट योग (Kapata Yoga) बनता है.जिस व्यक्ति की कुण्डली में कपट योग (Kapata Yoga) निर्मित होता है वह व्यक्ति अपने स्वार्थ हेतु किसी को भी धोखा देने वाला होता है .इनपर विश्वास करने वालों को पश्चाताप करना होता है.सामने भले ही लोग इनका सम्मान करते हों परंतु हुदय में इनके प्रति नीच भाव ही रहता है.

पिशाच योग - Pishach Yoga
पिशाच योग (Pishach Yoga) राहु द्वारा निर्मित योगों में यह नीच योग है.पिशाच योग (Pisach Yoga) जिस व्यक्ति की जन्मपत्री में होता है वह प्रेत बाधा का शिकार आसानी से हो जाता है.इनमें इच्छा शक्ति की कमी रहती है.इनकी मानसिक स्थिति कमज़ोर रहती है, ये आसानी से दूसरों की बातों में आ जाते हैं.इनके मन में निराशात्मक विचारों का आगमन होता रहता है.कभी कभी स्वयं ही अपना नुकसान कर बैठते हैं.

चांडाल योग (Chandal Yoga or Guru Chandal Yoga)
चांडाल योग (Chandal Yoga) गुरू और राहु की युति से निर्मित होता है. चांडाल योग (Chandal Yoga) अशुभ ग्रह के रूप में माना जाता है. चांडाल योग (Chandal Yoga)जिस व्यक्ति की कुण्डली में निर्मित होता है उसे राहु के पाप प्रभाव को भोगना पड़ता है. चांडाल योग (Chandal Yoga) में आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ता है.नीच कर्मो के प्रति झुकाव रहता है.मन में ईश्वर के प्रति आस्था का अभाव रहता है.

राहु-कालम : शुभ कार्यो में विशेष रुप से त्याज्य (Rahu Kalam: Aboondoned for Auspicious Events)

image Rahu Kalam

समय के दो पहलू है. पहले प्रकार का समय व्यक्ति को ठीक समय पर काम करने के लिये प्रेरित करता है. तो दूसरा समय उस काम को किस समय करना चाहिए इसका ज्ञान कराता है. (The first phase acts as a guide while in the second phase even the seconds are considered to determine the position of Moon or to obtain the period of Rahu Kaal.) पहला समय मार्गदर्शक की तरह काम करता है. जबकि दूसरा पल-पल का ध्यान रखते हुये कभी चन्द्र की दशाओं का तो कभी राहु काल की जानकारी देता है.

राहु-काल का महत्व :(The Importance of Rahu-Kaal)
(Rahu-Kal makes the person alert that this time is not auspicious for him) राहु-काल व्यक्ति को सावधान करता है. कि यह समय अच्छा नहीं है इस समय में किये गये कामों के निष्फल होने की संभावना है. इसलिये, इस समय में कोई भी शुभ काम नहीं किया जाना चाहिए. कुछ लोगों का तो यहां तक मानना है की इससे किये गये काम में अनिष्ट होने की संभावना रहती है. 

दक्षिण भारत में प्रचलित:(Popular in the South India)
राहु काल का विशेष प्रावधान दक्षिण भारत में है. (Rahu Kalam  occurs for 1 and 1/2 hour on a certain time in a day of the week which is inauspicious for performing any good and inauspicious event) यह सप्ताह के सातों दिन निश्चित समय पर लगभग डेढ़ घण्टे तक रहता है. इसे अशुभ समय के रुप मे देखा जाता है. इसी कारण राहु काल की अवधि में शुभ कर्मो को  यथा संभव टालने की सलाह दी जाती है. 

राहु काल अलग- अलग स्थानों के लिये अलग-2 होता है. इसका कारण यह है की सूर्य के उदय होने का समय विभिन्न स्थानों के अनुसार अलग होता है. इस सूर्य के उदय के समय व अस्त के समय के काल को निश्चित आठ भागों में बांटने से ज्ञात किया जाता है.

दिन के आठ भाग :( The Eight Parts of a Day)
सप्ताह के पहले दिन के पहले भाग में कोई राहु काल नहीं होता है (Rahu kaal does not occur in the first part of a day)  . यह सोमवार को दूसरे भाग में, शनि को तीसरे, शुक्र को चौथे, बुध को पांचवे, गुरुवार को छठे, मंगल को सांतवे तथा रविवार को आंठवे भाग में होता है. (It is fixed for every week) यह प्रत्येक सप्ताह के लिये स्थिर है. राहु काल को राहु-कालम् नाम से भी जाना जाता है.

सामान्य रुप से इसमें सूर्य के उदय के समय को प्रात: 06:00 बजे का मान कर अस्त का समय भी सायं काल 06:00 बजे का माना जाता है. 12 घंटों को बराबर आठ भागों में बांटा जाता है. प्रत्येक भाग डेढ घण्टे का होता है. वास्तव में सूर्य के उदय के समय में प्रतिदिन कुछ परिवर्तन होता रहता है.

एक दम सही भाग निकालने के लिये सूर्य के उदय व अस्त के समय को पंचाग से देख आठ भागों में बांट कर समय निकाला जाता है. इससे समय निर्धारण में ग़लती होने की संभावना नहीं के बराबर रहती है. 

संक्षेप में यह इस प्रकार है:-

  • 1. सोमवार :(Rahu Kalam occurs between 7:30 a.m to 9:00 a.m) सुबह 7:30 बजे से लेकर प्रात: 9.00 बजे तक का समय इसके अन्तर्गत आता है.
  • 2. मंगलवार : राहु काल दोपहर 3:00 बजे से लेकर दोपहर बाद 04:30 बजे तक होता है.
  • 3. बुधवार: राहु काल दोपहर 12:00 बजे से लेकर 01:30 बजे दोपहर तक होता है.
  • 4. गुरुवार : (Rahu Kaalam occurs between 01:30 a.m to 3:00 a.m.) राहु काल दोपहर 01:30 बजे से लेकर 03:00 बजे दोपर तक होता है.
  • 5. शुक्रवार : राहु काल प्रात: 10:30 से 12:00 बजे तक का होता है.
  • 6. शनिवार: राहु काल प्रात: 09:00 से 10:30 बजे तक का होता है.
  • 7. रविवार: राहु काल सायं काल में 04:30 बजे से 06:00 बजे तक होता है.

राहु काल (Rahu Kalam) के समय में किसी नये काम को शुरु नहीं किया जाता है परन्तु ( the work you may start before Rahu-Kalam should not be left incomplete during Rahu-Kaalam) जो काम इस समय से पहले शुरु हो चुका है उसे राहु-काल के समय में बीच में नहीं छोडा जाता है. कोई व्यक्ति अगर किसी शुभ काम को इस समय में करता है तो यह माना जाता है की उस व्यक्ति को किये गये काम का शुभ फल नहीं मिलता है. उस व्यक्ति की मनोकामना पूरी नहीं होगी. अशुभ कामों के लिये इस समय का विचार नहीं किया जाता है. उन्हें दिन के किसी भी समय किया जा सकता है.

According to Ravan Sahita-  राजनीति में प्रवेश एवं सफलता के लिये   ज्योतिष योग (Astrology Yoga for Carrer in Politics)


image Astrology Yoga for Carrer in Politics

अन्य व्यवसायों एवं कैरियर की भांति ही राजनीति में प्रवेश करने वालों की कुंडली में भी ज्योतिष योग होते हैं. राजनीति में सफल रहे व्यक्तियों की कुंडली में ग्रहों का विशिष्ट संयोग देखा गया है,

1. आवश्यक भाव : छठा, सांतवा, दसवां व ग्यारहवां घर (Important Houses for Carrer in Politics)
सफल राजनेताओं की कुण्डली में राहु का संबध छठे, सांतवें, दशवें व ग्यारहवें घर से देखा गया है. कुण्डली के दशवें घर को राजनीति का घर कहते है. सत्ता में भाग लेने के लिये दशमेश या दशम भाव में उच्च का ग्रह बैठा होना चाहिए.

और गुरु नवम में शुभ प्रभाव में स्थिति होने चाहिए. या दशम घर या दशमेश का संबध सप्तम घर से होने पर व्यक्ति राजनीति में सफलता प्राप्त करता है. छठे घर को सेवा का घर कहते है. व्यक्ति में सेवा भाव होने के लिये इस घर से दशम /दशमेश का संबध होना चाहिए.  सांतवा घर दशम से दशम है इसलिये इसे विशेष रुप से देखा जाता है.

2. आवश्यक ग्रह: राहु, शनि, सूर्य व मंगल . (Important Houses: Rahu, Saturn, Sun and Mars)
राहु को सभी ग्रहों में नीति कारक ग्रह का दर्जा दिया गया है. इसका प्रभाव राजनीति के घर से होना चाहिए. सूर्य को भी राज्य कारक ग्रह की उपाधि दी गई है. सूर्य का दशम घर में स्वराशि या उच्च राशि में होकर स्थित हो व राहु का छठे घर, दसवें घर व ग्यारहवें घर से संबध बने तो यह राजनीति में सफलता दिलाने की संभावना बनाता है. इस योग में दूसरे घर के स्वामी का प्रभाव भी आने से व्यक्ति अच्छा वक्ता बनता है.
 
शनि दशम भाव में हो या दशमेश से संबध बनाये और इसी दसवें घर में मंगल भी स्थिति हो तो व्यक्ति समाज के  लोगों के हितों के लिये काम करने के लिये राजनीति में आता है. यहां शनि जनता के हितैशी है तथा मंगल व्यक्ति में नेतृ्त्व का गुण दे रहा है. दोनों का संबध व्यक्ति को राजनेता बनने के गुण दे रहा है.

3. अमात्यकारक : राहु/ सूर्य (Amatyakarak Rahu and Sun)
राहु या सूर्य के अमात्यकारक बनने से व्यक्ति रुचि होने पर राजनीति के क्षेत्र में सफलता पाने की संभावना रखता है. राहु के प्रभाव से व्यक्ति नीतियों का निर्माण करना व उन्हें लागू करने की ण्योग्यता रखता है. राहु के प्रभाव से ही व्यक्ति में स्थिति के अनुसार बात करने की योग्यता आती है. सूर्य अमात्यकारक होकर व्यक्ति को समाज में उच्च पद की प्राप्ति का संकेत देता है. नौ ग्रहों में सूर्य को राजा का स्थान दिया गया है.

4. नवाशं व दशमाशं कुण्डली (Navamsha and Dashamasha Kundli)
जन्म कुण्डली के योगों को नवाशं कुण्डली में देख निर्णय की पुष्टि की जाती है. किसी प्रकार का कोई संदेह न रहे इसके लिये जन्म कुण्डली के ग्रह प्रभाव समान या अधिक अच्छे रुप में बनने से इस क्षेत्र में दीर्घावधि की सफलता मिलती है. दशमाशं कुण्डली को सूक्ष्म अध्ययन के लिये देखा जाता है. तीनों में समान या अच्छे योग व्यक्ति को राजनीति की उंचाईयों पर लेकर जाते है.

5. अन्य योग  (Other planets combination)
(1)  नेतृ्त्व के लिये व्यक्ति का लग्न सिंह अच्छा समझा जाता है. सूर्य, चन्द्र, बुध व गुरु धन भाव में हों व छठे भाव में मंगल, ग्यारहवे घर में शनि, बारहवें घर में राहु व छठे घर में केतु हो तो एसे व्यक्ति को राजनीति विरासत में मिलती है. यह योग व्यक्ति को लम्बे समय तक शासन में रखता है. जिसके दौरान उसे लोकप्रियता व वैभव की प्राप्ति होती है.

(ख) कर्क लग्न की कुण्डली में दशमेश मंगल दूसरे भाव में , शनि लग्न में, छठे भाव में राहु, तथा लग्नेश की दृष्टि के साथ ही सूर्य-बुध पंचम या ग्यारहवें घर में हो तो व्यक्ति को यश की प्राप्ति होती.

(ग) वृ्श्चिक लग्न की कुण्डली में लग्नेश बारहवे में गुरु से दृ्ष्ट हो शनि लाभ भाव में हो, राहु -चन्द्र चौथे घर में हो, शुक्र स्वराहि के सप्तम में लग्नेश से दृ्ष्ट हो तथा सूर्य ग्यारहवे घर के स्वामी के साथ युति कर शुभ स्थान में हो और साथ ही गुरु की दशम व दूसरे घर पर दृ्ष्टि हो तो व्यक्ति प्रखर व तेज नेता बनता है. 

प्रशासनिक अधिकारी बनने के लिये ज्योतिष योग (Astrology Yoga for Administrative Officer Carrer)


image Astrology Yoga for Administrative Officer Carrer

कुण्डली में बनने वाले योग ही बताते है कि व्यक्ति की आजीविका का क्षेत्र क्या रहेगा. प्रशासनिक सेवाओं में प्रवेश की लालसा अधिकांश लोगों में रहती है. आईये देखें कि कौन से योग प्रशासनिक अधिकारी के कैरियर में आपको सफलता दिला सकते हैं.

1. उच्च शिक्षा के योग  (Astrology Yoga for Higher Studies)
आई. ए. एस. जैसे उच्च पद की प्राप्ति के लिये व्यक्ति की कुण्डली में शिक्षा का स्तर अच्छा होना चाहिए. शिक्षा के लिये शिक्षा के भाव  दूसरा, चतुर्थ भाव, पंचम भाव व नवम भाव को देखा जाता है. इन भाव/भावेशों के बली होने पर व्यक्ति की शिक्षा उतम मानी जाती है. शिक्षा से जुडे ग्रह है बुध, गुरु व मंगल इसके अतिरिक्त  शिक्षा को विशिष्ट बनाने वाले योग भी व्यक्ति की सफलता का मार्ग खोलते है. शिक्षा के अच्छे होने से व्यक्ति नौकरी की परीक्षा में बैठने के लिये योग्यता आती है.

2. आवश्यक भाव: छठा, पहला व दशम घर  (Importance of Bhava - 1st, 6th and 10th house)
किसी भी प्रतिस्पर्धात्मक परीक्षा में सफलता के लिये लग्न, षष्टम, तथा दशम भावो/ भावेशों का शक्तिशाली होना तथा इनमे पारस्परिक संबन्ध होना आवश्यक है. ये भाव/ भावेश जितने समर्थ होगें और उनमें पारस्परिक सम्बन्ध जितने गहरे होगें उतनी ही उंचाई तक व्यक्ति अपनी नौकरी में जा सकेगा.

इसके अतिरिक्त सफलता के लिये पूरी तौर से समर्पण तथा एकाग्र मेहनत की आवश्यकता होती है. इन सब गुणौ का बोध तीसरा घर कराता है. जिससे पराक्रम के घर के नाम से जाना जाता है. तीसरा भाव इसलिये भी बहुत महत्वपूर्ण है क्योकी यह दशम घर से छठा घर है. इस घर से व्यवसाय के शत्रु देखे जाते है.

इसके बली होने से व्यक्ति में व्यवसाय के शत्रुओं से लडने की क्षमता आती है. यह घर उर्जा देता है. जिससे सफलता की उंचाईयों को छूना संभव हो पाता है.

3. आवश्यक ग्रह (Graha in your Horoscope)
कुण्डली के सभी ग्रहों में सूर्य को राजा की उपाधि दी गई है. तथा गुरु को ज्ञान का कारक कहा गया है. ये दो ग्रह मुख्य रुप से प्रशासनिक प्रतियोगिताओं में सफलता और उच्च पद प्राप्ति मे सहायक ग्रह माना जाता है. एसे अधिकारियों के लिये जिनका कार्य मुख्य रुप से जनता की सेवा करना है.

उनके लिये शनि का महत्व अधिक हो जाता है. क्योकि शनि जनता व प्रशासनिक अधिकारियों के बीच के सेतू है. कई प्रशासनिक अधिकारी नौकरी करते समय भी लेखन को अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाने में सफल हुए है. यह मंगल व बुध की कृपा के बिना संभव नहीं है. मंगल को स्याही व बुध को कलम कहा जाता है.

प्रशासनिक अधिकारी मे चयन के लिये सूर्य, गुरु, मंगल, राहु व चन्द्र आदि ग्रह बलिष्ठ (Guru, Surya, Mangal, Rahu and Chandra should be powerful)  होने चाहिए. मंगल से व्यक्ति में साहस, पराक्रम व जोश आता है. जो प्रतियोगीताओं में सफलता की प्राप्ति के लिये अत्यन्त आवश्यक है.

4. अमात्यकारक ग्रह की भूमिका (Role of Amatyakarak Graha)
प्रशासनिक अधिकारी के पद की प्राप्ति के लिये अमात्यकारक ग्रह बडी भूमिका निभाता है. अगर किसी कुण्डली में अमात्यकारक बली है. (स्वग्रही, उच्च के, वर्गोतम) आदि स्थिति में हों. तथा केन्द्र में है. इसके अतिरिक्त बलशाली अमात्यकारक (Powerful Amatyakarak Graha) तीसरे व एकादश घरों में होने पर व्यक्ति को अपने जीवन काल में काफी उंचाई तक जाने का मौका मिलता है.

इस स्थिति में व्यक्ति को एसे काम करने के अवसर मिलते है. जिनमें वह आनन्द का अनुभव कर पाता है. अमात्यकारक नवाशं में आत्मकारक से केन्द्र अथवा तीसरे या एकादश भाव में हो तो व्यक्ति को सुन्दर व बाधा रहित नौकरी मिलती है. इसलिये अमात्यकारक की नवाशं में स्थिति भी देखी जाती है.

5. दशायें (Dashas)
व्यक्ति की कुण्डली में नौकरी में सफलता मिलने की संभावनाएं अधिक है. और दशा भी उन्ही ग्रहों से संबन्धित मिल जाये तो सफलता अवश्य मिलती है. व्यक्ति को आई.ए.एस. बनने के लिये दशम, छठे, तीसरे व लग्न भाव/भावेशों की दशा मिलनी अच्छी होगी.

6 अन्य योग (Other astrology Yoga)
क) भाव एकादश का स्वामी नवम घर में हो या दशम भाव के स्वामी से युति या दृ्ष्ट हो तो व्यक्ति के प्रशासनिक अधिकारी बनने की संभावना बनती है.

ख) पंचम भाव में उच्च का गुरु या शुक्र होने पर उसपर शुभ ग्रहों का प्रभाव हो तथा सूर्य भी अच्छी स्थिति में हो तो व्यक्ति इन्ही ग्रहों की दशाओं में उच्च प्रशासनिक अधिकारी बनता है.

ग) लग्नेश और दशमेश स्वग्रही या उच्च के होकर केन्द्र या त्रिकोण में हो और गुरु उच्च का या स्वग्रही हो तो भी व्यक्ति की प्रशासनिक अधिकारी बनने की प्रबल संभावना होती है.

घ) कुण्डली के केन्द्र में विशेषकर लग्न में सूर्य, और बुध हों और गुरु की शुभ दृ्ष्टि इन पर हो तो जातक प्रशासनिक सेवा में उच्च पद प्राप्त करने में सफल रहता है

बालारिष्ट योग

जीवन मे आयु का विचार गुरु से किया जाता है और मौत का विचार राहु से किया जाता है,कुंडली में गोचर का गुरु जब जब जन्म के राहु से युति लेता है,या राहु जन्म के गुरु से युति लेता है,अथवा गोचर का राहु गोचर के गुरु से युति लेता है,अथवा गुरु और राहु का षडाष्टक योग बनता है,अथवा गुरु के साथी ग्रह राहु से अपनी मित्रता कर रहे हो,अथवा राहु के आसपास अपनी युति मिला रहे हो,तो बालारिष्ट-योग की उत्पत्ति हो जाती है,इस योग में जातक की मौत निश्चित होती है,लेकिन मौत भी आठ प्रकार की होती है,जिसके अन्दर तीन मौत भयानक मानी जाती है।
शरीर की मौत जो बारह  भावों के अनुसार उनके रिस्तेदारों के सहित मानी जाता है,धन की हानि जो बारह भावों के कारकों के द्वारा जानी जाती है,मन की हानि जो बारह भावों के सम्बन्धियों से बिगाडखाता या दुश्मनी के रूप में मानी जाती है।
गुरु जीव का कारक है
गुरु जो जीव का कारक है,गुरु जो प्रकृति के द्वारा दी गयी सांसों का कारक है,गुरु जो जीवन के हर भाव का प्रोग्रेस का कारक है,गुरु अगर मौत का भी मालिक है तो वह मौत भी किसी न किसी प्रकार के फ़ायदे के लिये ही देता है,गुरु अगर दुशमनी का मालिक है तो वह दुश्मनी भी किसी बहुत बडे फ़ायदे के लिये मानी जाती है,गुरु अगर खर्चे के भाव का मालिक है तो खर्चा भी किसी न किसी अच्छे कारण के लिये ही करवायेगा। गुरु की युति अगर क्रूर ग्रहों से भी हो जाती है तो गुरु के प्रभाव में क्रूर ग्रह भी क्रूरता तो करते है लेकिन व्यक्ति या समाज की भलाई के करते है,गुरु के साथ पापी ग्रह मिल जाते है तो वे पाप भी भलाई के लिये ही करते है,मतलब गुरु का साथ जिस ग्रह के साथ मिल जाता है उसी की "पौ बारह हो जाती है" इस कहावत का रूप भी गुरु के अनुसार ही माना जाता है मतलब जब गुरु किसी भी भाव में प्रवेश करता है तो जीत का ही संकेत देता है,जब वह मौत के भाव में प्रवेश करता है तो जो भी जैसी भी भावानुसार मौत होती है वह आगे के जीवन के लिये या आगे की सन्तान की भलाई के लिये ही होती है। गुरु हवा कारक है उसे ठोस रूप में नही प्राप्त किया जा सकता है गुरु सांस का कारक है सांस को कभी बांध कर नही रखा जा सकता है। गुरु की राहु के साथ नही निभती है,राहु के साथ मिलकर गुरु चांडाल योग बन जाता है,एक गुरु की हैसियत चांडाल की हो जाती है वह अपने ज्ञान को मौज मस्ती के साधनो में खर्च करना शुरु कर देता है,उसे बचाने से अधिक मारने के अन्दर मजा आने लगता है,वह अपने पराक्रम को धर्म और समाज की भलाई के प्रति न सोचकर केवल बुराई और बरबादी के लिये सोचने का काम करने लगता है,गुरु जो पीले रंग का मालिक है अपने अन्दर राहु रूपी भेडिया को छुपाकर धर्म के नाम पर यौन शोषण,धन का शोषण,जीवन का शोषण करना चालू कर देता है। गुरु जो ज्ञान का कारक है वह उसे मारण मोहन वशीकरण उच्चाटन के रूप में प्रयोग करना शुरु कर देता है,वह पीले कपडों में बलि स्थानों मे जाकर जीव की बलि देना शुरु कर देता है,जब कोई भी ज्ञान मानव जीवन या जीव के अहित में प्रयोग किया जायेगा तो वह चांडाल की श्रेणी में चला जायेगा,और यही गुरु चांडाल योग की परिभाषा कही जायेगी। इसी बात को आज के युग में सूक्षमता से देखें तो जो व्यक्ति आतंकवादी गतिविधियों में लगे है,जो अकारण ही जीव हत्या और मानव के वध के उपाय सोचते है,जो खून बहाने में अपनी अतीव इच्छा जाहिर करते है,जिनके पास वैदिक ज्ञान तो है लेकिन उस ज्ञान के द्वारा वे बजाय किसी की सहायता करने के उस ज्ञान की एवज में धन को प्राप्त करते है,उसे महंगे होटलों में जाकर बीफ़ और मदिरा के साथ उपभोग करते है,उनके वैदिक ज्ञान का प्रयोग गुरु चांडाल की श्रेणी में ही माना जायेगा,"अपना काम बनता,भाड में जाये जनता",का प्रयोग केवल धर्म गुरुओं के प्रति ही नही माना जा सकता है,वह किसी प्रकार के प्राप्त किये गये ज्ञान के प्रति भी माना जा सकता है,जैसे राजनीति के अन्दर असीम ज्ञान को हासिल कर लिया और उस ज्ञान का प्रयोग जनहित में लगाना था लेकिन राहु के द्वारा दिमाग में असर आजाने से वे उसे केवल अपने अहम के लिये खर्च करने लगे,राहु जो सभी तरह से विराट रूप का मालिक है खुद को विराट रूप में दिखाने की कोशिश करने लगे,राहु जो शुक्र के साथ मिलकर चमक दमक का मालिक बना देता है,साज सज्जा से युक्त व्यक्तियों की श्रेणी में लेजाकर खडा कर देता है के रूप में अपने को प्रदर्शित करने में लग गये,लेकिन गुरु का अपना राज्य है वह सांसों के रूप में व्यक्ति के जीव के अन्दर अपना निवास बनाकर बैठा है,उसकी जब इच्छा होगी वह अपनी सांसों को समेट कर चला जायेगा,फ़िर इस देह को राहु ही अपनी रसायनिक क्रिया के द्वारा सडायेगा,या ईंधन बनकर जलायेगा,या विस्फ़ोट में उडायेगा,अथवा आसमानी यात्रा में चिथडे करके उडायेगा,आदि कारणों राहु का कारण भी सामने अवश्य आयेगा।
जीव के साथ राहु का समागम
राहु वास्तव में छाया ग्रह है,यह अपने ऊपर कोई आक्षेप नही लेता है,यह एक बिन्दु की तरह से है जो जीव के उसी के रूप में आगे पीछे चलता है,कभी जीव का साथ नही छोडता है,इसके अन्दर एक अजीब सी शक्ति होती है,जब जीव का दिमाग इसके अन्दर फ़ंस जाता है तो वह जीव के साथ जो नही होना होता है वह करवा देता है। यह तीन मिनट की गति से कुंडली में प्रतिदिन की औसत चाल चलता है,इसका भरोसा नही होता है,कि सुबह यह क्या कर रहा है दोपहर को क्या करेगा और शाम होते ही यह क्या दिखाना शुरु कर देगा। राहु को ही कालपुरुष की संज्ञा दी गयी है,वह विराट रूप में सभी के सामने है उसकी सीमा अनन्त है,उसकी दूरी को कोई नाप नही सका है,केवल उसकी संज्ञा नीले रंग के रूप में अनन्त आकाश की ऊंचाइयों में देखी जा सकती है,यह केतु से हमशा विरोध में रहता है,और उसकी उल्टी दिशा का बोधक होता है,जो केतु सहायता के रूप में सामने आता है यह उसी का बल हरण करने के बाद उसकी शक्ति और बोध दोनो को बेकार करने के लिये अपनी योग्यता का प्रमाण देने से नही चूकता है। सूर्य के साथ अपनी युति बनाते ही वह पिता या पुत्र को आलसी बना देता है,जो कार्य जीवन के प्रति उन्नति देने वाले होते है वे आलस की बजह से पूरे नही हो पाते है,वह आंखो को भ्रम में डाल देता है होता कुछ है और वह दिखाना कुछ शुरु कर देता है। जातक के साथ जो भी कार्य चल रहा होता है उसके अन्दर असावधानी पैदा करने के बाद उस कार्य को बेकार करने के लिये अपनी शक्ति को देता है,पलक झपकते ही आंख की किरकिरी बनकर सडक में मिला देता है,सूर्य के साथ जब भी मिलता है तो केवल जो भी सुनने को मिलता है वह अशुभ ही सुनने को मिलता है,जातक के स्वास्थ्य में खराबी पैदा करने के लिये राहु और सूर्य की युति मुख्य मानी जाती है। राहु से अष्टम में जब भी सूर्य का आना होता है तो या तो बुखार परेशान करता है,अथवा किसी सूर्य से सम्बन्धित कारक का खात्मा सुनने को मिलता है।
बालारिष्ट
गुरु और राहु दोनो मिलकर जहरीली गैस जैसा उपाय करते है,घर परिवार समाज वातावरण भोजन पानी आदि जीवन के सभी कारक इतना गलत प्रभाव देना चालू कर देते है कि व्यक्ति का जीवन दूभर हो जाता है,अगर व्यक्ति घर वालों के द्वारा परेशान किया जा रहा है तो पडौस के लोग भी उसे परेशान कर देते है,वह पडौस से भी दूर जाना चाहता है तो उसे कालोनी या गांव के लोग परेशान करना चालू कर देते है,जब कि उसकी कोई गल्ती नही होती है केवल वह अपने अन्दर के हाव भाव इस तरह से प्रदर्शित करने लगता है जैसे कि उसके पास कोई बहुत बडी आफ़त आने वाली हो और वह हर बात में डर रहा हो। राहु जो विराट है वह जीव को अपने में समालेने के लिये आसपास अपना माहौल फ़ैला लेता है,और जीव किसी भी तरह से उसके चंगुल में आ ही जाता है,बहुत ही भाग्य या पौरुषता होती है तो जीव बच पाता है,अन्यथा वह राहु का ग्रास तो बन ही जाता है।  

राहु और वैधव्य योग

राहु को रूह की उपाधि दी गयी है। जब लगन में हो तो खोपडी पर सवार भूत की तरह काम करता है,धन भाव में हो तो पता नही क्या कह उठे और कहा हुआ सच होने लगे,तीसरे भाव मे हो तो बीसियों लोगों की शक्ति भी उसके सामने फ़ेल हो जाये यानी वह जो कहे वह बात पूरी मानी जाये लडाई पर उतर जाये तो भीड को चीरता हुआ अपने कार्य को पूरा कर जाये चौथे भाव में हो तो हमेशा दिमागी शक के कारण अपने ही जीवन को नर्क बनाले पंचम में हो तो बुद्धि को इतना घुमाये कि परिवार और बुद्धि का पता ही नही लगे कि कितनी बुद्धि है और परिवार कहां पर है, छठे भाव में हो तो अवसर के आते ही कर्जा दुश्मनी बीमारी पर भूत की तरह सवाल हो जाये सप्तम में हो जीवन साथी पर भारी रहे और हमेशा जीवन साथी को प्राप्त करने के लिये अपनी नये नये गुण प्रकट करता रहे साथ ही जो भी जीवन साथी मिले उससे उसकी संतुष्टि नही हो अष्टम में हो तो जीवन साथी के अन्दर कामुकता का इतना प्रभाव देदे कि जीवन में एकान्तीवास और दूर रहने के कारण पैदा कर दे,पहले तो अष्टम का राहु शादी ही नही होने देता है और शादी हो भी जाये तो दूरिया बना दे,नवे भाव में हो तो पूर्वजों की इतनी मान्यता दे दे कि जातक हमेशा अपने पूर्वजों के नाम को बढाता जाये या नीचे गिराता जाये साथ ही धर्म में केवल उन्ही धर्मो को मान्यता दे जो रूह से सम्बन्धित होते है दसवें भाव में हो तो हमेशा बाहर के बडे काम करने की सोचे और कार्य करे तो भूत की तरह लग जाये और नही करे तो आलस से महीनो एक ही स्थान पर पडा रहे ग्यारहवे भाव में हो तो या तो शिक्षा के कार्य नाम लेने वाले करता जाये या शिक्षा का नाम ही बदनाम कर दे,दोस्तों की इतनी भरमार हो कि रोजाना के खाने पीने के खर्चे दोस्ती में ही कमाई को पूरी कर दे और बारहवां राहु या तो कारावास की सजा दिलवादे या जंगल वीराने में आवास की सुविधा देकर अपनी क्षमता को पूरा करने के लिये अपनी शक्ति को अथवा इतना डरा दे कि जीवन नरक की तरह से बीतता रहे।

सबसे खतरनाक राहु सप्तम का माना जाता है,राहु छाया ग्रह है और जीवन में लडाई उसी ग्रह से की जा सकती है जो दिखाई देता हो और सामने उसकी शक्ति की प्रकट प्रत्यक्ष हो,राहु अद्रश्य शक्ति के रूप में जब सामने हो तो कैसे लडाई जीती जा सकती है। देखने में साधारण सा दिखाई देने वाला व्यक्ति जीवन साथी के रूप में हो लेकिन उसकी शक्ति छुपे रूप में इतनी हो कि पहिचाने जाने तक वह कितना अहित कर जाये कोई पता नही हो,इसके साथ ही अगर व्यक्ति के जीवन साथी की मौत समय से पहले हो जाये और व्यक्ति अपनी वैवाहिक जिन्दगी को दूसरे जीवन साथी के साथ गुजारने का मानस बनाये तो वह राहु के रूप में रूह इतना परेशान करे कि जीवन साथी के रूप में नया जीवन साथी घर छोड कर ही भाग जाये या किसी न किसी बडी बीमारी से ग्रसित होकर एक कोने में पडा कराहता रहे। राहु का कार्य विस्तार के रूप में भी जाना जाता है,अगर सप्तम में राहु है तो वह या तो जीवन साथी के जीवन को इतना आगे बढा दे कि वह अपनी औकात को भी नही समझ पाये और पलक झपकते ही ऊंचाइयों पर चढता चला जाये,साथ ही अपने जीवन साथी के घेरे को इतना विस्तृत कर दे कि पहिचानना भारी पड जाये,और अगर भारी पड जाये तो रोजाना जीवन साथी पागल जैसे रोल अदा करे और भूत सा बना घूमता रहे,औरत है तो दांत बाहर बाल बिखरे हुये मर्द है तो बढी हुई दाढी और गन्दे दांत बदबूदार सांसे निकालकर जीवन को नरक बना दे.नवा भाव वंशावली को बताने वाला और वंश का नाम करने वाला होता है,धर्म और मर्यादा को रखने वाला होता है,सप्तम का राहु सबसे पहले नवें भाव को देखता है,अच्छा या बुरा प्रभाव वह पहले इसी भाव पर प्रकट करता है,दूसरी पंचम नजर ग्यारहवें भाव पर पडने के कारण या तो लाभ वाले मामले को बहुत आगे बढाने वाला हो या अपने कारण पैदा करने के बाद लाभ की सीमा को गिराने वाला हो साथ दोस्तों और बडे भाई बहिनो के प्रति भी दिक्कत देने वाला या ऊंचा उठाने वाला माना जाता है,लगन पर सप्तम की द्रिष्टि पडने से केतु के अन्दर या तो साधनो के रूप में बल भरता जाये या इतना घोर बना दे कि लोग पास बैठने से भी दूर रहे,तीसरे भाव में जाकर या तो घर से बाहर जाकर अपने प्रदर्शन को ऊंचा बना दे या गुपचुप रूप से बाहर निकलने का भाव बना दे।

वृश्चिक का राहु बनाम शमशान का भूत

वृश्चिक राशि मंगल की सकारात्मक राशि है। भावनात्मक राशि के लिये मेष को जाना जाता है। राहु को ग्रहों में छाया ग्रह के रूप मे जाना जाता है,लेकिन विस्तार की नजर से इस छाया ग्रह का वही प्रभाव वही सामने आता है जैसे कडक धूप के अन्दर छाया का आनन्द आता है,या सादा से दिखने वाले तार में बिजली का करण्ट झटका मारता है या एक बुद्धू से दिखाई देने वाले व्यक्ति के अन्दर से असीम ज्ञान का भण्डार उमड पडता है। इस राहु के बारे में कहा जाता है कि बारह साल में कचडे के दिन भी घूम जाते है,या बेकार से लोग राख से साख पैदा कर देते है अथवा बडी बडी दवाइयों के फ़ेल होने के बाद भी सादा सी भभूत काम कर जाती है। वैसे सादा व्यक्ति के लिये इस राशि का राहु बहुत ही खतरनाक माना जाता है,इस राहु के जन्म समय मे वृश्चिक राशि में होने के समय मे राहु की दशा या राहु के गोचर के समय जिस जिस भाव में जिस जिस ग्रह पर अपना प्रभाव डालता है वह भाव ग्रह अपने अपने अनुसार समाप्त होता जाता है। राहु को कचडा अगर माना जाये तो यह राहु कबाडी का काम करने वाले लोगों को और मौत को पेशा के रूप में अपनाने वाले लोगों के लिये भी माना जाना जाता है। इस राहु का कारण अगर व्यक्ति स्थान या नाम के लिये लिया जाता है तो आम आदमी के अन्दर भय का वातावरण पैदा करने के लिये और डरने के लिये भी माना जाता है। जाति से इस राहु का प्रभाव मुस्लिम जाति के लिये भी माना जाता है जो लोग खतरनाक स्थानों में निवास करते है,समुदाय बनाकर हत्या और डराकर राज करने वाले लोगों के लिये भी यह राहु अपने अनुसार कार्य करने वाला माना जाता है। जो लोग दक्षिण पश्चिम दिशा में घर के संडास को बना लेते है उनकी कुंडली में राहु इस राशि में किसी न किसी प्रकार से आकस्मिक हादसे देने का कारक बन जाता है। इस राशि में राहु के होने से केतु का स्थान धन की राशि में होना वास्तविक है,केतु का स्थान धन की राशि में होने से नकारात्मक प्रभाव भी माना जाता है,साथ ही इस राशि में राहु के होने से भोजन आदि के लिये भी सहायक साधनों का इन्तजाम करना पडता है। या तो भोजन को किसी अन्य व्यक्ति की सहायता से खाना पडता है या भोजन के लिये अलग से चम्मच या इसी प्रकार के औजारों से भोजन करना पडता है,दाहिने अंग में लकवा जैसी बीमारी को पैदा करने के लिये इसी राहु का असर माना जाता है। जननांगो में इन्फ़ेक्सन जैसी बीमारियों के लिये भी इसी राहु को दोषी ठहराया जाता है। बायो गैस प्लांट भी इसी स्थान की उत्पत्ति मानी गयी है,साथ ही शमशानी कार्य करना और शमशान आदि की देखभाल करना नगर पालिका जैसे कार्य करना आदि भी इसी राशि के राहु की देन मानी जाती है।