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!!श्री गणेश स्तोत्रम् !!

Posted on June 11, 2011 at 4:49 AM

देवों में प्रथम पुज्य भगवान गणपति की पुजा,साधना,आराधना,ध्यान और स्थापना जीवन के प्रत्येक शुभ कार्य में आवश्यक है,अतः अपने पुजा स्थान में गणेश जी को स्थापित करके स्तोत्र पाठ ,वंदना अवश्य करनी चाहिए !जहां गणपति स्थापित होते है वहां ऋध्दि-सिध्दि,शुभ-लाभ  अपने आप स्थापित हो जाते है !दिन की शुरुवात गुरु पुजन और गणपति पुजन से करनी चाहिए,विध्नविनाशक गणपति को देवों का अधिपति तथा प्रथम पुज्य माना जाता है,उनका ध्यान,वंदन,पुजन जीवन में निरन्तर कल्याणकारी माना जाता है,जिन्के बारे में ये कहा जाता है कि-विद्यारंभे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा !संग्रामे संकटे चैव विध्नतस्य न जायते !!                                                अर्थात् विद्या प्रारंभ करने के समय,विवाह के समय,गृह प्रवेश के समय,घर से बाहर जाते समय,यात्रा प्रारंभ करने के पहले,युध्द मे जाने के पहले,संक़ट के समय जो विध्नविनाशक,वरदायक भगवान गणपति की वंदना करता है,उसकी सदैव विजय होती है ! क्योकिं जहां गणेश जी है वहां आदि देव शिवजी और माता पार्वती है,वहां ऋध्दि और सिध्दि है,शुभ और लाभ है !अर्थात् जीवन का सम्पुर्ण आनंद है ! प्रस्तुत स्तोत्र गणेश आराधना मेम महत्वपुर्ण स्थान रखता है,जिसका नित्य प्रति और विशेषकर बुधवार को तथा प्रत्येक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को अवश्य पाठ करना चाहिए !                                                                                 ऊंकारमांद्यं प्रवदन्ति सन्तो वाचः श्रुतीनामपि ये गुणन्ति !गजाननं देव- गणानताध्रि भजे$हमर्ध्देन्दु -कृतावतंसम् !!१ !!पादारविन्दार्चन तत्पराणां संसार - दावानल भङ्ग-दक्षम ! निरन्तरं निर्गत-दान-तोयैस्तं नौमि विध्नेश्वरमम्बुजाभम् !!२!! कृताङ्ग-रागं नव-कुंकुमेन,मत्तालि-मालां मद-पङ्क-लग्नाम ! निवारयन्तं निज-कर्ण-तालैः,को विस्मरेत् पुत्रममङ्ग-शत्रोः !!३!! सम्भोर्जटा-जुट-निवासि-गंगा-जलं समानीय कराम्बुजेन ! लीलाभिराराच्छिवमर्चयन्तं,गजाननं भक्ति-युता भजन्ति !!४!!कुमार-भुक्तौ पुनरात्म-हेतोः,पयोधरौ पर्वत-राज-पुत्र्याः!प्रक्षालयन्तं कर-शीकरेण,मौग्ध्येन तं नाग-मुखं भाजामि !!५!!त्वया समुद्-धृत्य गजास्य हस्तं,संशीकराःपुष्कर-रन्ध्र-मुक्तः!व्यामाङ्गेन ते विचरन्ति ताराः,कालात्मना मौक्तिक-तुल्य-भासः !!६!!क्रीडा-रते वारे-निधौ गजास्यै,वेलामतिक्रामति वारि पुरे !कल्पावसानं परिचिन्त्य देवाः,कैलाश-नाथं श्रुतिभिः स्तुवन्ति !!७!!नागानने नाग-कृतोत्तरीये,क्रीडा-रते देव-कुमार-सङ्गे!त्वयि क्षणं काल-गति विहाय,तौ प्रापतुः कन्दुकतामिनेन्दु !!८!!मदोल्लसत्-पञ्च-मुखैरजस्त्रमध्यापयन्तं सकलागमार्थान् !देवान् ऋषीन् भक्त-जनैक-मित्रं,हेरम्बर्कारुणमाश्रतामि !!९!! पादाम्बुजाभ्यामति-कोमलाभ्यां,कृतार्थ्यन्तं कृपया घरित्रीम् ! अकारणं कारणमाप्त -वाचां,तन्नाग-वक्त्रं न जहाति चेतः !!१०!!येनापितं सत्यवती-सुताय,पुराणमालिख्य विषाण-कोटच्या !तं चन्द्रमौलिस्तनयं तपोभिराराध्यमानन्द-धनं भजामि !!११!!पदं श्रुती-नामपदं स्तुतीनां,लीलावतारं परमात्म-मुर्ते !नागात्मको वा पुरुषात्मको वेत्यभेद्यमाद्यं भज विध्न-राजम!!१२!!पाशांकुशौ भग्नरदं त्वभीष्ट,करैर्दधानं कर-रन्घ्र-मुक्तै !मुक्ता-फलाभैः पृथु-शीकरौधैः,सिञ्चन्त्मङ्गं शिवयोर्भजामि!!१३!!अनेकमेकं गजमेक-दन्तं,चैतन्य-रुपंजगदादि-बीजम् !ब्रम्होति यं ब्रम्हा-विदो वदन्ति,तं शम्भु-सूनुं सततं भजामि!!१४!!अङ्के स्थिताया निज-वल्लभाया,मुखाम्बुजालोकन-लोल-नेत्रम !स्मेराननाब्जं मद-वैभवेन,रुध्दं भजे विश्व-विमोहनं तम् !!१५!!ये पुर्वाराध्य गजाननं!त्वां,सर्वाणि शास्त्राणि पठन्ति तेषाम् !त्वत्तो न चान्यत् प्रतिपाद्यमस्ति,तदस्ति चेत् सत्यन्सत्य-कल्पम् !!१६!!हिरण्य वर्ण जगदीशितारे,कवि पुराणं रवि-मण्डलस्थं!गजाननं यं प्रवदन्ति सन्तस्तत् काल-योगैस्त्महं प्रपद्ये!!१७!!वेदान्त गीतं पुरुषं भजे$हमात्मानमानन्द-घनं हृदिस्थम् !गजाननं यन्महसा जनानां,विध्नान्धकारो विलयं प्रयाति !!१८!!शम्भोः समालोक्य जटा-कलापे,शशाङ्क-खन्डं निज-पुष्करेण! स्व-भग्न-दन्तं प्रविचिन्त्य मौग्ध्यादाकर्ष्ट-कामः श्रियमातनोतु!!१९!!विध्नार्गलानां विनिपातनार्थ,यं नारिकेलैः कदली-फलाद्यैः !प्रभावयन्तो मद-वारणास्यं,प्रभु सदा$भीष्टमहं भजेतम् !!२०!!यज्ञैरनेकैर्बहुभिस्तपोभिराराध्य्माद्यं,गज राज वक्त्रम् !स्तुत्या$नया ये विधिना स्तुवन्ति,ते सर्व-लक्ष्मी-निधयो भवन्ति !!२१!!                            !!श्री गणेश स्तोत्रम् सम्पुर्णम !!

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