Free Astrology

सुखी वैवाहिक जीवन के लिए ज्योतिषीय सलाह (Astrological suggestion for happy married life)

कुण्डली मिलान से पहले (Before kundle Milan)
विवाह से पूर्व इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि वर और कन्या की आयु में अधिक अंतर नहीं हो.आर्थिक स्थिति के कारण भी पारिवारिक जीवन में कलह उत्पन्न होता है अत: आर्थिक मामलों की अच्छी तरह जांच पड़ताल करने के बाद ही विवाह की बात आगे चलाना चाहिए.संभव हो तो वर और वधू की मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य की भी जांच करवा लेनी चाहिए इससे विवाह के पश्चात आने वाली बहुत सी उलझनें सुलझ जाती हैं.

कुण्डली और गुण मिलान (Kundli and Guna milan)
उपरोक्त बातों की जांच पड़ताल करने के बाद वर और वधू की कुण्डली मिलान (Birth Chart Matching)  कराना चाहिए.कुण्डली मिलान (marriage Match Making)  करते समय जन्म कुण्डली की सत्यता पर भी ध्यान देना चाहिए.मेलापक में 36 गुणों में से कम से कम 18 गुण मिलना शुभ होता है.मेलपाक में 18 गुण होने पर इस इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि गण मैत्री और नाड़ी दोष नहीं हो.वर वधू की राशि का मिलान भी करना चाहिए.राशि मिलान के अनुसार वर और कन्या क्रमश: अग्नि एवं वायु तत्व तथा भूमि एवं जल तत्व के होने पर वैवाहिक जीवन में सामंजस्य बना रहता है.

मेलापक में राशि विचार (Melapak Rashi Vichar)
वर और कन्या की राशियों के बीच तालमेल का वैवाहिक जीवन पर काफी असर होता है.ज्योतिषशास्त्र के अनुसार अगर वर और कन्या की राशि समान हो तो उनके बीच परस्पर मधुर सम्बन्ध रहता है.दोनों की राशियां एक दूसरे से चतुर्थ और दशम होने पर वर वधू का जीवन सुखमय होता है.तृतीय और एकादश राशि होने पर गृहस्थी में धन की कमी नहीं रहती है.ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि वर और कन्या की कुण्डली में षष्टम भाव, अष्टम भाव और द्वादश भाव में समान राशि नहीं हो.

वर और कन्या की राशि अथवा लग्न समान होने पर गृहस्थी सुखमय रहती है परंतु गौर करने की बात यह है कि राशि अगर समान हो तो नक्षत्र भेद होना चाहिए अगर नक्षत्र भी समान हो तो चरण भेद आवश्यक है.अगर ऐसा नही है तो राशि लग्न समान होने पर भी वैवाहिक जीवन के सुख में कमी आती है.

कुण्डली में दोष विचार (Kundli Dosha Vichar)
विवाह के लिए कुण्डली मिलान करते समय दोषों का भी विचार करना चाहिए.कन्या की कुण्डली में वैधव्य योग (Baidhavya Yoga), व्यभिचार योग, नि:संतान योग, मृत्यु योग एवं दारिद्र योग (Daridra Yoga) हो तो ज्योतिष की दृष्टि से सुखी वैवाहिक जीवन के यह शुभ नहीं होता है.इसी प्रकार वर की कुण्डली में अल्पायु योग, नपुंसक योग, व्यभिचार योग, पागलपन योग एवं पत्नी नाश योग रहने पर गृहस्थ जीवन में सुख का अभाव होता है.

ज्योतिषशास्त्र के अनुसार कन्या की कुण्डली में विष कन्या योग (Vish Kanya Yoga)  होने पर जीवन में सुख का अभाव रहता है.पति पत्नी के सम्बन्धों में मधुरता नहीं रहती है.हलांकि कई स्थितियों में कुण्डली में यह दोष प्रभावशाली नहीं होता है अत: जन्म कुण्डली के अलावा नवमांश और चन्द्र कुण्डली से भी इसका विचार करके विवाह किया जा सकता है. 

कुंडली मिलान,

नाड़ी दोष, भकूट दोष

  भारतीय ज्योतिष में विवाह शादी के लिए कुंडली मिलान के लिए गुण मिलान की विधि आज भी सबसे अधिक प्रचलित है। इस विधि के अनुसार वर-वधू की जन्म कुंडलियों में चन्द्रमा की स्थिति के आधार पर निम्नलिखित अष्टकूटों का मिलान किया जाता है।
1)    वर्ण
2)    वश्य
3)    तारा
4)    योनि
5)    ग्रह-मैत्री
6)    गण
7)    भकूट
8)    नाड़ी
                                                               उपरोक्त अष्टकूटों को क्रमश: एक से आठ तक गुण प्रदान किये जाते हैं, जैसे कि वर्ण को एक, नाड़ी को आठ तथा बाकी सबको इनके बीच में दो से सात गुण प्रदान किये जाते हैं। इन गुणों का कुल जोड़ 36 बनता है तथा इन्हीं 36 गुणों के आधार पर कुंडलियों का मिलान सुनिश्चित किया जाता है। 36 में से जितने अधिक गुण मिलें, उतना ही अच्छा कुंडलियों का मिलान माना जाता है। 36 गुण मिलने पर उत्तम, 36 से 30 तक बहुत बढ़िया, 30 से 25 तक बढ़िया तथा 25 से 20 तक सामान्य मिलान माना जाता है। 20 से कम गुण मिलने पर कुंडलियों का मिलान शुभ नहीं माना जाता है।

                                                              किन्तु व्यवहारिक रूप में गुण मिलान की यह विधि अपने आप में पूर्ण नहीं है तथा सिर्फ इसी विधि के आधार पर कुंडलियों का मिलान सुनिश्चित कर देना उचित नहीं है। इस विधि के अनुसार वर-वधू की कुंडलियों में नवग्रहों में से सिर्फ चन्द्रमा की स्थिति ही देखी जाती है तथा बाकी के आठ ग्रहों के बारे में बिल्कुल भी विचार नहीं किया जाता जो किसी भी पक्ष से व्यवहारिक नहीं है क्योंकि नवग्रहों में से प्रत्येक ग्रह का अपना महत्त्व है तथा किसी भी एक ग्रह के आधार पर इतना महत्त्वपूर्ण निर्णय नहीं लिया जा सकता। इस लिए गुण मिलान की यह विधि कुंडलियों के मिलान की विधि का एक हिस्सा तो हो सकती है लेकिन पूर्ण विधि नहीं। आइए अब विचार करें कि एक अच्छे ज्योतिषि को कुंडलियों के मिलान के समय किन पक्षों पर विशेष ध्यान देना चाहिए।

                                                            सबसे पहले एक अच्छे ज्योतिषि को यह देखना चाहिए कि क्या वर-वधू दोनों की कुंडलियों में सुखमय वैवाहिक जीवन के लक्ष्ण विद्यमान हैं या नहीं। उदाहरण के लिए अगर दोनों में से किसी एक कुंडली मे तलाक या वैध्वय का दोष विद्यमान है जो कि मांगलिक दोष, पित्र दोष या काल सर्प दोष जैसे किसी दोष की उपस्थिति के कारण बनता हो, तो बहुत अधिक संख्या में गुण मिलने के बावज़ूद भी कुंडलियों का मिलान पूरी तरह से अनुचित हो सकता है। इसके पश्चात वर तथा वधू दोनों की कुंडलियों में आयु की स्थिति, कमाने वाले पक्ष की भविष्य में आर्थिक सुदृढ़ता, दोनों कुंडलियों में संतान उत्पत्ति के योग, दोनों पक्षों के अच्छे स्वास्थय के योग तथा दोनों पक्षों का परस्पर शारीरिक तथा मानसिक सामंजस्य देखना चाहिए। उपरोक्त्त विष्यों पर विस्तृत विचार किए बिना कुंडलियों का मिलान सुनिश्चित करना मेरे विचार से सर्वथा अनुचित है। इस लिए कुंडलियों के मिलान में दोनों कुंडलियों का सम्पूर्ण निरीक्षण करना अति अनिवार्य है तथा सिर्फ गुण मिलान के आधार पर कुंडलियों का मिलान सुनिश्चित करने के परिणाम दुष्कर हो सकते हैं।

                                                            मैने अपनी ज्योतिष की प्रैक्टिस के दौरान कुंडली मिलान के ऐसे बहुत से केस देखे हैं जिनमें सिर्फ गुण मिलान की विधि से ही 25 से अधिक गुण मिलने के कारण वर-वधू की शादी करवा दी गई तथा कुंडली मिलान के अन्य महत्वपूर्ण पहलुओं पर ध्यान नहीं दिया गया जिसके परिणाम स्वरुप इनमें से बहुत से केसों में शादी के बाद पति पत्नि में बहुत तनाव रहा तथा कुछ केसों में तो तलाक और मुकद्दमें भी देखने को मिले। अगर 28-30 गुण मिलने के बाद भी तलाक, मुकद्दमें तथा वैधव्य जैसी परिस्थितियां देखने को मिलती हैं तो इसका सीधा सा मतलब निकलता है कि गुण मिलान की प्रचलित विधि सुखी वैवाहिक जीवन बताने के लिए अपने आप में न तो पूर्ण है तथा न ही सक्षम। इसलिए इस विधि को कुंडली मिलान की विधि का एक हिस्सा मानना चाहिए न कि अपने आप में एक सम्पूर्ण विधि।

नाड़ी दोष, भकूट दोष

रतीय ज्योतिष में कुंडली मिलान के लिए प्रयोग की जाने वाली गुण मिलान की विधि में मिलाए जाने वाले अष्टकूटों में नाड़ी और भकूट को सबसे अधिक गुण प्रदान किए जाते हैं। नाड़ी को 8 तथा भकूट को 7 गुण प्रदान किए जाते हैं। इस तरह अष्टकूटों के इस मिलान में प्रदान किए जाने वाले 36 गुणों में से 15 गुण केवल इन दो कूटों अर्थात नाड़ी और भकूट के हिस्से में ही आ जाते हैं। इसी से गुण मिलान की विधि में इन दोनों के महत्व का पता चल जाता है। नाड़ी और भकूट दोनों को ही या तो सारे के सारे या फिर शून्य गुण प्रदान किए जाते हैं, अर्थात नाड़ी को 8 या 0 तथा भकूट को 7 या 0 अंक प्रदान किए जाते हैं। नाड़ी को 0 अंक मिलने की स्थिति में वर-वधू की कुंडलियों में नाड़ी दोष तथा भकूट को 0 अंक मिलने की स्थिति में वर-वधू की कुंडलियों में भकूट दोष बन जाता है। भारतीय ज्योतिष में प्रचलित धारणा के अनुसार इन दोनों दोषों को अत्यंत हानिकारक माना जाता है तथा ये दोनों दोष वर-वधू के वैवाहिक जीवन में अनेक तरह के कष्टों का कारण बन सकते हैं और वर-वधू में से किसी एक या दोनों की मृत्यु का कारण तक बन सकते हैं। तो आइए आज भारतीय ज्योतिष की एक प्रबल धारणा के अनुसार अति महत्वपूरण माने जाने वाले इन दोनों दोषों के बारे में चर्चा करते हैं। 

                                                                      आइए सबसे पहले यह जान लें कि नाड़ी और भकूट दोष वास्तव में होते क्या हैं तथा ये दोनों दोष बनते कैसे हैं। नाड़ी दोष से शुरू करते हुए आइए सबसे पहले देखें कि नाड़ी नाम का यह कूट वास्तव में होता क्या है। नाड़ी तीन प्रकार की होती है, आदि नाड़ी, मध्या नाड़ी तथा अंत नाड़ी। प्रत्येक व्यक्ति की जन्म कुंडली में चन्द्रमा की किसी नक्षत्र विशेष में उपस्थिति से उस व्यक्ति की नाड़ी का पता चलता है। नक्षत्र संख्या में कुल 27 होते हैं तथा इनमें से किन्हीं 9 विशेष नक्षत्रों में चन्द्रमा के स्थित होने से कुंडली धारक की कोई एक नाड़ी होती है। उदाहरण के लिए :

चन्द्रमा के निम्नलिखित नक्षत्रों में स्थित होने से कुंडली धारक की आदि नाड़ी होती है :

अश्विनी, आर्द्रा, पुनर्वसु, उत्तर फाल्गुणी, हस्त, ज्येष्ठा, मूल, शतभिषा तथा पूर्व भाद्रपद। 

चन्द्रमा के निम्नलिखित नक्षत्रों में स्थित होने से कुंडली धारक की मध्य नाड़ी होती है :

भरणी, मृगशिरा, पुष्य, पूर्व फाल्गुणी, चित्रा, अनुराधा, पूर्वाषाढ़ा, धनिष्ठा तथा उत्तर भाद्रपद।

चन्द्रमा के निम्नलिखित नक्षत्रों में स्थित होने से कुंडली धारक की अंत नाड़ी होती है :

कृत्तिका, रोहिणी, श्लेषा, मघा, स्वाती, विशाखा, उत्तराषाढ़ा, श्रवण तथा रेवती।

                                                                        गुण मिलान करते समय यदि वर और वधू की नाड़ी अलग-अलग हो तो उन्हें नाड़ी मिलान के 8 में से 8 अंक प्राप्त होते हैं, जैसे कि वर की आदि नाड़ी तथा वधू की नाड़ी मध्या अथवा अंत। किन्तु यदि वर और वधू की नाड़ी एक ही हो तो उन्हें नाड़ी मिलान के 8 में से 0 अंक प्राप्त होते हैं तथा इसे नाड़ी दोष का नाम दिया जाता है। नाड़ी दोष की प्रचलित धारणा के अनुसार वर-वधू दोनों की नाड़ी आदि होने की स्थिति में तलाक या अलगाव की प्रबल संभावना बनती है तथा वर-वधू दोनों की नाड़ी मध्य या अंत होने से वर-वधू में से किसी एक या दोनों की मृत्यु की प्रबल संभावना बनती है। नाड़ी दोष को निम्नलिखित स्थितियों में निरस्त माना जाता है :

यदि वर-वधू दोनों का जन्म एक ही नक्षत्र के अलग-अलग चरणों में हुआ हो तो वर-वधू की नाड़ी एक होने के बावजूद भी नाड़ी दोष नहीं बनता।

यदि वर-वधू दोनों की जन्म राशि एक ही हो किन्तु नक्षत्र अलग-अलग हों तो वर-वधू की नाड़ी एक होने के बावजूद भी नाड़ी दोष नहीं बनता।

यदि वर-वधू दोनों का जन्म नक्षत्र एक ही हो किन्तु जन्म राशियां अलग-अलग हों तो वर-वधू की नाड़ी एक होने के बावजूद भी नाड़ी दोष नहीं बनता।

                                 नाड़ी दोष के बारे में विस्तारपूर्वक जानने के बाद आइए अब देखें कि भकूट दोष क्या होता है। यदि वर-वधू की कुंडलियों में चन्द्रमा परस्पर 6-8, 9-5 या 12-2 राशियों में स्थित हों तो भकूट मिलान के 0 अंक माने जाते हैं तथा इसे भकूट दोष माना जाता है। उदाहरण के लिए मान लीजिए कि वर की जन्म कुंडली में चन्द्रमा मेष राशि में स्थित हैं, अब :

यदि कन्या की जन्म कुंडली में चन्द्रमा कन्या राशि में स्थित हैं तो इसे षड़-अष्टक भकूट दोष का नाम दिया जाता है क्योंकि मेष राशि से गिनती करने पर कन्या राशि छठे तथा कन्या राशि से गिनती करने पर मेष राशि आठवें स्थान पर आती है।

यदि कन्या की जन्म कुंडली में चन्द्रमा धनु राशि में स्थित हैं तो इसे नवम-पंचम भकूट दोष का नाम दिया जाता है क्योंकि मेष राशि से गिनती करने पर धनु राशि नवम तथा धनु राशि से गिनती करने पर मेष राशि पांचवे स्थान पर आती है।

यदि कन्या की जन्म कुंडली में चन्द्रमा मीन राशि में स्थित हैं तो इसे द्वादश-दो भकूट दोष का नाम दिया जाता है क्योंकि मेष राशि से गिनती करने पर मीन राशि बारहवें तथा मीन राशि से गिनती करने पर मेष राशि दूसरे स्थान पर आती है।


                                                                   भकूट दोष की प्रचलित धारणा के अनुसार षड़-अष्टक भकूट दोष होने से वर-वधू में से एक की मृत्यु हो जाती है, नवम-पंचम भकूट दोष होने से दोनों को संतान पैदा करने में मुश्किल होती है या फिर सतान होती ही नहीं तथा द्वादश-दो भकूट दोष होने से वर-वधू को दरिद्रता का सामना करना पड़ता है। भकूट दोष को निम्नलिखित स्थितियों में निरस्त माना जाता है :

यदि वर-वधू दोनों की जन्म कुंडलियों में चन्द्र राशियों का स्वामी एक ही ग्रह हो तो भकूट दोष खत्म हो जाता है। जैसे कि मेष-वृश्चिक तथा वृष-तुला राशियों के एक दूसरे से छठे-आठवें स्थान पर होने के बावजूद भी भकूट दोष नहीं बनता क्योंकि मेष-वृश्चिक दोनों राशियों के स्वामी मंगल हैं तथा वृष-तुला दोनों राशियों के स्वामी शुक्र हैं। इसी प्रकार मकर-कुंभ राशियों के एक दूसरे से 12-2 स्थानों पर होने के बावजूद भी भकूट दोष नहीं बनता क्योंकि इन दोनों राशियों के स्वामी शनि हैं।

यदि वर-वधू दोनों की जन्म कुंडलियों में चन्द्र राशियों के स्वामी आपस में मित्र हैं तो भी भकूट दोष खत्म हो जाता है जैसे कि मीन-मेष तथा मेष-धनु में भकूट दोष नहीं बनता क्योंकि इन दोनों ही उदाहरणों में राशियों के स्वामी गुरू तथा मंगल हैं जो कि आपसे में मित्र माने जाते हैं।

इसके अतिरिक्त अगर दोनो कुंडलियों में नाड़ी दोष न बनता हो, तो भकूट दोष के बनने के बावजूद भी इसका असर कम माना जाता है।

                                                                     किन्तु इन दोषों के द्वारा बतायी गईं हानियां व्यवहारिक रूप से इतने बड़े पैमाने पर देखने में नहीं आतीं और न ही यह धारणाएं तर्कसंगत प्रतीत होती हैं। उदाहरण के लिए नाड़ी दोष लगभग 33 प्रतिशत कुंडलियों के मिलान में देखने में आता है कयोंकि कुल तीन नाड़ियों में से वर और वधू की नाड़ी एक होने की सभावना लगभग 33 प्रतिशत बनती है। इसी प्रकार की गणना भकूट दोष के विषय में भी करके यह तथ्य सामने आता है कि कुंडली मिलान की लगभग 50 से 60 प्रतिशत उदाहरणों में नाड़ी या भकूट दोष दोनों में से कोई एक अथवा दोनों ही उपस्थित होते हैं। और क्योंकि बिना कुंडली मिलाए विवाह करने वाले लोगों में से 50-60 प्रतिशत लोग ईन दोनों दोषों के कारण होने वाले भारी नुकसान नहीं उठा रहे इसलिए इन दोनों दोषों से होने वाली हानियों तथा इन दोनों दोषों की सार्थकता पर प्रश्नचिन्ह लग जाता है। 

                                                                  मेरे अपने अनुभव के अनुसार नाड़ी दोष तथा भकूट दोष अपने आप में दो लोगों के वैवाहिक जीवन में उपर बताई गईं विपत्तियां लाने में सक्षम नहीं हैं तथा इन दोषों और इनके परिणामों को कुंडली मिलान के अन्य महत्वपूर्ण पहलुओं के साथ ही जोड़ कर देखना चाहिए। कुंडली मिलान के इन महत्वपूर्ण पहलुओं के बारे में जानने के लिए कुंडली मिलान नामक लेख पढ़ें। नाड़ी दोष तथा भकूट दोष से होने वाले बुरे प्रभावों को ज्योतिष के विशेष उपायों से काफी हद तक कम किया जा सकता है। 

मांगलिक दोष

मांगलिक दोष-   भारतीय ज्योतिष में मांगलिक दोष की प्रचलित परिभाषा के अनुसार यह माना जाता है कि अगर मंगल ग्रह किसी कुंडली के 1,2,4,7,8 या 12वें भाव में स्थित हो तो उस कुंडली में मांगलिक दोष बन जाता है जिसके कारण कुंडली धारक की शादी में देरी हो सकती है अथवा/और उसके वैवाहिक जीवन में अनेक प्रकार की समस्याएं एवम बाधाएं आ सकती हैं तथा बहुत बुरी हालत में कुंडली धारक के पति या पत्नि की मृत्यु भी हो सकती है। इस गणना के लिए लग्न भाव को पहला भाव माना जाता है तथा वहां से आगे 12 भाव निश्चित किए जाते हैं। उदाहरण के लिए यदि किसी व्यक्ति का लग्न मेष है तो मेष, वृष, कर्क, तुला, वृश्चिक तथा मीन राशि में स्थित होने पर मंगल ग्रह उस व्यक्ति की कुंडली में क्रमश: 1,2,4,7,8 तथा 12वें भाव में आएगा और प्रचलित परिभाषा के अनुसार उस व्यक्ति की कुंडली में मांगलिक दोष बन जाएगा। मांगलिक दोष वाले व्यक्तियों को साधारण भाषा में मांगलिक कहा जाता है।
 
                                                          इस परिभाषा के आधार पर ही अगर मांगलिक दोष बनता हो तो दुनिया में 50 प्रतिशत लोग मांगलिक होंगे क्योंकि कुंडली में कुल 12 ही भाव होते हैं तथा उनमें से उपर बताए गए 6 भावों में मंगल के स्थित होने की संभावना 50 प्रतिशत बनती है। तो इस परिभाषा के अनुसार दुनिया में आधे लोगों के विवाह होने में तथा वैवाहिक जीवन में गंभीर समस्याएं होनी चाहिएं जिनमे तलाक और वैध्वय जैसी स्थितियां भी शामिल हैं। इस दोष के अतिरिक्त पित्र दोष, काल सर्प दोष, नाड़ी दोष, भकूट दोष जैसे कई दोष किसी व्यक्ति के वैवाहिक जीवन में समस्याएं पैदा करने में सक्षम हैं। इन सारी गणनाओं को अगर जोड़ दिया जाए तो दुनिया में कम से कम 80-90 प्रतिशत लोगों के वैवाहिक जीवन में गंभीर समस्याएं हैं जो कि न तो तर्कसंगत लगता है और न ही व्यवहारिक रूप से देखने में आता है। तो इस चर्चा का सार यह निकलता है कि मांगलिक दोष असल व्यवहार में उतनी कुंडलियों में देखने में नहीं आता जितना इसकी प्रचलित परिभाषा के अनुसार बताया जाता है। आइए अब देखें कि कुंडली के 1,2,4,7,8 तथा 12वें भाव में स्थित होने पर मंगल ग्रह क्या क्या संभावनाएं बना सकता है।

                                                         मंगल का कुंडली में उपर बताये 6 भावों में स्थित होना अपने आप में मांगलिक दोष बनाने के लिए पर्याप्त नहीं है तथा इन 6 भावों में स्थित मंगल विभिन्न प्रकार की संभावनाएं बना सकता है। इन भावों में स्थित मंगल वास्तव में मांगलिक दोष बना सकता है, इन भावों में स्थित मंगल कोई भी दोष या योग न बना कर लगभग सुप्त अवस्था में बैठ सकता है तथा इन भावों में स्थित मंगल मांगलिक योग बना सकता है। मांगलिक योग मंगल के द्वारा बनाया जाने वाला एक बहुत ही शुभ योग है जो किसी व्यक्ति के वैवाहिक जीवन को बहुत सुखमय तथा मंगलमय बनाने में पूरी तरह से सक्षम है। यहां पर ध्यान देने योग्य बात यह है कि मांगलिक दोष और मांगलिक योग के फल एक दूसरे से बिल्कुल ही विपरीत होते हैं किन्तु फिर भी ये दोनो योग-दोष मंगल के कुंडली में 1,2,4,7,8 तथा 12वें भाव में स्थित होने से ही बनते हैं। इस लिए मंगल के कुंडली के इन 6 भावों में स्थित होने का मतलब सिर्फ मांगलिक दोष का बनना ही नहीं होता बल्कि मांगलिक योग का बनना भी होता है जो किसी भी व्यक्ति के वैवाहिक जीवन के लिए बहुत मंगलकारी योग है।
 
                                                        इस लिए अगर आपकी कुंडली में मंगल उपर बताये गए 6 भावों में से किसी एक में स्थित है तो आप के लिए यह जान लेना आवश्यक है कि आपकी कुंडली में वास्तव में मांगलिक दोष बनता भी है या नहीं। और अगर आपकी कुंडली में मांगलिक दोष उपस्थित हो भी, तब भी कुछ महत्त्वपूर्ण बातों पर गौर करना बहुत आवश्यक है, जैसे कि कुंडली में यह दोष कितना बलवान है तथा किस आयु पर जाकर यह दोष पूर्ण रूप से जाग्रत होगा। मांगलिक दोष के बुरे प्रभावों को पूजा, रत्नों तथा ज्योतिष के अन्य उपायों के माध्यम से बहुत हद तक कम किया जा सकता है।

शुभ और अशुभ भकूट (Auspicious Bhakoot & malefic Bhakoot in Marriage Compatibility)

ज्योतिष के अनुसार वर और कन्या की कुण्डली मिलायी जाती है। कुण्डली मिलान से पता चलता है कि वर कन्या की कुण्डली मे कितने गुण मिलते हैं, कुल 36 गुणों में से 18 से अधिक गुण मिलने पर यह आशा की जाती है कि वर वधू का जीवन खुशहाल और प्रेमपूर्ण रहेगा.

भकूट का तात्पर्य वर एवं वधू की राशियों के अन्तर से है। यह 6 प्रकार का होता है जो क्रमश: इस प्रकार है:-

कुण्डली में गुण मिलान के लिए अष्टकूट(Ashtkoot) से विचार किया जाता है इन अष्टकूटों में एक है भकूट (Bhakoot)। भकूट अष्टकूटो में 7 वां है,भकूट निम्न प्रकार के होते हैं.

1. प्रथम - सप्तक 2. द्वितीय - द्वादश 3. तृतीय - एकादश 4. चतुर्थ - दशम 5. पंचम - नवम 6. षडष्टक

ज्योतिष के अनुसार निम्न भकूट अशुभ (Malefic Bhakoota) हैं.

  • द्विर्द्वादश,(Dwirdadasha or Dwitiya Dwadash Bhakoot)
  • नवपंचक (Navpanchak Bhakoota) एवं
  • षडष्टक (Shadashtak Bhakoota)

शेष निम्न तीन भकूट शुभ  (Benefic Bhakoota) हैं. इनके रहने पर भकूट दोष (Bhakoot Dosha) माना जाता है.

  • प्रथम-सप्तक,(Prathap Saptak Bhakoota)
  • तृतीय-एकादश (Tritiya Ekadash Bhakoot)
  • चतुर्थ-दशम  (Chaturth Dasham Bhakoot)

भकूट जानने के लिए वर की राशि से कन्या की राशि तक तथा कन्या की राशि से वर की राशि तक गणना करनी चाहिए। यदि दोनों की राशि आपस में एक दूसरे से द्वितीय एवं द्वादश भाव में पड़ती हो तो द्विर्द्वादश भकूट होता है। वर कन्या की राशि परस्पर पांचवी व नवी में पड़ती है तो नव-पंचम भकूट होता है, इस क्रम में अगर वर-कन्या की राशियां परस्पर छठे एवं आठवें स्थान पर पड़ती हों तो षडष्टक भकूट बनता है। नक्षत्र मेलापक में द्विर्द्वादश, नव-पंचक एवं षडष्टक ये तीनों भकूट अशुभ माने गये हैं। द्विर्द्वादश को अशुभ की इसलिए कहा गया है क्योंकि द्सरा स्थान(12th place) धन का होता है और बारहवां स्थान व्यय का होता है, इस स्थिति के होने पर अगर शादी की जाती है तो पारिवारिक जीवन में अधिक खर्च होता है।

नवपंचक (Navpanchak) भकूट को अशुभ कहने का कारण यह है कि जब राशियां परस्पर पांचवें तथा नवमें स्थान (Fifth and Nineth place) पर होती हैं तो धार्मिक भावना, तप-त्याग, दार्शनिक दृष्टि तथा अहं की भावना जागृत होती है जो दाम्पत्य जीवन में विरक्ति तथा संतान के सम्बन्ध में हानि देती है। षडष्टक भकूट को महादोष की श्रेणी में रखा गया है क्योंकि कुण्डली में 6ठां एवं आठवां स्थान(Sixth and Eighth Place) मृत्यु का माना जाता हैं। इस स्थिति के होने पर अगर शादी की जाती है तब दाम्पत्य जीवन में मतभेद, विवाद एवं कलह ही स्थिति बनी रहती है जिसके परिणामस्वरूप अलगाव, हत्या एवं आत्महत्या की घटनाएं भी घटित होती हैं। मेलापक के अनुसार षडष्टक में वैवाहिक सम्बन्ध नहीं होना चाहिए।

शेष तीन भकूट- प्रथम-सप्तम, तृतीय - एकादश तथा चतुर्थ -दशम शुभ होते हैं।  शुभ भकूट (Auspicious Bhakoot) का फल निम्न हैं

  • मेलापक में राशि अगर प्रथम-सप्तम हो तो शादी के पश्चात पति पत्नी दोनों का जीवन सुखमय होता है और उन्हे उत्तम संतान की प्राप्ति होती है।
  • वर कन्या का परस्पर तृतीय-एकादश भकूट हों तो उनकी आर्थिक अच्छी रहती है एवं परिवार में समृद्धि रहती है,
  • जब वर कन्या का परस्पर चतुर्थ-दशम भकूट हो तो शादी के बाद पति पत्नी के बीच आपसी लगाव एवं प्रेम बना रहता है।


इन स्थितियों में भकूट दोष नहीं लगता है:

  • 1. यदि वर-वधू दोनों के राशीश आपस में मित्र हों।
  • 2. यदि दोनों के राशीश एक हों।
  • 3. यदि दोनों के नवमांशेश आपस में मित्र हों।
  • 4. यदि दोनों के नवमांशेश एक हो।

विवाह के तीन सूत्र ग्रह : गुरु, शुक्र व मंगल

विवाह के तीन सूत्र ग्रह : गुरु, शुक्र व मंगल-

जब किसी व्यक्ति की कुण्डली से दांपत्य का विचार किया जाता है, तो उसके लिये गुरु, शुक्र व मंगल का विश्लेषण किया जाता है. इन तीनों ग्रहों कि स्थिति को समझने के बाद ही व्यक्ति के दांपत्य जीवन के विषय में कुछ कहना सही रहता है. आईये यहां हम दाम्पत्य जीवन से जुडे तीन मुख्य ग्रहों को समझने का प्रयास करते है.

1. गुरु की वैवाहिक जीवन में भूमिका (Role of Jupiter in Marriage Astrology)

सुखी दाम्पत्य जीवन के लिये भावी वर-वधू की कुण्डली में गुरु पाप प्रभाव से मुक्त (Jupiter should be free for malefic influence)  होना चाहिए. गुरु की शुभ दृ्ष्टि सप्तम भाव पर हों तो वैवाहिक जीवन में परेशानियों व दिक्कतों के बाद भो अलगाव की स्थिति नहीं बनती है. अर्थात गुरु की शुभता वर-वधू का साथ व उसके विवाह को  बनाये रखती है. गुरु दाम्पत्य जीवन की बाधाओं को दूर करने के साथ-साथ, संतान का कारक ग्रह भी है. अगर कुण्डली में गुरु पीडित हों तो सर्वप्रथम तो विवाह में विलम्ब होगा, तथा उसके बाद संतान प्राप्ति में भी परेशानियां आती है.

 

सुखी दाम्पत्य जीवन के लिये संतान का समय पर होना आवश्यक समझा जाता है. विवाह के बाद सर्वप्रथम संतान का ही विचार किया जाता है. अगर गुरु किसी पापी ग्रह के प्रभाव से दूषित हों तो संतान प्राप्ति में बाधाएं आती है. जब गुरु पर पाप प्रभाव हों तथा गुरु पापी ग्रह की राशि में भी स्थित हों तो निश्चित रुप से दाम्पत्य जीवन में अनेक प्रकार की समस्यायें आने की संभावनाएं बनती है.

 

2. शुक्र की वैवाहिक जीवन में भूमिका ( Role of Venus in married Life and astrology)

शुक्र विवाह का कारक ग्रह है. वैवाहिक सुख की प्राप्ति के लिये शुक्र का कुण्डली में सुस्थिर होना आवश्यक होता है. जब पति-पत्नी दोनों की ही कुण्डली में शुक्र पूर्ण रुप से पाप प्रभाव से मुक्त हो तब ही विवाह के बाद संबन्धों में सुख की संभावनाएं बनती है. इसके साथ-साथ शुक्र का पूर्ण बली व शुभ (Venus should be strong and auspicious) होना भी जरूरी होता है.

 

शुक्र को वैवाहिक संबन्धों का कारक ग्रह कहा जाता है. कुण्डली में शुक्र का किसी भी अशुभ स्थिति में होना पति अथवा पत्नी में से किसी के जीवन साथी के अलावा अन्यत्र संबन्धों की ओर झुकाव होने की संभावनाएं बनाता  है. इसलिये शुक्र की शुभ स्थिति दाम्पत्य जीवन के सुख को प्रभावित करती है.

 

कुण्डली में शुक्र की शुभाशुभ स्थिति के आधार पर ही दाम्पत्य जीवन में आने वाले सुख का आकलन किया जा सकता है. इसलिये जब शुक्र बली हों, पाप प्रभाव से मुक्त हों, किसी उच्च ग्रह के साथ किसी शुभ भाव में बैठा हों (When Venus is strong, free of malefic influence and situated with exalted planet) तो, अथवा शुभ ग्रह से दृ्ष्ट हों तो दाम्पत्य सुख में कमी नहीं होती है. उपरोक्त ये योग जब कुण्डली में नहीं होते है. तब स्थिति इसके विपरीत होती है. शुक्र अगर स्वयं बली है, स्व अथवा उच्च राशि में स्थित है. केन्द्र या त्रिकोण में हों तब भी अच्छा दाम्पत्य सुख प्राप्त होता है.  

 

इसके विपरीत जब त्रिक भाव, नीच का अथवा शत्रु क्षेत्र में बैठा हों, अस्त अथवा किसी पापी ग्रह से दृ्ष्ट अथवा पापी ग्रह के साथ में बैठा हों तब दाम्पत्य जीवन के लिये अशुभ योग बनता है. यहां तक की ऎसे योग के कारण ं पति-पत्नी के अलगाव की स्थिति भी उत्पन्न हो सकती है. इसके अलावा शुक्र, मंगल का संबन्ध व्यक्ति की अत्यधिक रुचि वैवाहिक सम्बन्धों में होने की सम्भावनाएं बनाती है. यह योग इन संबन्धों में व्यक्ति के हिंसक प्रवृ्ति अपनाने का भी संकेत करता है.  

 

इसलिये विवाह के समय कुण्डलियों की जांच करते समय शुक्र का भी गहराई से अध्ययन  करना चाहिए.

 

3. मंगल की वैवाहिक जीवन में भूमिका (Role of Mars in Marriage astrology)

मंगल की जांच किये बिना विवाह के पक्ष से कुण्डलियों का अध्ययन पूरा ही नहीं होता है. भावी वर-वधू की कुण्डलियों का विश्लेषण करते समय सबसे पहले कुण्डली में मंगल की स्थिति पर विचार किया जाता है. मंगल किन भावों में स्थित है, कौन से ग्रहों से द्रष्टि संबन्ध बना रहा है (aspect of Mars for marriage), तथा किन ग्रहों से युति संबन्ध में है. इन सभी बातों की बारीकी से जांच की जाती है.

 

मंगल के सहयोग से मांगलिक योग का निर्माण होता है (mars causes Manglik yoga in marriage). वैवाहिक जीवन में मांगलिक योग को इतना अधिक महत्वपूर्ण बना दिया गया है कि जो लोग ज्योतिष शास्त्र में विश्वास नहीं करते है. अथवा जिन्हें विवाह से पूर्व कुण्डलियों की जांच करना अनुकुल नहीं लगता है वे भी यह जान लेना चाहते है कि वर-वधू की कुण्डलियों में मांगलिक योग बन रहा है या नहीं.  

 

चूंकि विवाह के बाद सभी दाम्पत्य जीवन में सुख की कामना करते है. जबकि मांगलिक योग से इन इसमें कमी होती है.  जब मंगल कुंण्डली के लग्न, द्वितीय, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम व द्वादश भाव में स्थित होता है तो व्यक्ति मांगलिक होता है. परन्तु मंगल का इन भावों में स्थित होने के अलावा भी मंगल के कारण वैवाहिक जीवन के सुख में कमी आने की अनेक संभावनाएं बनती है.  

 

अनेक बार ऎसा होता है कि कुण्डली में मांगलिक योग बनता है. परन्तु कुण्डली के अन्य योगों से इस योग की अशुभता में कमी हो रही होती है. ऎसे में अपूर्ण जानकारी के कारण वर-वधू अपने मन में मांगलिक योग से प्राप्त होने वाले अशुभ प्रभाव को लेकर भयभीत होते रहते है. तथा बेवजह की बातों को लेकर अनेक प्रकार के भ्रम भी बनाये रखते है. जो सही नहीं है.  विवाह के बाद एक नये जीवन में प्रवेश करते समय मन में दाम्पत्य जीवन को लेकर किसी भी प्रकार का भ्रम नहीं रखना चाहिए.

 

विवाह समय निर्धारण - Calculating the time of marriage through Mahadasha

विवाह समय निर्धारण -

विवाह समय निर्धारण के लिये सबसे पहले कुण्डली में विवाह के योग देखे जाते है. इसके लिये सप्तम भाव, सप्तमेश व शुक्र से संबन्ध बनाने वाले ग्रहों का विश्लेषण किया जाता है. जन्म कुण्डली में जो भी ग्रह अशुभ या पापी ग्रह होकर इन ग्रहों से दृ्ष्टि, युति या स्थिति के प्रभाव से इन ग्रहों से संबन्ध बना रहा होता है. वह ग्रह विवाह में विलम्ब का कारण बन रहा होता है.

इसलिये सप्तम भाव, सप्तमेश व शुक्र पर शुभ ग्रहों का प्रभाव जितना अधिक हो, उतना ही शुभ रहता है (Higher influence of the auspicious planets is good for marriage). तथा अशुभ ग्रहों का प्रभाव न होना भी विवाह का समय पर होने के लिये सही रहता है. क्योकि अशुभ/ पापी ग्रह जब भी इन तीनों को या इन तीनों में से किसी एक को प्रभावित करते है. विवाह की अवधि में देरी होती ही है.

 

जन्म कुण्डली में जब योगों के आधार पर विवाह की आयु निर्धारित हो जाये तो, उसके बाद विवाह के कारक ग्रह शुक्र (Venus is the Karak planet for marriage) व विवाह के मुख्य भाव व सहायक भावों की दशा- अन्तर्दशा में विवाह होने की संभावनाएं बनती है. आईये देखे की दशाएं विवाह के समय निर्धारण में किस प्रकार सहयोग करती है:-

 

1. सप्तमेश की दशा- अन्तर्दशा में विवाह- (Marriage in the Mahadasha-Antardasha of Seventh Lord)

जब कुण्डली के योग विवाह की संभावनाएं बना रहे हों, तथा व्यक्ति की ग्रह दशा में सप्तमेश का संबन्ध शुक्र से हो तों इस अवधि में विवाह होता है. इसके अलावा जब सप्तमेश जब द्वितीयेश के साथ ग्रह दशा में संबन्ध बना रहे हों उस स्थिति में भी विवाह होने के योग बनते है.

 

2. सप्तमेश में नवमेश की दशा- अन्तर्द्शा में विवाह (Marriage in the Mahadasha-Antardasha of Ninth Lord in Seventh Lord)

ग्रह दशा का संबन्ध जब सप्तमेश व नवमेश का आ रहा हों तथा ये दोनों जन्म कुण्डली में पंचमेश से भी संबन्ध बनाते हों तो इस ग्रह दशा में प्रेम विवाह होने की संभावनाएं बनती है.  

 

3. सप्तम भाव में स्थित ग्रहों की दशा में विवाह (Marriage in the Dasha of the planets in the seventh house)

सप्तम भाव में जो ग्रह स्थित हो या उनसे पूर्ण दृष्टि संबन्ध बना रहे हों, उन सभी ग्रहों की दशा - अन्तर्दशा में विवाह हो सकता है.  इसके अलावा निम्न योगों में विवाह होने की संभावनाएं बनती है:-

क)  सप्तम भाव में स्थित ग्रह, सप्तमेश जब शुभ ग्रह होकर शुभ भाव में हों तो व्यक्ति का विवाह संबन्धित ग्रह दशा की आरम्भ की अवधि में विवाह होने की संभावनाएं बनाती है. या ख) शुक्र, सप्तम भाव में स्थित ग्रह या सप्तमेश जब शुभ ग्रह होकर अशुभ भाव या अशुभ ग्रह की राशि में स्थित होने पर अपनी दशा- अन्तर्दशा के मध्य भाग में विवाह की संभावनाएं बनाता है. ग) इसके अतिरिक्त जब अशुभ ग्रह बली होकर सप्तम भाव में स्थित हों या स्वयं सप्तमेश हों तो इस ग्रह की दशा के  अन्तिम भाग में विवाह संभावित होता है. 4. शुक्र का ग्रह दशा से संबन्ध होने पर विवाह (Marriage in the dasha related to Venus)

जब विवाह कारक ग्रह शुक्र नैसर्गिक रुप से शुभ हों, शुभ राशि, शुभ ग्रह से युक्त, द्र्ष्ट हों तो गोचर में शनि, गुरु से संबन्ध बनाने पर अपनी दशा- अन्तर्दशा में विवाह होने का संकेत करता है.

 

5. सप्तमेश के मित्रों की ग्रह दशा में विवाह (Marriage in the dasha of friendly planets of the seventh lord)

जब किसी व्यक्ति कि विवाह योग्य आयु हों तथा महादशा का स्वामी सप्तमेश का मित्र हों, शुभ ग्रह हों व साथ ही साथ सप्तमेश या शुक्र से सप्तम भाव में स्थित हों, तो इस महाद्शा में व्यक्ति के विवाह होने के योग बनते है.  

 

6. सप्तम व सप्तमेश से दृ्ष्ट ग्रहों की दशा में विवाह (Marriage in the dasha of planets aspected by the seventh house and lord)

सप्तम भाव को क्योकि विवाह का भाव कहा गया है. सप्तमेश इस भाव का स्वामी होता है. इसलिये जो ग्रह बली होकर इन सप्तम भाव , सप्तमेश से दृ्ष्टि संबन्ध बनाते है, उन ग्रहों की दशा अवधि में विवाह की संभावनाएं बनती है

 

7.  लग्नेश व सप्तमेश की दशा में विवाह (Marriage in the dasha of the ascendant lord or the seventh lord)

लग्नेश की दशा में सप्तमेश की अन्तर्दशा में भी विवाह होने की संभावनाएं बनती है.

 

8. शुक्र की शुभ स्थिति (Auspicious position of Venus in Marriage astrology)

किसी व्यक्ति की कुण्डली में जब शुक्र शुभ ग्रह की राशि तथा शुभ भाव (केन्द्र, त्रिकोण) में स्थित हों, तो शुक्र का संबन्ध अन्तर्दशा या प्रत्यन्तर दशा से आने पर विवाह हो सकता है. कुण्डली में शुक्र पर जितना कम पाप प्रभाव कम होता है. वैवाहिक जीवन के सुख में उतनी ही अधिक वृ्द्धि होती है  

 

9. शुक्र से युति करने वाले ग्रहों की दशा में विवाह (Marriage in the Dasha of planets in conjunction with Venus)

शुक्र से युति करने वाले सभी ग्रह, सप्तमेश का मित्र, अथवा प्रत्येक वह ग्रह जो बली हों, तथा इनमें से किसी के साथ द्रष्टि संबन्ध बना रहा हों, उन सभी ग्रहों की दशा- अन्तर्दशा में विवाह होने की संभावनाएं बनती है.

 

10. शुक्र का नक्षत्रपति की दशा में विवाह (Marriage in the dasha of the Nakshatra lord of Venus)

जन्म कुण्डली में शुक्र जिस ग्रह के नक्षत्र में स्थित हों, उस ग्रह की दशा अवधि में विवाह होने की संभावनाएं बनती है.

सप्तमांश से विवाह समय निर्घारण (Finding the time of marriage from Saptamansh)

सप्तमांश से विवाह समय निर्घारण-

ज्योतिषशास्त्र में विवाह के लिए नवमांश को ही आधार माना गया है और इसी के आधार पर विवाह समय का निर्घारण किया जाता है. लेकिन नवमांश के साथ ही सप्तमांश का अध्ययन भी इस संदर्भ महत्वपूर्ण है.

सोलह संस्कारो में विवाह एक प्रमुख संस्कार है.  लड़का हो या लड़की जब वे युवावस्था में पहुंचते हैं तो माता पिता बच्चों की शादी के लिए सोचने लगते हैं.  किसी की शादी चट मंगनी पट व्याह की तरह हो जाती है तो किसी की शादी में काफी समय लग जाता है.  ज्योतिषशास्त्र की दृष्टि में यह सब कुण्डली में मौजूद ग्रहों का खेल होता है. 

कुण्डली का महत्व (Importance of kundali in marriage)
कहते हैं जोड़ियां ऊपर से बनकर आती है और कब उनका मिलन होगा यह भी ऊपर वाला तय करता है.  हमारी कुण्डली में ईश्वर ग्रहों की ऐसी गिनती बैठाता है कि वे अपनी चाल चलकर समय समय पर अपना फल देते रहते हैं फिर भी हम लोग अपनी जिज्ञासा की शांति के लिए भविष्य में झांकना चाहते हैं.  अगर कहें कि भविष्य देखने के लिए एक ही झरोखा ऊपर वाले ने खोल रखा है तो वह हमारी जन्मपत्री है.  जन्मपत्री के बारह घरों यानी भावों में ही व्यक्ति की पूरी ज़िन्दग़ी सिमटी हुई है.  कुण्डली के बारह भावों में स्थित ग्रहों की स्थिति को समझकर ही भूत भविष्य का फलादेश किया जा सकता है. (Future can be assessed through the 12 houses of the kundali) 

विवाह कुण्डली विचार (Marriage kundali analysis)
विवाह सम्बन्धी गंभीर विषय पर भी कुण्डली के द्वारा ही रोशनी डाली जा सकती है.  इन दिनों बहुत से मैरिज ब्यूरो और शादी से सम्बन्धित वेबसाईट आ गये हैं इससे विवाह के इच्छुक लोगों को लाभ मिल रहा है लेकिन यह इस बात का भी संकेत है कि विवाह जैसे विषय को लेकर लोग किस कदर परेशान हैं.  ज्योतिषशास्त्रियों के पास बहुत से लोग इस प्रश्न को लेकर आ रहे हैं कि उनकी शादी या उनके किसी अपने की शादी कब होगी.  इस प्रश्न का जवाब देना यूं तो कुछ कठिन होता है परंतु कुण्डली में अन्य स्थितियों को ध्यान में रखते हुए अगर नवमांश और सप्तमांश की स्थितियों का गहराई से अध्ययन किया जाय तो व्यक्ति की शादी कब होगी इस सम्बन्ध में सही सही जानकारी ज्ञात की जा सकती है. 

विवाह नवमांश सप्तांश (Navamsh and Saptamamsh for marriage)
ज्योतिषशास्त्र में यूं तो विवाह के लिए नवमांश को ही आधार माना गया है और इसी के आधार पर विवाह समय का निर्घारण किया जाता है.  ज्योतिषशास्त्र के कुछ विद्वान मानते हैं कि नवमांश के साथ ही सप्तमांश का अध्ययन भी इस संदर्भ महत्वपूर्ण स्थान रखता है.  विवाह का समय जानने में सप्तमांश की भूमिका को स्पष्ट करने के लिए जो तर्क दिये गये हैं उनके अनुसार यह कहा गया है कि सामान्य स्थिति में विवाह के पश्चात एक से दो वर्ष के अंदर संतान का जन्म होता है.  इस आधार पर अगर सप्तमांश में संतान का योग प्रबल दिखाई देता है तो नवमांश से तुलनात्मक अध्ययन करने पर विवाह का सही काल निर्घारण किया जा सकता है. 

योगिनी कूट (Yogini Koot)

योगिनी कूट

image योगिनी कूट (Yogini Koot)

हमारे देश में ज्योतिष परम्परा के अनुसार जब स्त्री और पुरूष की शादी की बात चलती है तब सबसे पहले दोनों की कुण्डली मिलायी जाती है। कुण्डली मिलाने से ज्ञात होता है कि वर और वधू की कुण्डली में ग्रह, नक्षत्र एवं राशियों में किस तरह का सम्बन्ध बन रहा है। ग्रह नक्षत्र एवं राशियो के मध्य सम्बन्ध का विश्लेषण इसलिए किया जाता है क्योंकि ज्योतिष शास्त्र का मानना है कि ग्रह, नक्षत्र एवं राशियों के बीच जैसा सम्बन्ध होता है वैसा ही प्रभाव हमारे जीवन पर होता है (Astrology says Relation between Planets, Nakshatra and Rashi are very important in astrology, the type of relation between them, decide the type of effect on our life) यानी इनके बीच मित्रता पूर्ण सम्बन्ध है तो आपके बीच भी प्रेमपूर्ण सम्बन्ध रहता है और अगर इनमें दुश्मनी है तो आपके गृहस्थ जीवन में विवाद और कलह होता रहता है।


आज जीवन यूं भी काफी तनाव और संघर्षपूर्ण हो गया है इस स्थिति में पारिवारिक जीवन में यूं ही बहुत से उतार चढ़ाव आते रहते हैं, इस स्थिति में अगर कुण्डली मिलान किये बिना अथवा सही प्रकार से कुण्डली मिलाये बगैर शादी की जाए तो हो सकता है कि ग्रह, नक्षत्र एवं राशियां प्रतिकूल स्थिति पैदा करे और पारिवारिक जीवन कलह से भर जाए। इन स्थितियों मे आज के समय में कुण्डली मिलान के पश्चात ही शादी की जाए तो अधिक अच्छा माना जाता है।
भारत में कुण्डली मिलान की मुख्य दो पद्धति है अष्टकूट और बीसकूट(There are two type of kundli matching system in India those are Ashtkoota and Beeskoota)। अष्टकूट पद्धति उत्तर भारत में प्रचलित है और 20 कूट दक्षिण भारत में मान्य है (Asht koota system is famous in North India and 20 koota is famous in South India)। अष्टकूट के अन्तर्गत आठ प्रकार के वर्ग या कूट होते हैं और 20 कूट में 20 प्रकार के होते हैं। योगिनी कूट जिसकी बात हम करने जा रहे हैं वह 20 कूट के अन्तर्गत आने वाला एक कूट है (Yogini koota is the part of beeskoota)। इस कूट के विषय में बात को आगे बढ़ाते हुए सबसे पहले जानते हैं कि योगिनियां कितने प्रकार की होती है।

योगिनी के प्रकार (Types of Yogini):ज्योतिष सिद्धांत के अनुसार योगिनियां आठ प्रकार की होती है (8 types of Yogniya according to the Astrology), जिनका क्रम इस प्रकार है 1.ब्रह्मणी(Brahamani) 2.कौमारी(Kaumari) 3.वाराही(Varahi) 4.वैष्णवी(Vaishnavi) 5.माहेन्द्री(Mahendri) 6. चामुण्डा(Chamunda) 7. माहेश्वरी(Maheshwari)  8.महालक्ष्मी(Mahalakshmi)।

योगिनी कूट के अन्तर्गत योगिनियों को उत्तर पूर्व दिशा के क्रम में स्थापित किया जाता है। सभी योगिनियां तीन तीन नक्षत्र  की स्वामिनी मानी जाती है(Each yogini rules on three nakshatra)। जिन नक्षत्रों की जो योगिनी मालकिन हैं उन्हें उनके साथ पूर्व दिशा में चक्र के अनुसार स्थापित किया जाता है जैसे ब्राह्मणी प्रथम योगिनी है तो उनके साथ प्रथम नक्षत्र अश्विनी को रखा जाता है (Brahmini is the first yogini and Ashwani is the first Naksahtra therefore Bhahamani and Ashwani are placed in same chakara)। इसी प्रकार क्रम चलता है। नक्षत्रों की कुल संख्या 27 हैं अत: आठों योगिनियों के साथ तीन तीन नक्षत्र स्थापित करने से 3 नक्षत्र पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद और रेवती शेष बच जाते हैं। इन तीनों नक्षत्रों को पुन: पूर्व दिशा से ब्राह्मणी, कौमारी और वारही में स्थापित किया जाता है।

विवाह के संदर्भ में वश्य कूट मिलान का औचित्य (Importance of Vasya Koota in marriage matching system)

image Vashaykoot for Marriage

हमारा समाज मूल रूप से पुरूष प्रधान है। पुरूष प्रधान समाज में यह आशा रखी जाती है कि स्त्रियां पुरूष के अधीन रहे, इसके लिए स्त्रियों पर कई प्रकार की पाबंदियां लगायी जाती है एवं मर्यादा की बेड़ियों में जकड़ने की कोशिश की जाती है।

उपरोक्त संदर्भ में एक कहावत काफी प्रचलित है जिसका जिक्र यहां प्रस्तुत है:  

विवाह से पूर्व कन्या को पिता के संरक्षण में रहना चाहिए, विवाहोपरान्त पति के संरक्षण में और वृद्धावस्था में पुत्र के संरक्षण में। कहावत का आशय यह है कि स्त्री को जीवनपर्यन्त बंधन में रहना चाहिए परंतु यह प्राचीन काल की बात है, आज के संदर्भ में महिला अपने बल को जान चुकी हैं और अब वे अबला नहीं सबला हो गयीं। आज जबकि महिला पुरूषों के साथ हम कदम बन चुकीं है तो यहां भी विचारों में नवीनता की आवश्यकता हो गयी है अत: आइये हम वर्तमान परिप्रेक्ष्य में वश्य कूट मिलान के औचित्य पर विचार करें।

ज्योतिषशास्त्रियों के अनुसार अष्टकूट मिलान में द्वितीय होता है वश्यकूट मिलान (According to the astrology  Vasya Koota millan is second in Ashtkoota system)। वश्य कूट के विषय में जानने से पहले आइये सबसे पहले हम इसके शाब्दिक अर्थ पर विचार करें। "वश्य" का शाब्दिक अर्थ होता है "वश" में करने योग्य। प्राचीन काल में वश्यकूट मिलान से देखा जाता था कि स्त्री पति के अधीन रहेगी अथवा नहीं परंतु आज के संदर्भ में देखा जाता है कि स्त्री पुरूष के विचारों में सामंजस्य रहेगा या नहीं और यह भी जाना जाता है कि दोनों में एक दूसरे के लिए कितनी समर्पण की भावना है।  उपरोक्त विषयों के सम्बन्ध में किस प्रकार वश्यकूट से गुण मिलाये जाते हैं आइये इसे समझते हैं।

ज्योतिषशास्त्र के अनुसार विभिन्न राशियों के वश्य इस प्रकार से हैं  (Vasya of rashi):

1. स्त्री और पुरूष की कुण्डली में मेष और वृष राशि होने पर चतुष्पद वश्य(Chatuspad vasya) कूट बनता है।

2.मिथुन, कन्या, तुला, धनु अथवा कुम्भ राशि स्त्री और पुरूष की कुण्डली में होने से द्विपद कूट(Dwipad Koota) बनता है।

3.स्त्री और पुरूष की कुण्डली में कर्क,मकर या मीन राशि होने पर जलचर वश्य कूट(Jalchar vasya Koota) बनता है।

4.स्त्री व पुरूष दोनों ही अगर सिंह राशि के हों तो वनचर वश्यकूट(Vanchar Vasya koota) का निर्माण होता है।

5.स्त्री व पुरूष दोनों ही अगर वृश्चिक राशि के हों तो कीट वश्यकूट(Keet Vasya Koota) का निर्माण होता है।

इन्हें भी पढ़ें

वश्य गुणबोधक चक्र(Vasya Gunbodhak Chakra)

ज्योतर्विदों के मतानुसार राशियां अपने स्वभाव के अनुसार आपस में सामंजस्य बनाती हैं अथवा एक दूसरे से मतभेद पैदा करती है। वर- वधू की राशियों में मैत्री सम्बन्ध होने पर वश्य के दो गुण बनते है तो वशय बुण से विवाह के लिए सबसे उत्तम माना गया है (If rasi are friends  then vasya gets 2 points, this is good for marriage)। वश्य-वैर होने पर 1 गुण मिलते हैं इसे साधारण माना जाता है। वश्य अगर भक्ष्य है तो 1/2 गुण मिलते हैं इसे कमजोर कहा जाता है और वश्य वैर भक्ष्य हो तो 0गुण प्राप्त होता है इसे पूर्णत: अशुभ कहा गया है। इन गुणों के आधार पर ही वैवाहिक जीवन में पति पत्नी के बीच सामंजस्य का आंकलन किया जाता है।

इन स्थितियों में दोष नहीं लगता है(Dosha are not applicable in this conditions):

1.राशीश मैत्री-  वर -वधू दोनों के राशीश परस्पर मित्र हों (If Lord of rashi are friend)।

2.एक राशीश- वर-वधू दोनों के राशीश एक हों (If Lord of rashi are same)।

3.नवमांशेश मैत्री-  वर-वधू दोनों के नवमांश परस्पर मित्र हों (If navmansh are friend)।

4.एक नवमांशेश-वर-वधू दोनों के नवमांशेश एक हों (If navmansh are same)।


 

पंच पक्षी विचार(Panch Pakshi Vichar)

image पंच पक्षी विचार(Panch Pakshi Vichar)

स्त्री हो या पुरूष सभी शादी से पूर्व यही सपना देखते हैं कि उनका वैवाहिक जीवन प्रेम से परिपूर्ण हो। जीवनसाथी उन्हें और उनकी भावनाओं को समझे और गृहस्थ जीवन में सुख और आनन्द की बरसात होती रहे। विवाह के पश्चात बहुत से लोगों का यह सपना सच होता है तो बहुत से लोगों को मायूसी हाथ लगती है अर्थात उनका वैवाहिक जीवन कलह और अशांति से भरा रहता है। वैवाहिक जीवन में कलह का नज़ारा कई बार ऐसा हो जाता है कि घर-घर नहीं अखाड़ा नज़र आने लगता हैं।

प्रश्न उठता है कि जब दो व्यक्ति प्रेम का स्वप्न सजाये विवाह के पवित्र बंधन में बंधते हैं तो उनके बीच कलह का क्या कारण हो सकता है। ज्योतिषशास्त्री कहते हैं भौतिक जगत में पति पत्नी के मध्य कलह के कारण कुछ भी हों जैसे पत्नी के बनाये खाने की शिकायत, मायके का ताना या शक लेकिन इसका वास्तविक कारण छुपा है ग्रहों की दुनियां में। विवाह से पूर्व अगर ठीक प्रकार से कुण्डली नहीं मिलायी जाए अथवा बिना कुण्डली मिलाए शादी हो तो इस बात की संभावना रहती है कि पति और पत्नी की राशि और नक्षत्र में दुश्मनो जैसा रिश्ता हो फलस्वरूप ग्रह, राशि और नक्षत्र आपस में किसी बहाने मतभेद पैदा कर देते हैं जिससे पारिवारिक सुख शांति में बाधा आने लगती है।

गृहस्थ जीवन में सुख शांति और प्रेम का पौधा फलता फूलता रहे इसके लिए विवाह पूर्व कुण्डली मिलाप की सलाह दी जाती है। कुण्डली मिलाप के अन्तर्गत कई प्रकार के वर्ग और कूटों से फलादेश किया जाता है। दक्षिण भारतीय पद्धति की बात करें तो इसमें 20 कूटों से कुण्डली मिलायी जाती है(In marriage matching system, Bees koota are popular in South India) इन बीस कूटों में से एक प्रमुख कूट है पक्षी वर्ग कूट। पंच पक्षी से किस प्रकार कुण्डली मिलायी जाती है और फलादेश किया जाता है, यहां हम इसी पर बात कर रहे हैं।

पंक्षी वर्गकूट के अन्तर्गत बताया गया है कि पंक्षी पांच प्रकार के होते हैं जो क्रमश: इस प्रकार है: 1. गरूड़(Garud)  2.पिंगल(Pingal)  3.काक(Kak)  4.कुक्कुट(Kukut)  5.मोर(Moor)। इन पॉचो पंक्षी वर्ग में नक्षत्रों को बॉटा गया है, आइये पक्षी वर्ग के अन्तर्गत नक्षत्रों के विभाजन को देखें:

1.गरूड़-  अश्विनी, आर्द्रा, पू.फा., विशाखा, उ.षा.

2.पिंगल- भरणी, पुनर्वसु, उ.फा., अनुराधा, श्रवण

3.काक- कृतिका, पुष्य, हस्त, ज्येष्ठा, घनिष्ठा

4.कुक्कुट- रोहिणी, आश्लेषा, चित्रा, मूल, शतभिषा

5.मयूर- मृगशिरा, मघा, स्वाती, पूर्वाषाढ़ा, पूर्वाभाद्रपद, उ.भा. और रेवती

पंक्षी वर्गकूट के अन्तर्गत नक्षत्रों के विभाजन को देखकर आप समझ सकते हैं कि पहले चार पक्षियों में 5-5 नक्षत्र होते हैं तथा पांचवें में 7 नक्षत्र स्थापित होते हैं। दम्पत्ति के नक्षत्र यदि एक ही पक्षी वर्ग में आते हैं तो इसे बहुत ही शुभ माना जाता है(If Nakshatras of  Married Life is of same pakshi, so it is very Auspicious) क्योंकि इस स्थिति में वैवाहिक सूत्र में बंधने पर दम्पत्ति के बीच काफी प्रेम रहता है। अगर पक्षी वर्ग में स्त्री और पुरूष के नक्षत्र अलग अलग हों तो इसे अशुभ माना जाता है, इस स्थिति में विवाह होने पर वैवाहिक जीवन में कलह की संभावना प्रबल रहती है।

ध्यान देने वाली बात है कि दक्षिण भारत में पक्षी वर्ग में नक्षत्रों को स्थापित करने की अन्य विधि भी है, परंतु उपरोक्त विधि या मत को अधिक मान्यता मिली हुई है अत: इसी का उल्लेख यहां किया गया है।

 

वेधवर्ग विचार(Vedh Vargh Vichar)

image Vedh Vargh Vichar

शादी के समय पवित्र अग्नि के सम्मुख स्त्री और पुरूष सदा एक दूसरे का साथ निभाने का वचन देते हैं और संकल्प लेते हैं कि जीवन में सुख की घड़ी हो या दु:ख की दोनों एक दूसरे का दामन थामे रहेंगे फिर कौन सी ऐसी बात होती है जिसके कारण वचन टूट जाते हैं और रिश्ते बिखर जाते हैं। ज्योतिषशास्त्री मानते हैं कि उपरोक्त स्थिति का कारण अशुभ ग्रहों(Inauspicious Planets) का प्रभाव होता है। अगर शादी के पूर्व स्त्री और पुरूष की कुण्डली का सही से मिलान किया जाए और उसके अनुसार वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किया जाए तो विवाह की सफलता की संभावना अधिक रहती है(For Happy Married it is very important that Kundli matching in a perfect way)।

विवाह से पूर्व स्त्री और पुरूष की कुण्डली मिलाने से यह पता लग जाता है कि दाम्पत्य जीवन कैसा होगा और पति पत्नी के रूप में दोनों कितने सुखी रहेंगे। अगर कुण्डली मिलान करने पर फलादेश अनुकूल नहीं आता है तो आप रिश्ते की बात को आगे नहीं बढ़ाएंगे और वैवाहिक जीवन में आने वाली समस्या से बच जाएंगे। वैवाहिक कुण्डली मिलाप के सिद्धान्त को उत्तर भारतीय(North Indians) ज्योतिष की तरह दक्षिण भारतीय(South Indians) ज्योतिष भी स्वीकार करता है। दक्षिण भारत में वैवाहिक कुण्डली मिलान के अन्तर्गत 20 वर्ग या कूटों से विचार किया जाता है(Kundli Matching for marriage in North india according to the consideration of 20 vargh and Koots) 20 वर्ग के अन्तर्गत वेधवर्ग भी एक है(Vedh varg is also including in 20 vargs) वेधवर्ग का आधार माधवीयम् नामक ग्रंथ(Madhviyam Granth) है अर्थात इस वर्ग को माधवीयम् से लिया गया है। इस वर्ग के अन्तर्गत गुणों की अनुकूलता या प्रतिकूलता का विचार किया जाता है जो दक्षिण भारतीय ज्योतिष परम्परा के अनुकूल है। यहां उत्तर भारतीय सिद्धान्त के अनुसार मेलापक में गुण की गिनती से विचार नहीं किया जाता है। बात करें कि वेध के कितने प्रकार होते हैं तो इसका उत्तर है वेध के कुल 3 प्रकार हैं। 1.अश्विनी(Ashvini), भरणी(Brahni), कृतिका(kritika), रोहिणी(Rohini), मघा(Magha), पूर्वा फा., उत्तरा फाल्गुनी एवं हस्त इन आठों नक्षत्रों का तिर्यग वेध होता है। आर्द्रा, पुनर्वसु,पुष्य और आश्लेषा इन चार नक्षत्रों का सम्मुख वेध होता है तथा मघा, घनिष्ठा चित्रा इन तीनों का परस्पर वेध होता है। इस वेध को हम दिये गये चक्र से आसानी से समझ सकते हैं। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार अश्विनी-ज्येष्ठा, भरणी-अनुराधा, कृतिका-विशाखा, रोहिणी-स्वाती, आर्द्रा-श्रवण, पुनर्वसु-.षा., पुष्य-पू.षा., आश्लेषा-मूल,मघा-रेवती, पूर्वा.फा.-.भा.,.फा.-पूर्वा.भा.,हस्त-शतभिषा इन दो दो नक्षत्रों का आपस में वेध होता है अत: कन्या और वर के नक्षत्र में इस तरह का सम्बन्ध बनता है तो इसे वैवाहिक जीवन के लिए शुभ नहीं माना जाता है। उपरोक्त नक्षत्रों के अलावा मृगशिरा(Mrigshira), घनिष्ठा(Ghanishta) एवं चित्रा(Chitra) इन तीनों में भी परस्पर वेध होता है। इस विषय में प्रश्नमार्ग और जातकदेश मार्ग में समान उल्लेख मिलता है। शादी के प्रसंग में जब आप दक्षिण भारतीय पद्धति से कुण्डली मिलाएं तब नक्षत्रो में भेद का आंकलन करलें इससे वैवाहिक जीवन में कलह से बचा जा सकता है।

लिंग वर्ग विचार (Ling Vargh Vichar)

दक्षिण भारतीय ज्योतिष पद्धति में नक्षत्रों को कुल तीन लिंग वर्ग में बॉटा गया है जो क्रमश: इस प्रकार हैं 1.स्त्रीलिंग 2.पुल्लिंग  3.नपुंसकलिंग (In South Indian Astrology Nakshatras are divided into there categories  of Linga which are 1.Femenin 2.Masculin 3.Neutral)।

ग्रहों का लिंग भेद करते समय किस ग्रह को किस लिंग वर्ग में रखा गया है, सबसे पहले आइये इसे देखें।

1) स्त्रीलिंग नक्षत्र:
उत्तराषाढ़ा(Uttrashada), आश्लेषा (Ashlesha), पूर्वाफाल्गुनी (Purvafalguni), उत्तराफाल्गुनी (Utra Falguni), पूर्वाषाढ़ा(Purvashada), घनिष्ठा(Ghanishta), भरणी (Brahni) तथा विशाखा (Vishakha) नक्षत्र स्त्रीलिंग के अन्तर्गत रखे गये हैं।

2)पुल्लिंग नक्षत्र:
अश्विनी(Ashvini), तिका(Tika),  रोहिणी(Rohini),  पुष्य(Pushay), पूर्वाभाद्रपद (Purvabhadrapada),  उत्तराभाद्रपद (Utrabhadrapada), हस्त(Hast), श्रवण(Sravan), अनुराधा(Anuradha), पुनर्वसु(Punravasu), मघा (Magha) पुल्लिंग नक्षत्र कहलाते हैं।

3) नपुंसकलिंग नक्षत्र:
नपुंसकलिंग के अन्तर्गत मृगशिरा(Mrigshira), मूल एवं शतभिषा इन तीन नक्षत्रों को रखा गया है।

दक्षिण भारतीय ज्योतिष परम्परा के अनुसार अगर नक्षत्रों का आंकलन करते समय स्त्री और पुरूष के नक्षत्र एक लिंगवर्ग में हों तो यह शुभ होता है (According to the Astrology, if bride's and grooms' nakshatra are belongs from the same lingvarga, it is Auspicious for them) जबकि नक्षत्र अगर अलग-अलग लिंगवर्ग में हों तो यह वैवाहिक जीवन के लिए अशुभ होता है। लिंग वर्ग से फलादेश का यह एक तरीका है इसके अलावा कुछ और तरीका है जिनसे भी लिंग वर्ग का विचार किया जाता है।

लिंग वर्ग से फलादेश का अन्य तरीका क्या है चलिए इसे भी जान लेते है। कुण्डली मिलान के दौरान अगर वर का नक्षत्र पुरूष तथा स्त्री का नक्षत्र स्त्री हो तो दोनों को सम्पत्ति लाभ होता है(If Brides nakshatra is Female and Grooms nakshatra is Male, it is good for money point of view)। इस स्थिति में विवाह होने पर दम्पत्ति को धन का लाभ होता है। अगर वर का नक्षत्र स्त्री हो और वधू का नक्षत्र पुरूष हो तो यह वैवाहिक जीवन के लिए कष्टकर माना जाता है। नक्षत्रों के आंकलन में अगर वर-कन्या दोनों के नक्षत्र स्त्रीवर्ग के हों तो धन की हानि होती है। स्त्री और पुरूष दोनों के नक्षत्र अगर नपुंसकलिंग में हों तो यह शुभ फलदायी होता है। इसी प्रकार नपुंसक वर्ग में वर का नक्षत्र तथा स्त्री वर्ग में कन्या का नक्षत्र हो तो इसे सामान्य स्थिति कही जाती है क्योंकि इस स्थिति आर्थिक लाभ की स्थिति सामान्य रहती है। 

विवाह के प्रसंग में जब आप कुण्डली मिलान के लिए ज्योतिषशास्त्री से सम्पर्क करें उस समय ध्यान रखें कि आपकी कुण्डली लिंग वर्ग से मिलायी गयी है अथवा नहीं। आप गृहस्थ जीवन में सुख और धन लाभ चाहते हैं तो लिंग वर्ग से विचार करते समय यह देंखें कि आपका जन्म नक्षत्र और जीवनसाथी का नक्षत्र क्रमश: इस प्रकार हो जैसे आप स्त्री हैं और आपका जन्म नक्षत्र स्त्री है तो आपके जीवन साथी का नक्षत्र पुरूष हो, इसी प्रकार आप पुरूष हैं और आपका जन्म नक्षत्र पुरूष है तो आपके जीवनसाथी का नक्षत्र स्त्री हो। आप अगर इस रीति को अपनाते हैं तो संभव है कि आपका वैवाहिक जीवन सुखमय रहेगा।

 

जातिकूट (Jati Koot)

image जातिकूट (Jati Koot)

विवाह के प्रसंग में कुण्डली मिलाने की प्रथा उत्तर भारत में भी प्रचलित है और दक्षिण भारत में भी (Tradition of Kundli Matching in North India and South India)। कुण्डली मिलाने की इस प्रथा में कई बातें दोनों जगह समान हैं तो कई जगह दोनों में कुछ अंतर भी है। बात करें जातिकूट की तो यह उत्तर भारत में भी मान्य है और दक्षिण में भी परंतु दोनों में कुछ विभेद है। उत्तर भारतीय जातिकूट पद्धति और दक्षिण भारतीय जातिकूट में विभेद को ही हम अपना विषय बनाकर चर्चा को आगे बढ़ाते हैं, तो आइये चर्चा शुरू करें।

ज्योतिष परम्परा में वैदिक ज्योतिष(Vedic joytish in Astrlological Tradition) ने राशियों को चार जाति वर्ग में विभाजित किया है. ब्राह्मण (Brahamn), क्षत्रिय(Shatriyas), वैश्य(Vaishayas) और शूद्र(Shudras) ये चार जाति हैं जिसके अन्तर्गत राशियों को रखा गया है. कर्क, वृश्चिक एवं मीन ये चार्ट में पहले वर्ग में आते हैं, मेष, सिंह व धनु ये द्वितीय वर्ग में आते हैं, वृष, कन्या व मकर तीसरे वर्ग में आते हैं और अंतिम व चौथे वर्ग में मिथुन, तुला व कुम्भ राशियां आती हैं. उत्तर भारतीय पद्धति के अनुसार जब वैवाहिक कुण्डली का मिलान किया जाता है तब अष्टकूट(Asht Koot) के अन्तर्गत जातिकूट से राशियों की जातियों के आधार पर ही कुण्डली का मिलाप किया जाता है.

जातिकूट के अन्तर्गत जब वर-कन्या की जन्मराशियां(Janam Rshi) एक ही वर्ग में हों तो तब बहत ही शुभ मानी जाती है. यदि चार्ट में स्त्री की जाति पुरूष की जाति से नीचे हो तो इसे सामान्य कहा जाता है. जब चार्ट में रूत्री की जन्मराशि पुरूष की जन्म राशि से ऊपर हो तो इसे अशुभ (Inauspicious) स्थिति मानी जाती है.

उपरोक्त अध्ययन से ज्ञात होता है कि उत्तर भारतीय पद्धति में राशियों को अधिक महत्व दिया गया है. यहां राशियों को आधार मानकर फलादेश(Prediction according to the Rashi)किया जाता है. इसकूट के विषय में जब हम दक्षिण भारतीय सिद्धांत (Theory of South Indians) का अध्ययन करेंगे तो पाएंगे कि उनमें नक्षत्रों को प्रधानता(Importance of Nakshatras) दी गई है. इस विषय में प्रमाण के तौर पर आप माधवीयम्(Mdhviyam is a Mythological Book) नामक ग्रंथ को ले सकते हैं, इसमें नक्षत्रों की जाति(Coomunity of Nakshatras) का उल्लेख किया गया है. दक्षिण भारत में विवाह के विषय में जब कुण्डली मिलायी जाती है तब जातिकूट मिलाप के अन्तर्गत इन्हीं नक्षत्रों की जातियों से आंकलन(Evaluation) किया जाता है.

दक्षिण भारतीय पद्धति में जातिकूट के अन्तर्गत अश्विनी(Ashvini) से रेवती(Raivti) तक 27 नक्षत्रों को चार जातियों में बाँटा (Divided 27 Nakshatras in Four casts) गया है. इनमें जातियों का विभाजन इसप्रकार किया गया है जिसमें ऊपर से चार नीचे और नीचे से चार ऊपर क्रम में हैं जैसे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के क्रम में आश्विन से शुरू होकर रोहिणी(Rohini) तक गिना जाता है फिर मृगशीर्ष(Mrighshirsh) से शुरू होकर पुष्य(pushay) तक गिनती की जाती है और रेवती तक इसी क्रम को पुन: दुहराया जाता है.

नक्षत्रों की जाति विभाजन में शूद्र के हिस्से में 6 नक्षत्र आते हैं बाकि अन्य तीनों जातियों के हिस्से में 7 नक्षत्र आते हैं. उत्तर भारतीय जातिकूट के समान ही दक्षिण भारत में भी फलादेश का तरीका समान होता है. यहां भी वर-वधू के नक्षत्र एक जाति में हों तो उत्तम माना जाता है. कन्या के जन्म नक्षत्र से वर का जन्म नक्षत्र ऊपर होने पर विवाह के लिए सामान्य स्थिति मानी जाती है, इसके विपरीत अगर कन्या का जन्म नक्षत्र वर के जन्म नक्षत्र से ऊपर हो तो इसे अशुभ माना जाता है.

रज्जुवर्ग विचार(Rajju vargh)


image रज्जुवर्ग विचार(Rajju vargh)

दक्षिण भारतीय ज्योतिष पद्धति के अनुसार जब किसी व्यक्ति की वैवाहिक कुण्डली मिलायी जाती है तब 20 कूटों(Kundli matching according to 20 Koot) से विचार किया जाता है। 20 कूटों के अन्तर्गत एक कूट आता है रज्जुवर्ग। रज्जु वर्ग से जब स्त्री-पुरूष की कुण्डली का विश्लेषण (Analysis)किया जाता है तो किस विषय में फलादेश प्राप्त होता है और इससे फलादेश प्राप्त करने का तरीका क्या है यहां हम इसी पर रोशनी डालते हैं।

दक्षिण भारतीय ज्योतिष पद्धति में रज्जुवर्ग बनाने की दो विधि(Two Method of creating Rajju vargh) है। प्रथम विधि में तीन शिवलिंग(Vishvlingh) का आकार बनाया जाता है उसके उपर चार सीधी रेखाएं खींची जाती है और इनमें व्याव्य कोण यानी पश्चिमोत्तर(PashimotrKon) कोण से शुरू करके अश्विन्यादि(Ashinaydi) सारे नक्षत्रों को प्रदक्षिणा क्रम(Prdshina kram) यानी दाई ओर स्थापित किया जाता है। कुण्डली मिलान में कन्या और वधू के जन्म नक्षत्र अगर एक रेखा या रेखाहीन स्थान पर हों तो इसे अशुभ(Auspicious) माना जाता है। इस स्थिति में वैवाहिक सम्बन्ध होने पर पति पत्नी में सामंजस्य की कमी होती है फलस्वरूप उनमें विरोधभास रहता है।

रज्जुवर्ग बनाने की पहली विधि आप जान गये अब दूसरी विधि पर आइये विचार करें। दूसरी विधि में तर्जनी(Trjni) रहित तीन उंगलियों के तीन पर्वों में क्रम व व्युत्क्रम(Vyutkram)से तीन-तीन नक्षत्र तीन बार स्थापित किया जाता है। स्त्री पुरूष के नक्षत्रों के आंकलन में नक्षत्र एक ही पर्व पर हों तो इसे अशुभ(Inasuspicious) माना जाता है। मध्य रज्जु या रेखा पर नक्षत्र हो तो इसे बहुत अधिक अशुभ की श्रेणी में रखा जाता है।

उपरोक्त विधि के अलावा अन्य विधियों से भी रज्जु का विचार किया जाता है जिनमें से एक नाम है पंच नाड़ी चक्र(Name of Five Nari) इसे पंच रज्जु के नाम से भी जाना जाता है। पंचरज्जु पॉच तरह के होते हैं 1. पादरज्ज(Padrajju) 2. उरूरज्जु (Ururajju) 3.नाभिरज्जु (Nabhirajju) 4.कण्ठरज्जु(Kanthrajju) और शिरोरज्जु(Shirorajju)

पंच रज्जु में सभी रज्जु का अपना अपना प्रभाव होता है। ज्योतिष के अनुसार अगर दम्पत्ति के नक्षत्र पादरज्जु में हों तो स्त्री को विरह (Nostlagia) सहना पड़ता है यानी पति परदेश में रहता है। अगर नक्षत्र मिलान में स्त्री और पुरूष के नक्षत्र उरूरज्जु में हों तो धन की हानि(Financialy Problem in Ururajju) होती है। अगर दोनों के नक्षत्र नाभिरज्जु में हों तो संतान के सम्बन्ध में प्रतिकूल प्रभाव(Asverse Effect) का सामना करना पड़ता है। कण्ठरज्जु कन्या के लिए घातक होता है(Distructive Effect of Kanthrajju for kanya) अर्थात कण्ठरज्जु में अगर वर वधू दोनों के नक्षत्र मौजूद हों तो विवाह के पश्चात पत्नी के जीवन पर संकट होता है इसी प्रकार अगर दोनों के नक्षत्र शिरोरज्जु में हों तो पति के जीवन पर खतरा होता है।    

पंचरज्जु में शुभ स्थिति(Auspicious stage in Panchrajju) तब मानी जाती है जबकि वर वधू के नक्षत्रों के आंकलन में दोनों के नक्षत्र अलग अलग रज्जु में हों, ऐसा होने से वैवाहिक जीवन सुखद होता है। इस चक्र में अगर वर का नक्षत्र आरोह क्रम(Aroh Kram) में हो तथा कन्या का नक्षत्र अवरोह क्रम(Avroh kram) में हो तो दोनों ही आयुष्मान(Ayushman)होते हैं अर्थात लम्बे समय तक दाम्पत्य जीवन का आनन्द प्राप्त करते हैं।

गणकूट में समान गण सर्वोत्तम!(Gankut)


image गणकूट में समान गण सर्वोत्तम!(Gankut)

आपने देखा होगा कि जब भी आपके परिवार में किसी की शादी की बात चली होगी तब आपके माता पिता या घर के बड़े आपकी कुण्डली एवं जिस व्यक्ति के साथ शादी की बात चल रही होती है उनकी कुण्डली लेकर ज्योतिषी महोदय के पास जाते हैं ताकि वे वर और कन्या की कुण्डली का मिलान कर ज्ञात कर सकें कि दोनों की कुण्डली में कितने गुण मिल रहे हैं। गुणों का आंकलन(Assessment of Gunas) करने के लिए अष्टकूट के अन्तर्गत कुल आठ कूटों से मिलान किया जाता है उन्हीं में से एक है गणकूट।

गणकूट के विषय में गहराई से जानने के लिए सबसे पहले यह जान लीजिए कि गण कितने प्रकार के होते हैं।  भारतीय शास्त्रों (Indian Mythological Books) के अनुसार गण तीन प्रकार के होते हैं जिनका नाम है देवता (Devta), मनुष्य(Manushayas) और राक्षस(Rakshas)। इन तीनों को मनुष्य के तीन गुणों सत्व(Satv), रजोगुण(Rajogun) और तमोगुण(Tmogun) का प्रतीक माना गया है। इन तीनों गुणों की प्रकृति इनका स्वभाव अलग अलग होता है।

अगर आपके मन में यह जानने की उत्सुकता जगने लगी है कि गणों का निर्घारण किस प्रकार होता है तो आपकी उत्सुकता को हम कम कर देते हैं और हम जानते हैं गण निर्घारण की प्रक्रिया को। वैदिक ज्योतिष (vedic Astrologer)के अनुसार हमारे गण का निर्धारण जन्म नक्षत्र से होता है अर्थात जिस नक्षत्र में हमारा जन्म होता है उसके अनुसार हमारा गण निर्घारित होता है। इस सम्बन्ध में आप इस लेख में दिये गये चार्ट को देख सकते हैं और जान सकते हैं कि किस नक्षत्र में जन्म लेने पर आपको कौन सा गण प्राप्त होता है।  

आइये अब देखते हैं कि किस गण के साथ किसकी जोड़ी बन सकती है। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार अगर वर और कन्या दोनों के गण समान(Both Gan is same of Var and kanya) हों तो विवाह के लिए बहुत ही उत्तम स्थिति होती है। गण समान होने पर अगर आप शादी करते हैं तो पति पत्नी के सम्बन्ध में प्रेम और तालमेल बना रहता है। गणकूट मिलान में अगर एक का गण देव आता है और दूसरे का मनुष्य तब भी वैवाहिक सम्बन्ध हो सकता है इसमें भी विशेष परेशानी नहीं आती है इसे सामान्य की श्रेणी में रखा गया है। शास्त्रों के अनुसार देव और मनुष्य में सम्बन्ध बन सकता है परंतु इनके लिए राक्षस गण वाले से विवाह को अशुभ(Inauspicious) बताया गया है। अगर आपकी कुण्डली में गणकूट राक्षस है तो राक्षस गणकूट वाले व्यक्ति से ही विवाह करने की सलाह दी जाती है।

गणकूट में गुणांक(Evaluate) किस प्रकार प्राप्त होता है आइये अब इसे समझते हैं:

1.वर वधू दोनों के गणकूट देव -देव गण हों तो गुणांक 6 मिलता है।

2.वर वधू दोनों के गणकूट अगर मनुष्य -मनुष्य हों तो गुणांक 6 प्राप्त होता है।

3. वर वधू दोनों के गणकूट अगर राक्षस-राक्षस हों तो गुणांक 6 प्राप्त होता है।

4.वर वधू दोनों के गणकूट अगर मनुष्य -देव हों तो गुणांक 5 प्राप्त होता है।

5.वर वधू दोनों के गणकूट अगर  देव - मनुष्य हों तो गुणांक 5 प्राप्त होता है।

6.वर वधू दोनों के गणकूट अगर मनुष्य - राक्षस हों तो गुणांक 1 प्राप्त होता है।

7.वर वधू दोनों के गणकूट अगर राक्षस - मनुष्य हों तो गुणांक1 प्राप्त होता है।

8.वर वधू दोनों के गणकूट अगर  देव - राक्षस हों तो गुणांक 0 प्राप्त होता है।

9.वर वधू दोनों के गणकूट अगर  राक्षस - देव हों तो गुणांक 0 प्राप्त होता है।

गण दोष(Gan Dosh) निम्न स्थितियों में नहीं लगता

1.दोनों के राशीश परस्पर मित्र हों।

2.दोनों के राशीश एक हों।

3.दोनों के नवमांशेश(Lord of Navmansh) परस्पर मित्र हों।

4.दोनों के नवमांशेश एक हो।

title

Click to add text, images, and other content

भूत वर्ग विचार (Bhoot varg)


image भूत वर्ग विचार (Bhoot varg)

दुनियां में जितने भी रिश्ते हैं उनमें सबसे नाजुक रिश्ता पति पत्नी का रिश्ता होता है। इस रिश्ते में अगर जरा सी चूक हो जाए तो जीवन एक एक पल बिताना कठिन हो जाता है, यही कारण है कि इस नाजुक रिश्ते की गांठ में बंधने से पहले बहुत अधिक जांच परख की जाती है। आपने देखा होगा कि जब आपके घर में किसी की शादी की बात चलती है तब आपके घर के प्रमुख लोग जाकर देखते हैं कि जिस लड़के अथवा लड़की से शादी की बात चल रही है उनका स्वभाव कैसा है, क्या उन दोनों की जोड़ी सही रहेगी, क्या वे एक दूसरे के योग्य हैं, फिर जाकर शादी की बात आगे बढ़ती है। इतना सब कुछ जांच परख करने के बाद भी कई बार ऐसा देखने में आता है कि पति पत्नी के बीच मनमुटाव है और दोनों अलग हो रहे हैं।

ज्योतिषशास्त्री मानते हैं कि आमतौर पर इस तरह की घटना इसलिए होती है क्योंकि हम बाहरी तौर पर गुणों का आंकलन (Assessment of Characterstic) करते हैं और कुण्डली में स्थित ग्रहों(Stages of Planets) के गुणों को नज़र अंदाज़ कर जाते हैं। आप चाहते हैं कि आपका वैवाहिक जीवन प्रेमपूर्ण और सुखमय हो तो इसके लिए विवाह पूर्व कुण्डली मिलान (Kundli Matching) जरूर करलें। कुण्डली मिलान के लिए आप उत्तर भारतीय पद्धति (Method of North Indians) का चयन कर सकते हैं या चाहें तो दक्षिण भारतीय पद्धति(South Indians method) को अपना सकते हैं अगर आप दोनों से आंकलन करना चाहते हैं तो यह भी कर सकते हैं। उत्तर भारतीय पद्धति के आठ वर्ग से आंकलन(Assessment of North Indians from 8 Varg)(Assessmet of South indians methods from 20 koot) करने के पश्चात आप अगर दक्षिण भारत के 20 कूटों से आंकलन करना चाहें तो इसके अन्तर्गत भूतवर्ग से भी विचार करलें तो अच्छा रहेगा।

भूतवर्ग से किस तरह कुण्डली मिलायी (Kundli Matching from Bhoot Koot) जाती है तथा इससे कैसे फलादेश देखा जाता है आइये इसे समझते हैं। ज्योतिष ग्रंथ (Astrological Granth) प्रश्न मार्ग के अनुसार 27 नक्षत्रों को पंच महाभूतों में बॉटा(Division of 27 nakshatras in Five Muhurats) गया है। सबसे पहले महाभूतों का नाम जान लेते हैं, ये पंच भूत हैं क्रमश: 1. पृथ्वी तत्व (prithvi Tatv) 2. जल तत्व (Jal Tatv);3.अग्नि तत्व (Agni Tatv) 4.वायु तत्व(Vayu Tatv) और 5. आकाश तत्व (Akash Tatav)। भूतवर्ग में नक्षत्रों को क्रमश: 5, 6,5,6,5 के क्रम में रखा गया है, इस प्रकार देखें तो पृथ्वी तत्व के हिस्से में पांच नक्षत्र आते हैं अश्विनी, भरणी Bhrni), कृतिका (kritika), रोहिणी (Rohini) और मृगशिरा (Mrigshira)। जल तत्व के अन्तर्गत 6 नक्षत्र आते है आर्द्रा (Ardra), पुनर्वसु (Punrvasu), पुष्य (Pushay), आश्लेषा (Ashlesha), मघा (Mgha), पूर्वा फा.(Purva Phalguni)। अग्नि तत्व के अन्तर्गत उ. फा.(Utra Phalguni), हस्त (Hast), चित्रा (Chitra), स्वाती (Swati) और विशाखा(Vishakha) ये पांच नक्षत्र आते हैं। वायु तत्व के अन्तर्गत 6 नक्षत्र अनुराधा (Anuradha), ज्येष्ठा( jayeshtha), मूल (Mool), पूर्वाषाढ़ा (Purva Shada), उत्तराषाढ़ा (utra Shada) श्रवण  (Sharvan) आते हैं और आकाश तत्व(Akash Tatv) के हिस्से में घनिष्ठा (Ghnishtha), शतभिषा (Shatbisha), पूर्वाभाद्र.(Purva Bhadr), उ. भा (Utra Bhadr). और रेवती (Raevti) ये पांच नक्षत्र आते हैं।

फलादेश की दृष्टि (Aspect of prediction)  से देखा जाए तो वर और वधू दोनों का जन्म नक्षत्र एक भूतवर्ग में हो तो बहुत ही अच्छा माना जाता है, यह विवाह के श्रेष्ठ कहा जाता है। पृथ्वी तत्व सभी के साथ शुभ सम्बन्ध बनाता है अत: इसे भी अच्छा माना जाता है। अगर स्त्री- पुरूष में से कोई भी पृथ्वी तत्व का है तो विवाह किया जा सकता है। पृथ्वी तत्व के पश्चात आकाश तत्व को रखा गया है इसे सामान्य माना जाता है। मेलापक की दृष्टि से भूतवर्ग में जल और अग्नि तत्व में नक्षत्र होने पर अशुभ होता है अर्थात विवाह की इज़ाजत नहीं दी जाती है क्योंकि यह घातक होता है।

आय वर्ग विचार (Aye Wargh)


image आय वर्ग विचार (Aye Wargh)

भारत सांस्कृतिक रूप से विश्व में श्रेष्ठ माना जाता है। भारतीय अध्यात्म और दर्शन विश्व को अपनी ओर आकर्षित करता है। भारतीय अध्यात्म और दर्शन का ही एक अंग है ज्योतिष। ज्योतिष यानी रोशनी दिखने वाला अर्थात भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों पर प्रकाश डालने वाला ज्ञान है ज्योतिष। ज्योतिष के वैदिक शाखा(Banch of Vedic) में कुण्डली से जीवन के विषय में सभी प्रकार के प्रश्नों का हल ढूंढा जाता है। भारतीय परम्परा में विवाह पूर्व वर वधू के आने वाले जीवन के विषय में आंकलन(Assessment) करने के लिए कुण्डली मिलाने(Kundli matching) की परम्परा रही है।

उत्तर भारत में ज्योतिष महोदय अष्टकूट से वैवाहिक कुण्डली का मिलान करते हैं(In North India Astrlogers Matching Kundli from Asht koot) जबकि दक्षिण भारत में 20 कूटों से इस विषय में विचार किया जाता है(South Indiand Matching Kundli from 20 Koot)। बीस कूटों में से आय वर्ग भी एक है(Aye Wargh from 20 Koot)। आइये यहां हम इसी के विषय में बात करें। आय वर्ग से कुण्डली इसलिए मिलायी जाती है क्योंकि इससे पता चलता है कि विवाह के पश्चात परिवार की आय कैसी रहेगी। उत्तर भारत में आमतौर पर इसका प्रयोग वास्तु में होता है यानी जब आप नया घर खरीदते हैं या नये घर में प्रवेश करते हैं तब आय वर्ग से आंकलन किया जाता है कि घर में रहने वाले व्यक्ति की आय कैसी रहेगी। उत्तर भारतीय परम्परा से अलग दक्षिण भारतीय ज्योतिष परम्परा में आय वर्ग का प्रयोग वर -कन्या के कुण्डली मिलान में प्रयोग किया जाता है। आय कुल आठ प्रकार के होते हैं( Total 8 types of Aye):

1. ध्वज (Dhwaj) 2.धूम (Dhoom) 3.सिंह (Singh) 4.कुक्कुट (Kukut) 5.वृष (vrish) 6.खर (khr) 7.गज (Gaj) 8.काक (Kak)

इन आठों आयों को क्रमानुसार अश्विनी से प्रारम्भ करके पूर्व दिशा से परिक्रमानुसार(Orederwise) आठ दिशाओं में तीन बार स्थापित किया जाता है। इसके पश्चात शेष तीन नक्षत्रों को भी ध्वज, धूम एवं सिंह आय में स्थापित (Three Nakshatras is also Stablished in three Aye that is Dhwaj, Dhoom and Singh) किया जाता है इसके पश्चात वर-कन्या के नक्षत्रों का आंकलन किया जाता है। आंकलन में वर कन्या के नक्षत्र जिन आयों में पड़े वे दोनों आय एक - दूसरे से पंचम(Fifth House) बैठे तो ऐसा माना जाता है कि दोनों के बीच कलह हो सकती है यही आंकलन आयवर्ग है। आयवर्ग उत्तर भारत में प्रचलित वर्ग वैर के समान माना जाता है क्योंकि वर्ग वैर से विचार करने पर अपने वर्ग से पंचम वर्ग(Fifth Warg) वैरी होता है, इसी तरह अपने से पंचम आय भी वैरी होती है।

ज्योतिषशास्त्र के अनुसार जब कुण्डली मिलाने पर वैर बनता है तब विवाह के पश्चात पति-पत्नी के बीच कलह एवं विवाद की स्थिति बनी रहती है जिससे पारिवारिक जीवन में अशांति छायी रहती है। ज्योतिष के सिद्धांत(Theory of Astrologer) के अनुसार आय वर्ग चक्र के एक रेखा के दोनों सिरों पर जो नक्षत्र होते हैं उनमें आपस में विरोध (Aversion) होता है इस स्थिति के होने पर वैवाहिक जीवन में कठिनाई आती है। अगर नक्षत्र एक ही रेखा के दोनों सिरों को छोड़कर किसी अन्य रेखा पर हों तो इसे सामान्य और शुभ(Auspicious) माना जाता है अर्थात विवाह के लिए सुन्दर स्थिति कही जाती है। इसे आप दिये गये चित्र से आसानी से समझ सकते हैं।

महेन्द्र कूट (Mahendra Koot)


image महेन्द्र कूट (Mahendra Koot)

भारतवर्ष भारतीय महाद्वीप का सबसे बड़ा देश है। इस देश की विशालता और अनेकता में एकता विश्व के लिए आदर्श स्वरूप है क्योंकि भारत जितना विशाल है उतनी ही विस्तृत इसकी सभ्यता, संस्कृति, भाषा, ज्ञान और चिंतन है। ज्ञान, चिंतन एवं संस्कृति के विस्तृत और विविध होने के बावजूद इसका मूल स्वरूप एक ही है। चिंतन की बात करें तो उत्तर भारत में भगवान शिव के बड़े पुत्र को कार्तिकेय के नाम से पूजा जाता है तो दक्षिण(South) में कर्तिकेय मुरूगन स्वामी(Murugan Swami) के नाम से पूजित होते हैं। भगवान कृष्ण की बात करें तो उत्तर में माधव, गोपाल, कृष्ण के नाम से जाने जाते हैं तो दक्षिण में वेणु गोपाल के नाम से विख्यात हैं यानी नाम चाहे कुछ हो परिणाम और विषय वस्तु समान है, यही बात ज्योतिष में भी लागू है।

उत्तर भारतीय ज्योतिष(North Indians Astrologer)  और दक्षिण भारतीय ज्योतिष(South Indian Astrologer) में कई जग़ह विविधता है फिर भी इनमें समानता का भाव नज़र आता है। दोनों में समानता के क्रम में सबसे पहले हम दशा चक्र की बात करते हैं उत्तर भारत में दशा चक्र में विंशोत्तरी दशा से फलादेश(Prediction) किया जाता है वहीं दक्षिण भारत में अष्टोत्तरी दशा से फलादेश करने की प्रथा है। प्रथा अलग होने के बावजूद परिणाम में दोनों लगभाग समान होते हैं। दक्षिण भारतीय ज्योतिष एवं उत्तर भारतीय ज्योतिष में एक प्रमुख अंतर यह भी है कि दक्षिण भारत में प्रतिदिन डेढ़ घंटे का समय शुभ काम के लिए अच्छा नहीं माना जाता है क्योंकि यह राहु काल(Rahu Kal) होता है। सप्ताह में प्रत्येक दिन का यह समय काल तय होता है। राहु काल की तरह उत्तर भारत में भद्रा होता है, परंतु इसका कोई निश्चित समय नहीं होता है।

ज्योतिष की बात करें तो उत्तर भारत में दशा चक्र में विंशोत्तरी दशा से फलादेश किया जाता है वहीं दक्षिण भारत में अष्टोत्तरी दशा से फलादेश करने की प्रथा है। दक्षिण भारत में प्रतिदिन डेढ़ घंटे का समय शुभ कार्यों के लिए निसिद्ध माना जाता है, सप्ताह में प्रत्येक दिन का यह समय काल तय होता है इसे राहु काल के नाम से जाना जाता है। उत्तर भारत में राहु काल के स्थान पर भद्रा आता है। भद्रा राहुकाल की तरह अशुभ होता है परंतु राहुकाल की तरह इसका समय निश्चित नहीं रहता है और इसकी अंतिम दो घड़ियां अर्थात 48 मिनट किसी भी कार्य हेतु शुभ माना जाता हैं।

उत्तर भारतीय ज्योतिष में वैवाहिक कुण्डली (Marriage Kundli) मिलान में भी काफी अंतर है। उत्तर भारत में वैवाहिक कुण्डली को देखते समय जहां अष्टकूट से विचार किया जाता है वहीं दक्षिण भारतीय ज्योतिष में बीस कूटों(20 Koot) से विचार किया जाता है। बीस कूटों में से एक है महेन्द्र कूट। महेन्द्र कूट के विषय में प्रश्न मार्ग में बताया गया है कि कन्या के नक्षत्र से वर का नक्षत्र (Male nakshtras from Female Nakshatras) 4, 7, 10 हो तो महेन्द्र कूट बनता है। महेन्द्रकूट मूलत: चतुर्थ नक्षत्र होता है और चतुर्थ से चतुर्थ उपेन्द्र नक्षत्र होता है।

महेन्द्रकूट के अन्तर्गत कन्या के नक्षत्र से वर का नक्षत्र 4, 7, 10, 13, 16, 19, 22, या 25 वां होता है तो यह बहुत ही शुभ माना जाता है।इस कूट के अन्तर्गत कन्या के नक्षत्र से वर का नक्षत्र 1,2,3,5,6,8,9,11,12,14,15,17,18,
19,20,21,23,24,26 या  27 हो तो इसे अशुभ माना जाता है। विवाह के सम्बन्ध में महेन्द्र नक्षत्र से आंकलन करने का कारण यह है कि इससे पता चलता है कि विवाह के पश्चात परिवार की आर्थिक स्थिति कैसी रहेगी तथा उपेन्द्र से यह ज्ञात होता है कि दम्पत्ति के वैवाहिक जीवन में संतान सुख के सम्बन्ध में स्थिति कैसी रहेगी। अगर आप दक्षिण भारतीय पद्धति से वैवाहिक कुण्डली का आंकलन (Assessment of Marriage Kundli from  Indian Method) करते हैं तो आपके लिए इस कूट का मिलान करना आवश्यक होगा।

राशीश मैत्रीकूट(Rashish Maitrikoot)


image राशीश मैत्रीकूट(Rashish Maitrikoot)

विवाह के उद्देश्य से जन्मपत्री से जब कुण्डली में अष्टकूट मिलान(Ashtkoot in kundli) किया जाता है तब भिन्न भिन्न कूटों से गुणों का आंकलन किया जाता है। विवाह से पहले गुणों का आंकलन कुण्डली में इसलिए किया जाता है ताकि पति पत्नी के तौर पर जब हम आप पारिवारिक जीवन में प्रवेश करें तब हमारे दाम्पत्य जीवन में प्रेम और सामंजस्य का भाव बना रहे, कुल मिलाकर एक शब्द में कहें तो कुण्डली में गुणों का मिलान इसलिए किया जाता है ताकि पारिवारिक जीवन में सुख शांति बनी रहे। जब गुणों का आंकलन किया जाता है उस समय अष्टकूट के अन्तर्गत राशीश मैत्रीकूट से भी विचार किया जाता है।

राशीश मैत्रीकूट (Rashish MaitriKoota) का अर्थ है राशियों के स्वामी (Lord of Zodiac Sign) के मध्य मित्रता का आंकलन। राशीश वैवाहिक जीवन में सामंजस्य के सम्बन्ध में काफी प्रभावी होते हैं। ज्योतिष के अनुसार राशियों में मित्रता और वैर का भाव होता है, अगर दो विरोधी राशियों के स्त्री पुरूष शादी करते हैं तो उनमें आपस में मतभेद और संघर्ष की स्थिति बनी रहती है।

ज्योतिष ग्रंथों में उल्लेख किया गया है कि इस कूट का सम्बन्ध राशियों से हैं। जब स्त्री और पुरूष की कुण्डली मिलायी जाती है उस समय ज्ञात होता है कि दोनों के राशियों के स्वामी एक हैं अथवा दोनों के राशीश आपस में मित्र हैं तो शादी के लिए इसे बहुत ही शुभ माना जाता है। इस तरह की राशि मिलन होने पर विवाह प्रसंग को आगे बढ़ाया जा सकता है। राशीश मैत्रीकूट का आंकलन करने पर अगर राशियों के स्वामी मित्र-शत्रु या सम शत्रु हों तो विवाह के लिए शुभ नही माना जाता है और अगर दोनों के राशीश अगर शत्रु -शत्रु हों तो यह पर्णत: अशुभ माना जाता है। अगर कुण्डली मिलान करते समय मित्र-शत्रु अथवा शत्रु-शत्रु का सम्बन्ध बन रहा है तो अन्य कूटों के गुणों का समर्थन मिलने पर ही विवाह की बात आगे ले जानी चाहिए।

राशीश मैत्रीकूट के गुणों का आंकलन किस प्रकार होता है अब इसे देखिए।

1.यदि दोनों के राशीश एक हों तो गुणनांक 5 आता है।

2.यदि दोनों के राशीश मित्र-मित्र हों तब भी गुणनांक 5 आता है।

3.यदि दोनों के राशीश मित्र-सम हों तो गुणांक  4 आता है।

4.यदि दोनों के राशीश सम-सम हो तो गुणांक 3 आता है।

5.यदि दोनों के राशीश मित्र-शत्रु हों तो गुणांक 1प्राप्त होता है।

6.यदि दोनों के राशीश सम-शत्रु हों तो गुणांक 1/2 प्राप्त होता है।

7.यदि दोनों के राशीश शत्रु-शत्रु हों तो गुणांक 0 प्राप्त होता है।

ज्योतिष के अनुसार इन स्थितियों में राशीश मैत्री दोष(Aspersion) नहीं लगता है :
1. स्त्री व पुरूष दोंनों के नवमांशेश परस्पर मित्र हों।
2. जिन दो व्यक्ति की कुण्डली का आंकलन(Assessment) किया जा रहा हो उनके नवमांशेश एक हो।
3. जिनकी कुण्डली मिलायी जा रही हो उनकी राशियां भले ही भिन्न हो परंतु नक्षत्र एक हों या फिर नक्षत्र अलग अलग हों परंतु राशि एक हों।
4.सद् भकूट हो।

निष्कर्ष के तौर के कह सकते है कि राशीश के मध्य मैत्री सम्बन्धी का अभाव हों तो राशीश मैत्री दोष माना जाता है और इसमें वैवाहिक सम्बन्ध को उत्तम नहीं माना जाता है।

Acardding to Narad Sahita-स्त्री दीर्घ से वैवाहिक जीवन का आंकलन (Assessment of Married Life from Stri Dirgh)


image स्त्री दीर्घ से वैवाहिक जीवन का आंकलन (Assessment of Married Life from Stri Dirgh)

सभी माता पिता चाहते हैं कि उनके बच्चों का जीवन सुखमय और आनन्दमय गुजरे, इसके लिए माता पिता अपनी ओर से हर संभव प्रयास करते हैं। जब बात हो शादी की तब विषय और भी गंभीर हो जाता है क्योंकि यह जीवन भर का मामला होता है। शादी के मामले में जरा सी चूक से बच्चों की ज़िन्दग़ी प्रभावित हो सकती है, यही कारण है कि माता पिता विवाह के विषय को गंभीरता से लेते हुए कुण्डली मिलान करवाते हैं। कुण्डली मिलान के क्रम में दक्षिण भारतीय पद्धति (South Indian Kundli Matching System) में बीस कूटों (Bees Koota) के अन्तर्गत स्त्री दीर्घ (Stri Dirgha) से भी विचार किया जाता है।


दक्षिण भारत में देवर्षि नारद (Devershi Narad) का मत काफी प्रचलित है, इस मत को स्त्री दीर्घ या कन्या दूर (Stri Dirgh or Kanya Door) के नाम से भी जाना जाता है। इस विधि में कन्या के नक्षत्र से वर के नक्षत्र तक गिनना होता है। इसमें 9-9 नक्षत्रों की तीन आवृतियां होती हैं। स्त्री नक्षत्र से पुरूष का नक्षत्र पहले 9 में में होने से पति पत्नी के बीच अनबन रहती है अर्थात रिश्तों में तनाव की स्थिति रहती है, इसी प्रकार स्त्री नक्षत्र से पुरूष नक्षत्र दूसरे 9 में होने से वैवाहिक जीवन में मिली जुली स्थिति रहती है और अगर तीसरे 9 में हो तो इसे उत्तम माना जाता है क्योंकि इस स्थिति में पति पत्नी के बीच वैवाहिक जीवन में प्रेम और अनुराग बना रहता है।

विवाह का एक प्रमुख उद्देश्य यह भी है कि वंश परम्परा कायम रहे अर्थात वंश चलता रहे। इस दृष्टि (Aspect) से स्त्री के नक्षत्र से पुरूष का नक्षत्र 14, 15, 16, 17 एवं 18 वे स्थान पर होने से बहुत ही अच्छा माना जाता है। इस स्थिति के होने से विवाह के पश्चात दम्पत्ति को अनेक संतान का सुख प्राप्त होता है। इससे दम्पत्ति में आपसी प्रेम और सामंजस्य होता है।

श्री नारद जी के मतानुसार स्त्री दीर्घ के अन्तर्गत कन्या के नक्षत्र से पुरूष के नक्षत्र के बीच दूरी होनी चाहिए(Distance in Female Nakshatras from Male Nakshatras) , यह दोनों के लिए शुभ होता है।अगर गिनती में नक्षत्र एक दूसरे के समीप आ जाए तो यह अशुभ माना जाता है क्योंकि इससे शुभफल में कमी आती है। नृदूर दोष (NriDur Dosha) के अन्तर्गत जब नक्षत्रों की गिनती लड़के के नक्षत्र से की जाती है तब बात विपरीत होती है। पुरूष के नक्षत्र से गिनती के क्रम में कन्या का नक्षत्र पास में होना उत्तम माना जाता है। इसमें वर से कन्या का नक्षत्र जितना दूर होता है स्थिति उतनी ही अशुभ मानी जाती है।

कन्या का विवाह कब होगा ?

योनिकूट से कुण्डली में गुण मिलान (yoni Koot)


image योनिकूट से कुण्डली में गुण मिलान (yoni Koot)

इस धरती पर जितने भी जीव हैं वे किसी न किसी योनि से सम्बन्धित हैं अर्थात बकरी, बैल, हाथी, सिंह, चूहा या फिर मनुष्य सभी ईश्वर द्वारा बनायी गयी योनियां हैं। हर योनि की अपनी विशेषता और अपना गुण (Characteristic) है, परंतु यहां हम जीवों की योनियों की बात नहीं कर रहे हैं, बात कर रहे हैं नक्षत्रों की योनियों(Yoniya of Nakshatras) की। ज्योतिष के अनुसार योनि का सम्बन्ध नक्षत्रों से मानी गयी हैं (According to the Astrologer relationship of Yoni from Nakshatras) ।

योनियो का सम्बन्ध परस्पर पॉच प्रकार का है(Relationship of Yoni is Five different types):
1. स्ववर्ग की योनि 2. मित्र 3.उदासीन 4.शत्रु 5.महाशत्रु

ज्योतिश के अनुसार वर और कन्या के नक्षत्रों की योनि एक हों अथवा दोनों के नक्षत्रों की योनि अलग अलग हो तो विवाह के लिए यह अच्छी स्थिति मानी जाती है((According to the Astrologer Nakshatras of var and kanya is same and diferent is good sign of marriage)) । कुण्डली में यह गुण मिलने पर विवाह के विषय में विचार कर सकते हैं। कुण्डली मिलाते समय अगर स्त्री एवं पुरूष दोनों की कुण्डली में नक्षत्र परस्पर उदासीन योनि(Neutral Yoni) के हों तो इस स्थिति में विवाह होने पर वैवाहिक जीवन सामान्य रहता है। ज्योतिर्विदों के मतानुसार यदि वर-वधू के नक्षत्र परस्पर शत्रु योनि (Opposite Yoni) के हों तो विवाह के लिए शुभ स्थिति नहीं बनती है, इस स्थिति विवाह के विषय में अन्य गुणों से विचार करना चाहिए अगर अन्य कूट से 18 से अधिक गुणांक प्राप्त हो रहे हैं तो शादी की बात आगे ले जायी जा सकती है। अगर कुण्डली मिलाते समय नक्षत्र महाशत्रु योनि(in time of kundli matching, nakshtras are opposite yoni) के आते हैं तब तो और भी सावधान रहना चाहिए क्योंकि इसे अत्यंत अशुभ माना गया है।

योनिकूट(Yooni koot) के विषय में महर्पि अत्रि(Maharishi Atri) ने कहा है कि सफल वैवाहिक जीवन के लिए ध्यान रखना चाहिए कि स्त्री और पुरूष दोनों के नक्षत्र की योनि समान हो। स्त्री व पुरूष दोनों के नक्षत्र की योनि समान होने पर संतान एवं सुख के सम्बन्ध में उत्तम स्थिति रहती है(If Nakshatras of Male and Female are in same Yoni is a good sign of happiness and have child in your life)। अगर दोनों के नक्षत्रों की योनि भिन्न होती है तब वैवाहिक जीवन ठीक ठाक रहता है(If Nakshatras are different in both yoni that is the good sign of marriage)। कुण्डली मिलान करते समय ज्ञात हो कि दोनों के नक्षत्रों की योनि में परस्पर वैर भाव(at the time of kundli matching also aware that yoni of both male and female is opposite) है तो, विवाह के लिए अन्य कूटों से प्राप्त गुणांक पर ध्यान देना चाहिए क्योंकि इस स्थिति में विवाह होने पर दाम्पत्य जीवन में वियोग और कष्ट का सामना करना पड़ता है। यहां गौर करने वाली बात यह है कि नक्षत्रों की योनि में वैर भाव को महादोष माना fगया है(If Nakshatras of yoni are in Enemy kind so it is a sign of big Aspersion)।

योनि कूट में किन योनियों के मध्य विवाह की आज्ञा नहीं दी गयी है आइये कुछ उदारहण देखते हैं। अगर स्त्री और पुरूष में से एक की नक्षत्र योनि मृग(Mrigh yoni) या हाथी हो और दूसरे का सिंह इसी प्रकार क्रमश: नेवला या गरूड़ और सांप हो, कुत्ता या वानर और मेष हो। इन योनियों के बीच वैर भाव(Enemy in yooni) होने के कारण विवाह की आज्ञा नहीं दी गयी है और कहा गया है कि इस स्थिति में विवाह होने पर पति पत्नी में आपसी कलह और विवाद की स्थिति बनी रहती है।
योनि सम्बन्ध में गुणों की गणना(Counting of relate Yoni in Guna):

1. यदि दोनों के नक्षत्र एक योनि(same Yoni) के हों तो गुणांक 4 प्राप्त होता है।

2.यदि स्त्री पुरूष के नक्षत्र मित्र योनि(Friend Yoni) के हों तो गुणांक 3 प्राप्त होता है।

3. यदि दोनों के नक्षत्र उदासीन योनि(Neutral Yoni) के हों तो गुणांक 2 मिलता है।

4.यदि स्त्री पुरूष के नक्षत्र शत्रु योनि(Enemy Yoni) के हों तो गुणांक 1 मिलता है।

5.यदि दोनों के नक्षत्र महाशत्रु योनि के हों तो गुणांक 0 प्राप्त होता है।

इन स्थितियों में योनिकूट दोष नहीं लगता( Aspersion of Yoni koot is not applicable in these stages):
1.यदि दोनों के राशीश परस्पर मित्रवत हों।

2.यदि दोनों के राशीश एक हों(Same Rashi)।

3.दोनो के नवमांशेश परस्पर मित्र या एक हो।

4.भकूट(Bhkoot)शुद्धि हो।

5.वश्य-शुद्धि हो।

नाड़ीकूट विचार (Narikoot)


image नाड़ीकूट विचार (Narikoot)

बड़े बूढे कहते हैं कि विवाह के पश्चात व्यक्ति नये जीवन में प्रवेश करता है, बुजुर्गों का यह कहना काफी हद तक सही भी है क्योंकि जैसे जन्म के पश्चात नया माहौल नया परिवेश और कुछ रिश्ते हमसे जुड़ जाते हैं ठीक उसी प्रकार विवाह के पश्चात व्यक्ति एक नये परिवेश और माहौल से रूबरू होता है जहां कई नये रिश्ते और नई बातें सामने आती हैं। विवाह के पश्चात शुरू होने वाले नये जीवन में खुशहाली के लिए कुण्डली मिलान किया जाता है। कुण्डली मिलान के क्रम में अष्टकूट से विचार किया जाता है, इन अष्टकूटों(Ashtkoot) में आठवां और अंतिम कूट है नाड़ी कूट।

ज्योतिषशास्त्र(Astrology) के अनुसार नाड़ी तीन प्रकार की होती है, इन नाड़ियों के नाम हैं आदि नाड़ी, मध्य नाड़ी, अन्त्य नाड़ी। इन नाड़ियों को किस प्रकार विभाजित किया गया है आइये इसे देखें:
1.आदि नाड़ी: ज्येष्ठा, मूल, आर्द्रा, पुनर्वसु, उत्तरा फाल्गुनी, हस्त, शतभिषा, पूर्वा भाद्र और अश्विनी नक्षत्रों की गणना आदि या आद्य नाड़ी में की जाती है।

2.मध्य नाड़ी: पुष्य, मृगशिरा, चित्रा, अनुराधा, भरणी, घनिष्ठा, पूर्वाषाठा, पूर्वा फाल्गुनी और उत्तरा भाद्र नक्षत्रों की गणना मध्य नाड़ी में की जाती है।

3.अन्त्य नाड़ी: स्वाति, विशाखा, कृतिका, रोहणी, आश्लेषा, मघा, उत्तराषाढ़ा, श्रावण और रेवती नक्षत्रों की गणना अन्त्य नाड़ी में की जाती है।

नाड़ी दोष (Aspersion) किन स्थितियों में लगता है आइये अब इसे समझते हैं। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार जब वर और कन्या दोनों के नक्षत्र एक नाड़ी में हों तब यह दोष लगता है। सभी दोषों में नाड़ी दोष को सबसे अशुभ माना जाता है क्योंकि इस दोष के लगने से सर्वाधिक गुणांक यानी 8 अंक की हानि होती है। इस दोष के लगने पर शादी की बात आगे बढ़ाने की इज़ाज़त नहीं दी जाती है।

आचार्य वाराहमिहिर(Acharya Varamihir) के अनुसार यदि वर-कन्या दोनों की नाड़ी आदि हो तो उनका विवाह होने पर वैवाहिक सम्बन्ध अधिक दिनों तक कायम नहीं रहता अर्थात उनमें अलगाव हो जाता है। अगर कुण्डली मिलाने(Kundli matching) पर कन्या और वर दोनों की कुण्डली में मध्य नाड़ी होने पर शादी की जाती है तो दोनों की मृत्यु हो सकती है, इसी क्रम में अगर वर वधू दोनों की कुण्डली में अन्त्य नाड़ी होने पर विवाह करने से दोनों का जीवन दु:खमय होता है। इन स्थितियों से बचने के लिए ही तीनों समान नाड़ियों में विवाह की आज्ञा नहीं दी जाती है।

महर्षि वशिष्ठ(Maharishi vashisht) के अनुसार नाड़ी दोष(Nari Aspersion) होने पर यदि वर-कन्या के नक्षत्रों में नज़दीकियां(Closeness in Nakshatra of Var And Kanya) होने पर विवाह के एक वर्ष के भीतर कन्या की मृत्यु हो सकती है अथवा तीन वर्षों के अन्दर पति की मृत्यु होने से विधवा होने की संभावना रहती है। आयुर्वेद के अन्तर्गत(Comprises of Ayurvedha) आदि, मध्य और अन्त्य नाड़ियों को वात(Mystique), पित्त (Bile) एवं कफ(Phlegem) की संज्ञा दी गयी है।

नाड़ी मानव के शारीरिक स्वस्थ्य को भी प्रभावित करता है(Nari also effect human health)। मान्यता है कि इस दोष के होने पर उनकी संतान मानसिक रूप से अविकसित  एवं शारीरिक रूप से अस्वस्थ होते हैं((Naridosh  also effect  Mind of their Child and Health of their Child)।

इन स्थितियों में नाड़ी दोष नहीं लगता है: ( Naridosha will not affect you in this Conditions)

1. यदि वर-वधू का जन्म नक्षत्र(Birth Nakshatras) एक ही हो परंतु दोनों के चरण पृथक हों तो नाड़ी दोष नहीं लगता है।

2. यदि वर-वधू की एक ही राशि (Bride and Groom have Same Rashi) हो तथा जन्म नक्षत्र भिन्न (Different Birth Nakshatras) हों तो नाड़ी दोष से व्यक्ति मुक्त माना जाता है।

3. वर-वधू का जन्म नक्षत्र एक हो परंतु राशियां भिन्न-भिन्न(Different Rashi) हों तो नाड़ी दोष नहीं लगता है।

नाड़ी दोष का उपचार: (Remedy of Naridosha)
पीयूष धारा के अनुसार स्वर्ण दान, गऊ दान, वस्त्र दान, अन्न दान, स्वर्ण की सर्पाकृति बनाकर प्राणप्रतिष्ठा (Pranpratishta)तथा महामृत्युञ्जय (Mrtunjai)
जप करवाने से नाड़ी दोष शान्त हो जाता है।