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Free Astrology में आपका स्वागत है। एक वैबसाईट जहां आप भारतीय तथा वैदिक ज़्योतिष के बहुत से महत्त्वपूर्ण विषयों के बारे में सही एवम व्यवहारिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं तथा अपनी जन्म कुंडली के माध्यम से अपने जीवन में होने वाली अच्छी-बुरी घटनाओं के बारे में जान सकते हैं तथा वैदिक ज्योतिष के मार्गदर्शन तथा उपायों से अपने जीवन को बेहतर बना सकते हैं।

इस वैबसाईट के माध्यम से आप निम्नलिखित सेवाएं प्राप्त कर सकते हैं :

कुंडली परामर्श : अपनी जन्म कुंडली में उपस्थित अच्छे-बुरे योगों तथा दोषों के बारे में सही जानकारी प्राप्त कीजिए तथा इन योगों-दोषों से होने वाले लाभ-हानि के बारे में भी जानिए। साथ ही अपनी जन्म कुंडली में उपस्थित दोषों के निवारण के उपाय भी जानिए। 

शुभ रत्न : अपने लिए शुभ रत्नों के बारे में जानिए तथा इन रत्नों को पहन कर अपने जीवन के बहुत से महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में सफलता प्राप्त करने की संभावनाएं बढाएं।

आपके मंत्र : अपने लिए शुभ मंत्रों के बारे में जानिए तथा इन मंत्रों के माध्यम से अपने जीवन के बहुत से महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में सफलता प्राप्त करने की संभावनाएं बढाएं।

आपका व्यवसाय : अपने लिए लाभदायक व्यवसाय के बारे में जानिए तथा इनमें सफलता प्राप्त करने के उपाय जानिए।

कुंडली मिलान : अपने सुखी वैवाहिक जीवन के लिए कुंडली मिलान करवायें तथा इस मिलान के आधार पर जानिए कि आपकी शादी किन क्षेत्रों में अच्छी एवम किनमें ख्रराब रह सकती है। अपने वैवाहिक जीवन को सुखमय बनाने के लिए कुंडली मिलान में उपस्थित दोषों के निवारण जानिए तथा साथ ही गुण मिलान में आने वाले दोषों, जैसे कि नाड़ी दोष, भकूट दोष आदि के निवारण भी जानिए।

शादी संबंधित समस्याएं : क्या आपकी शादी में अनावश्यक रूप से देरी हो रही है या आपके वैवाहिक जीवन में खुशियां कम और समस्याएं अधिक हैं। अपनी कुंडली का अध्ययन करवाएं तथा आपके वैवाहिक सुख को कम करने वाले दोषों के निवारण जानिए।

अन्य समस्याएं : उपरोक्त समस्याओं के अतिरिक्त किसी भी अन्य समस्या या दोष जैसे कि पित्र दोष, मांगलिक दोष, काल सर्प दोष, गंड मूल दोष आदि के निवारण प्राप्त करें। 

पितृ दोष

  पितृ दोष भारतीय ज्योतिष की एक अति महत्त्वपूर्ण धारणा है तथा इस पर चर्चा किए बिना भारतीय ज्योतिष को अच्छी तरह से समझ पाना संभव नहीं है। वैसे तो भारतीय ज्योतिष में पाए जाने वाले अधिकतर योगों, दोषों एवम धारणाओं के बारे में तरह-तरह की भ्रांतियां फैली हुईं हैं किन्तु पितृ दोष इन सब से आगे है क्यों कि पितृ दोष के बारे में तो पहली भ्रांति इसके नाम और परिभाषा से ही शुरू हो जाती है। पितृ दोष के बारे में अधिकतर ज्योतिषियों और पंडितों का यह मत है कि पितृ दोष पूर्वजों का श्राप होता है जिसके कारण इससे पीड़ित व्यक्ति जीवन भर तरह-तरह की समस्याओं और परेशानियों से जूझता रहता है तथा बहुत प्रयास करने पर भी उसे जीवन में सफलता नहीं मिलती। इसके निवारण के लिए पीड़ित व्यक्ति को पूर्वजों की पूजा करवाने के लिए कहा जाता है जिससे उसके पितृ उस पर प्रसन्न हो जाएं तथा उसकी परेशानियों को कम कर दें।

                                                     यह सारी की सारी धारणा सिरे से ही गलत है क्योंकि पितृ दोष से पीड़ित व्यक्ति के पितृ उसे श्राप नहीं देते बल्कि ऐसे व्यक्ति के पितृ स्वयम ही शापित होते हैं जिसका कारण उनके द्वारा किए गए बुरे कर्म होते हैं जिनका भुगतान उनके वंश में पैदा होने वाले वंशजों को करना पड़ता है। जिस तरह संतान अपने पूर्वजों के गुण-दोष धारण करती है, अपने वंश के खून में चलने वाली अच्छाईयां और बीमारियां धारण करती है, अपने बाप-दादा से मिली संपत्ति तथा कर्ज धारण करती है, उसी तरह से उसे अपने पूर्वजों के द्वारा किए गए अच्छे एवम बुरे कर्मों के फलों को भी धारण करना पड़ता है।

                                                   कुछ ज्योतिषि तथा पंडित इस दोष का कारण बताते हैं कि आपने अपने पूर्वजों का श्राद्ध-कर्म ठीक से नहीं किया जिसके कारण आपके पितृ आपसे नाराज़ हैं तथा इसी कारण आपकी कुंडली में पितृ दोष बन रहा है। यह मत सर्वथा गलत है क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति की कुंडली उसके जन्म के समय ही निर्धारित हो जाती है तथा इसके साथ ही उसकी कुंडली में बनने वाले योग-दोष भी निर्धारित हो जाते हैं। इसके बाद कोई भी व्यक्ति अपने जीवन काल में अच्छे-बुरे जो भी काम करता है, उनके फलस्वरूप पैदा होने वाले योग-दोष उसकी इस जन्म की कुंडली में नहीं आते बल्कि उसके अगले जन्मों की कुंडलियों में आते हैं। तो चाहे कोई व्यक्ति अपने पूर्वजों का श्राद्ध-कर्म ठीक तरह से करे न करे, उनसे पैदा होने वाले दोष उस व्यक्ति की इस जन्म की कुंडली में नहीं आ सकते। इसलिए जो पितृ दोष किसी व्यक्ति की इस जन्म की कुंडली में उपस्थित है उसका उस व्यक्ति के इस जन्म के कर्मों से कोई लेना-देना नहीं है क्योंकि वह पितृ दोष तो उस व्यक्ति को इस जन्म में अच्छे-बुरे कर्मों करने की स्वतंत्रता मिलने से पहले ही निर्धारित हो गया था। आईए अब पितृ दोष के मूल सिद्धांत को भारतीय मिथिहास की एक उदाहरण की सहायता से समझने का प्रयास करें।

                                               यह उदाहरण भारतवर्ष में सबसे पवित्र मानी जाने वाली तथा माता के समान पूजनीय नदी गंगा के पृथ्वी पर अवतरण के साथ जुड़ी है। प्राचीन भारत में रघुकुल में सगर नाम के राजा हुए हैं जिन्होने पृथ्वी पर सबसे पहला सागर खुदवाया था तथा जो भगवान राम चन्द्र जी के पूर्वज थे। इन्ही राजा सगर के पुत्रों ने एक गलतफहमी के कारण तपस्या कर रहे कपिल मुनि पर आक्रमण कर दिया तथा कपिल मुनि के नेत्रों से निकली क्रोधाग्नि ने इन सब को भस्म कर दिया। राजा सगर को जब इस बात का पता चला तो वह समझ गए कि कपिल मुनि जैसे महात्मा पर आक्रमण करने के पाप कर्म का फल उनके वंश की आने वाली कई पीढ़ियों को भुगतना पड़ेगा। इसलिए उन्होंने तुरंत अपने पौत्र अंशुमन को मुनि के पास जाकर इस पाप कर्म का प्रायश्चित पूछने के लिए कहा जिससे उनके वंश से इस पाप कर्म का बोझ दूर हो जाए तथा उनके मृतक पुत्रों को भी सदगति प्राप्त हो। अंशुमन के प्रार्थना करने पर मुनि ने बताया कि इस पाप कर्म का प्रायश्चित करने के लिए उनके वंश के लोगों को भगवान ब्रह्मा जी की तपस्या करके स्वर्ग लोक की सबसे पवित्र नदी गंगा को पृथ्वी पर भेजने का वरदान मांगना होगा तथा गंगा के पृथ्वी लोक आने पर मृतक राजपुत्रों की अस्थियों को गंगा की पवित्र धारा में प्रवाह करना होगा। तभी जाकर उनके वंश से इस पाप कर्म का बोझ उतरेगा। 

                                              मुनि के परामर्श अनुसार अंशुमन ने ब्रह्मा जी की तपस्या करनी आरंभ कर दी किन्तु उनकी जीवन भर की तपस्या से भी ब्रह्मा जी प्रसन्न होकर प्रकट नहीं हुए तो उन्होने मरने से पहले यह दायित्व अपने पुत्र दिलीप को सौंप दिया। राजा दिलीप भी जीवन भर ब्रह्मा जी की तपस्या करते रहे पर उन्हे भी ब्रह्मा जी के दर्शन प्राप्त नहीं हुए तो उन्होने यह दायित्व अपने पुत्र भागीरथ को सौंप दिया। राजा भागीरथ के तपस्या करने पर ब्रह्मा जी प्रस्न्न होकर प्रकट हुए तथा उन्होने भागीरथ को गंगा को पृथ्वी पर भेजने का वरदान दिया। वरदान देकर जब भगवान ब्रह्मा जी जाने लगे तो राजा भागीरथ ने उनसे एक सवाल पूछा जो कुछ इस तरह से था, “ हे भगवान ब्रह्मा जी, मेरे दादा महाराज अंशुमन तथा मेरे पिता महाराज दिलीप ने जीवन भर आपको प्रसन्न करने के लिए कठोर तप किया परंतु आपने उनमें से किसी को भी दर्शन नहीं दिए जबकि मेरी तपस्या तो उनसे कम थी परतु फिर भी आपने मुझे दर्शन और वरदान दिए। हे प्रभु क्या मेरे पूर्वजों की तपस्या में कोई कमी थी जो उनकी तपस्या व्यर्थ गई”। इसके उत्तर में भगवान ब्रह्मा जी ने कहा, “ राजन, तपस्या कभी भी व्यर्थ नहीं जाती। आपके पूर्वजों की तपस्या तो कपिल मुनि पर आक्रमण करने के पाप कर्म का भुगतान करने में चली गई और आपकी तपस्या के फलस्वरूप गंगा को पृथ्वी पर लाने के लिए आवश्यक पुण्य कर्म संचित हुए हैं। यदि आपके पूर्वजों ने तपस्या करके आपके कुल पर चढ़े हुए पाप कर्मों का भुगतान न किया होता तो आज आपको मेरे दर्शन और वरदान प्राप्त नहीं होते”।

                                            इस उदाहरण से सपष्ट हो जाता है कि राजा सगर के पुत्रों के पाप कर्म से उनके वंश पर जो पितृ ॠण चढ़ गया था, उसका भुगतान उनके वंश मे आने वाली पीढ़ियों को करना पड़ा। इस तरह पितृ दोष पूर्वजों के श्राप देने से नहीं बल्कि पूर्वजों के स्वयम शापित होने से बनता है और इसके निवारण के लिए आपको पूर्वजों की पूजा नहीं करनी है बल्कि पूर्वजों के उद्धार के लिए पूजा तथा अन्य अच्छे कर्म करने हैं।    

                                          पितृ दोष के बारे में इतनी चर्चा करने के बाद आइए अब विचार करें कि जन्म कुंडली में उपस्थित किन लक्षणों से कुंडली में पितृ दोष के होने का पता चलता है। नव-ग्रहों में सूर्य सपष्ट रूप से पूर्वजों के प्रतीक माने जाते हैं, इस लिए किसी कुंडली में सूर्य को बुरे ग्रहों के साथ स्थित होने से या बुरे ग्रहों की दृष्टि से अगर दोष लगता है तो यह दोष पितृ दोष कहलाता है। इसके अलावा कुंडली का नवम भाव पूर्वजों से संबंधित होता है, इस लिए यदि कुंडली के नवम भाव या इस भाव के स्वामी को कुंडली के बुरे ग्रहों से दोष लगता है तो यह दोष भी पितृ दोष कहलाता है। पितृ दोष प्रत्येक कुंडली में अलग-अलग तरह के नुकसान कर सकता है जिनका पता कुंडली का विस्तारपूर्वक अध्ययन करने के पश्चात ही चल सकता है। पितृ दोष के निवारण के लिए सबसे पहले कुंडली में उस ग्रह या उन ग्रहों की पहचान की जाती है जो कुंडली में पितृ दोष बना रहे हैं और उसके पश्चात उन ग्रहों के लिए उपाय किए जाते हैं जिससे पितृ दोष के बुरे असरों को कम किया जा सके।
 

काल सर्प दोष

  काल सर्प दोष बहुत से ज्योतिषियों का चहेता बन गया है और हर तीसरे या चौथे व्यक्ति को ये बताया जा रहा है कि उसकी कुंडली में काल सर्प दोष है तथा उसकी सारी परेशानियों एवम समस्याओं का कारण यही दोष है। यह मत बिल्कुल भी ठीक नहीं है क्योंकि अगर कुंडली में सारा कुछ राहू और केतू ही तय कर देंगे तो बाकि के सात ग्रहों का तो कोई महत्त्व ही नहीं रह जाता। और इस चर्चा को आगे बढ़ाने से पहले आईए एक नज़र में काल सर्प दोष की परिभाषा पर विचार कर लें।

                                                  सबसे पहले यह जान लें कि काल सर्प दोष और काल सर्प योग दोनों का एक ही मतलब है तथा इनमें कोई अंतर नहीं है। प्रचलित परिभाषा के अनुसार कुंडली के सारे ग्रह, सूर्य, चन्द्र, गुरू, शुक्र, मंगल, बुध तथा शनि जब राहू और केतु के बीच में आ जाएं तो ऐसी कुंडली में काल सर्प दोष बनता है। उदाहरण के तौर पर अगर राहू और केतु किसी कुंडली में क्रमश: दूसरे और आठवें भाव में स्थित हों तथा बाकी के सात ग्रह दो से आठ के बीच या आठ से दो के बीच में स्थित हों तो प्रचलित परिभाषा के अनुसार ऐसी कुंडली में काल सर्प दोष बनता है और ऐसी कुंडली वाला व्यक्ति अपने जीवन काल में तरह-तरह की मुसीबतों का सामना करता है तथा उसके किए हुए अधिकतर प्रयासों का उसे कोई भी लाभ नहीं मिलता।

                                              काल सर्प दोष की यह परिभाषा बिल्कुल भी व्यवहारिक और तर्कसंगत नहीं है तथा अधिकतर कुंडलियों में सारे ग्रह राहू और केतू के बीच में आने के बावजूद भी काल सर्प दोष नहीं बनता जब कि कुछ एक कुंडलियों में एक या दो ग्रह राहू-केतू के बीच में न होने पर भी यह दोष बन जाता है। इसलिए काल सर्प दोष की उपस्थिति के सारे लक्ष्णों पर गौर करने के बाद ही ईस दोष की पुष्टि करनी चाहिए, न कि सिर्फ राहू-केतु की कुंडली में स्थिति देख कर। और अगर काल सर्प दोष किसी कुंडली में उपस्थित भी हो, तब भी इसके परिणाम बताने से पहले कुछ बहुत महत्त्वपूर्ण बातों पर गौर करना बहुत आवश्यक है, जैसे कि कुंडली में यह दोष कितना बलवान है, कुंडली धारक की किस आयु पर जाकर यह दोष जाग्रत होगा तथा प्रभावित व्यक्ति के जीवन के किन हिस्सों पर इसका असर होगा। कोई भी अच्छा-बुरा योग तब तक बहुत लाभ या हानि करने में सक्षम नहीं होता जब तक यह एक सीमा से उपर बलवान न हो तथा कुंडली में जाग्रत न हो।

                                             आईए इन तथ्यों को उदाहरण की सहायता से समझने की कोशिश करें। मान लीजिए कि किसी व्यक्ति की कुंडली में काल सर्प दोष उपस्थित है, इस दोष का बल 30 प्रतिशत है, यह दोष कुंडली धारक की 32 वर्ष की आयु में जाग्रत होगा और यह दोष मुख्य तौर पर कुंडली धारक के वैवाहिक जीवन पर बुरा असर डालेगा। ईन तथ्यों के अनुसार प्रभावित व्यक्ति का वैवाहिक जीवन उसकी 32 वर्ष की आयु तक तो सामान्य रूप से चलता रहेगा, किन्तु 32 वर्ष की आयु के बाद अचानक ही ईस व्यक्ति के वैवाहिक जीवन में परेशानियां आनी शुरू हो जाएंगीं। लेकिन इस दोष का बल अधिक न होने के कारण यह समस्याएं एक सीमा तक ही इस व्यक्ति को परेशान करने में सक्षम होंगीं तथा इन समस्याओं के बावजूद प्रभावित व्यक्ति का वैवाहिक जीवन चलता रहेगा।

                                            मान लीजिए कि उपर दी गई उदाहरण में बाकि सब कुछ जैसे का तैसा ही रहता है लेकिन काल सर्प दोष का बल 70 प्रतिशत हो जाता है। इन नये तथ्यों के अनुसार प्रभावित व्यक्ति का वैवाहिक जीवन उसकी 32 वर्ष की आयु तक तो सामान्य रूप से चलता रहेगा, किन्तु 32 वर्ष की आयु के बाद अचानक ही ईस व्यक्ति के वैवाहिक जीवन में अत्यधिक परेशानियां आनी शुरू हो जाएंगीं तथा इस बात की संभावनाएं बहुत बढ़ जाएंगी कि या तो प्रभावित व्यक्ति का अपनी पत्नि से तलाक हो जाएगा अथवा इससे भी बुरी संभावना के चलते इस व्यक्ति की पत्नि की मृत्यु भी हो सकती है। इस लिए इस दोष या किसी भी और योग-दोष के अच्छे-बुरे फल बताने से पहले एक अच्छे ज्योतिषि को उपर बताए गए तथ्यों पर गंभीरता के साथ विचार करना चाहिए तथा इसके बाद ही उचित निर्णय पर पहुंचना चाहिए।

                                          एक अनुमान के तौर पर जितने भी लोगों की कुंडली में प्रचलित परिभाषा के अनुसार काल सर्प दोष बनता है, उनमे से सिर्फ 4 या 5 में से एक की कुंडली में ही वास्तव में यह दोष बनता है तथा 70 प्रतिशत या इससे भी अधिक बलवान काल सर्प दोष 50 में से सिर्फ एक कुंडली में ही देखने में आता है। इस तरह अपने आप को काल सर्प दोष से पीड़ित समझने वाले लोगों में सिर्फ 10 में से 1 या 2 ही इस दोष से असल में पीड़ित होते हैं तथा बाकि के 8-9 लोग व्यर्थ ही अपने आप को इस दोष से पीड़ित समझ कर इस दोष के निवारण के लिए अपना पैसा और समय बर्बाद करते रहते हैं। काल सर्प दोष के बुरे प्रभावों को पूजा, रत्नों तथा ज्योतिष के अन्य उपायों के माध्यम से बहुत हद तक कम किया जा सकता है।

मांगलिक दोष

                                 भारतीय ज्योतिष में मांगलिक दोष की प्रचलित परिभाषा के अनुसार यह माना जाता है कि अगर मंगल ग्रह किसी कुंडली के 1,2,4,7,8 या 12वें भाव में स्थित हो तो उस कुंडली में मांगलिक दोष बन जाता है जिसके कारण कुंडली धारक की शादी में देरी हो सकती है अथवा/और उसके वैवाहिक जीवन में अनेक प्रकार की समस्याएं एवम बाधाएं आ सकती हैं तथा बहुत बुरी हालत में कुंडली धारक के पति या पत्नि की मृत्यु भी हो सकती है। इस गणना के लिए लग्न भाव को पहला भाव माना जाता है तथा वहां से आगे 12 भाव निश्चित किए जाते हैं। उदाहरण के लिए यदि किसी व्यक्ति का लग्न मेष है तो मेष, वृष, कर्क, तुला, वृश्चिक तथा मीन राशि में स्थित होने पर मंगल ग्रह उस व्यक्ति की कुंडली में क्रमश: 1,2,4,7,8 तथा 12वें भाव में आएगा और प्रचलित परिभाषा के अनुसार उस व्यक्ति की कुंडली में मांगलिक दोष बन जाएगा। मांगलिक दोष वाले व्यक्तियों को साधारण भाषा में मांगलिक कहा जाता है।
 
                                                          इस परिभाषा के आधार पर ही अगर मांगलिक दोष बनता हो तो दुनिया में 50 प्रतिशत लोग मांगलिक होंगे क्योंकि कुंडली में कुल 12 ही भाव होते हैं तथा उनमें से उपर बताए गए 6 भावों में मंगल के स्थित होने की संभावना 50 प्रतिशत बनती है। तो इस परिभाषा के अनुसार दुनिया में आधे लोगों के विवाह होने में तथा वैवाहिक जीवन में गंभीर समस्याएं होनी चाहिएं जिनमे तलाक और वैध्वय जैसी स्थितियां भी शामिल हैं। इस दोष के अतिरिक्त पित्र दोष, काल सर्प दोष, नाड़ी दोष, भकूट दोष जैसे कई दोष किसी व्यक्ति के वैवाहिक जीवन में समस्याएं पैदा करने में सक्षम हैं। इन सारी गणनाओं को अगर जोड़ दिया जाए तो दुनिया में कम से कम 80-90 प्रतिशत लोगों के वैवाहिक जीवन में गंभीर समस्याएं हैं जो कि न तो तर्कसंगत लगता है और न ही व्यवहारिक रूप से देखने में आता है। तो इस चर्चा का सार यह निकलता है कि मांगलिक दोष असल व्यवहार में उतनी कुंडलियों में देखने में नहीं आता जितना इसकी प्रचलित परिभाषा के अनुसार बताया जाता है। आइए अब देखें कि कुंडली के 1,2,4,7,8 तथा 12वें भाव में स्थित होने पर मंगल ग्रह क्या क्या संभावनाएं बना सकता है।

                                                         मंगल का कुंडली में उपर बताये 6 भावों में स्थित होना अपने आप में मांगलिक दोष बनाने के लिए पर्याप्त नहीं है तथा इन 6 भावों में स्थित मंगल विभिन्न प्रकार की संभावनाएं बना सकता है। इन भावों में स्थित मंगल वास्तव में मांगलिक दोष बना सकता है, इन भावों में स्थित मंगल कोई भी दोष या योग न बना कर लगभग सुप्त अवस्था में बैठ सकता है तथा इन भावों में स्थित मंगल मांगलिक योग बना सकता है। मांगलिक योग मंगल के द्वारा बनाया जाने वाला एक बहुत ही शुभ योग है जो किसी व्यक्ति के वैवाहिक जीवन को बहुत सुखमय तथा मंगलमय बनाने में पूरी तरह से सक्षम है। यहां पर ध्यान देने योग्य बात यह है कि मांगलिक दोष और मांगलिक योग के फल एक दूसरे से बिल्कुल ही विपरीत होते हैं किन्तु फिर भी ये दोनो योग-दोष मंगल के कुंडली में 1,2,4,7,8 तथा 12वें भाव में स्थित होने से ही बनते हैं। इस लिए मंगल के कुंडली के इन 6 भावों में स्थित होने का मतलब सिर्फ मांगलिक दोष का बनना ही नहीं होता बल्कि मांगलिक योग का बनना भी होता है जो किसी भी व्यक्ति के वैवाहिक जीवन के लिए बहुत मंगलकारी योग है।
 
                                                        इस लिए अगर आपकी कुंडली में मंगल उपर बताये गए 6 भावों में से किसी एक में स्थित है तो आप के लिए यह जान लेना आवश्यक है कि आपकी कुंडली में वास्तव में मांगलिक दोष बनता भी है या नहीं। और अगर आपकी कुंडली में मांगलिक दोष उपस्थित हो भी, तब भी कुछ महत्त्वपूर्ण बातों पर गौर करना बहुत आवश्यक है, जैसे कि कुंडली में यह दोष कितना बलवान है तथा किस आयु पर जाकर यह दोष पूर्ण रूप से जाग्रत होगा। मांगलिक दोष के बुरे प्रभावों को पूजा, रत्नों तथा ज्योतिष के अन्य उपायों के माध्यम से बहुत हद तक कम किया जा सकता है।
 

कुंडली मिलान,

नाड़ी दोष, भकूट दोष

                                                    भारतीय ज्योतिष में विवाह शादी के लिए कुंडली मिलान के लिए गुण मिलान की विधि आज भी सबसे अधिक प्रचलित है। इस विधि के अनुसार वर-वधू की जन्म कुंडलियों में चन्द्रमा की स्थिति के आधार पर निम्नलिखित अष्टकूटों का मिलान किया जाता है।
1)    वर्ण
2)    वश्य
3)    तारा
4)    योनि
5)    ग्रह-मैत्री
6)    गण
7)    भकूट
8)    नाड़ी
                                                               उपरोक्त अष्टकूटों को क्रमश: एक से आठ तक गुण प्रदान किये जाते हैं, जैसे कि वर्ण को एक, नाड़ी को आठ तथा बाकी सबको इनके बीच में दो से सात गुण प्रदान किये जाते हैं। इन गुणों का कुल जोड़ 36 बनता है तथा इन्हीं 36 गुणों के आधार पर कुंडलियों का मिलान सुनिश्चित किया जाता है। 36 में से जितने अधिक गुण मिलें, उतना ही अच्छा कुंडलियों का मिलान माना जाता है। 36 गुण मिलने पर उत्तम, 36 से 30 तक बहुत बढ़िया, 30 से 25 तक बढ़िया तथा 25 से 20 तक सामान्य मिलान माना जाता है। 20 से कम गुण मिलने पर कुंडलियों का मिलान शुभ नहीं माना जाता है।

                                                              किन्तु व्यवहारिक रूप में गुण मिलान की यह विधि अपने आप में पूर्ण नहीं है तथा सिर्फ इसी विधि के आधार पर कुंडलियों का मिलान सुनिश्चित कर देना उचित नहीं है। इस विधि के अनुसार वर-वधू की कुंडलियों में नवग्रहों में से सिर्फ चन्द्रमा की स्थिति ही देखी जाती है तथा बाकी के आठ ग्रहों के बारे में बिल्कुल भी विचार नहीं किया जाता जो किसी भी पक्ष से व्यवहारिक नहीं है क्योंकि नवग्रहों में से प्रत्येक ग्रह का अपना महत्त्व है तथा किसी भी एक ग्रह के आधार पर इतना महत्त्वपूर्ण निर्णय नहीं लिया जा सकता। इस लिए गुण मिलान की यह विधि कुंडलियों के मिलान की विधि का एक हिस्सा तो हो सकती है लेकिन पूर्ण विधि नहीं। आइए अब विचार करें कि एक अच्छे ज्योतिषि को कुंडलियों के मिलान के समय किन पक्षों पर विशेष ध्यान देना चाहिए।

                                                            सबसे पहले एक अच्छे ज्योतिषि को यह देखना चाहिए कि क्या वर-वधू दोनों की कुंडलियों में सुखमय वैवाहिक जीवन के लक्ष्ण विद्यमान हैं या नहीं। उदाहरण के लिए अगर दोनों में से किसी एक कुंडली मे तलाक या वैध्वय का दोष विद्यमान है जो कि मांगलिक दोष, पित्र दोष या काल सर्प दोष जैसे किसी दोष की उपस्थिति के कारण बनता हो, तो बहुत अधिक संख्या में गुण मिलने के बावज़ूद भी कुंडलियों का मिलान पूरी तरह से अनुचित हो सकता है। इसके पश्चात वर तथा वधू दोनों की कुंडलियों में आयु की स्थिति, कमाने वाले पक्ष की भविष्य में आर्थिक सुदृढ़ता, दोनों कुंडलियों में संतान उत्पत्ति के योग, दोनों पक्षों के अच्छे स्वास्थय के योग तथा दोनों पक्षों का परस्पर शारीरिक तथा मानसिक सामंजस्य देखना चाहिए। उपरोक्त्त विष्यों पर विस्तृत विचार किए बिना कुंडलियों का मिलान सुनिश्चित करना मेरे विचार से सर्वथा अनुचित है। इस लिए कुंडलियों के मिलान में दोनों कुंडलियों का सम्पूर्ण निरीक्षण करना अति अनिवार्य है तथा सिर्फ गुण मिलान के आधार पर कुंडलियों का मिलान सुनिश्चित करने के परिणाम दुष्कर हो सकते हैं।

                                                            मैने अपनी ज्योतिष की प्रैक्टिस के दौरान कुंडली मिलान के ऐसे बहुत से केस देखे हैं जिनमें सिर्फ गुण मिलान की विधि से ही 25 से अधिक गुण मिलने के कारण वर-वधू की शादी करवा दी गई तथा कुंडली मिलान के अन्य महत्वपूर्ण पहलुओं पर ध्यान नहीं दिया गया जिसके परिणाम स्वरुप इनमें से बहुत से केसों में शादी के बाद पति पत्नि में बहुत तनाव रहा तथा कुछ केसों में तो तलाक और मुकद्दमें भी देखने को मिले। अगर 28-30 गुण मिलने के बाद भी तलाक, मुकद्दमें तथा वैधव्य जैसी परिस्थितियां देखने को मिलती हैं तो इसका सीधा सा मतलब निकलता है कि गुण मिलान की प्रचलित विधि सुखी वैवाहिक जीवन बताने के लिए अपने आप में न तो पूर्ण है तथा न ही सक्षम। इसलिए इस विधि को कुंडली मिलान की विधि का एक हिस्सा मानना चाहिए न कि अपने आप में एक सम्पूर्ण विधि।

नाड़ी दोष, भकूट दोष

रतीय ज्योतिष में कुंडली मिलान के लिए प्रयोग की जाने वाली गुण मिलान की विधि में मिलाए जाने वाले अष्टकूटों में नाड़ी और भकूट को सबसे अधिक गुण प्रदान किए जाते हैं। नाड़ी को 8 तथा भकूट को 7 गुण प्रदान किए जाते हैं। इस तरह अष्टकूटों के इस मिलान में प्रदान किए जाने वाले 36 गुणों में से 15 गुण केवल इन दो कूटों अर्थात नाड़ी और भकूट के हिस्से में ही आ जाते हैं। इसी से गुण मिलान की विधि में इन दोनों के महत्व का पता चल जाता है। नाड़ी और भकूट दोनों को ही या तो सारे के सारे या फिर शून्य गुण प्रदान किए जाते हैं, अर्थात नाड़ी को 8 या 0 तथा भकूट को 7 या 0 अंक प्रदान किए जाते हैं। नाड़ी को 0 अंक मिलने की स्थिति में वर-वधू की कुंडलियों में नाड़ी दोष तथा भकूट को 0 अंक मिलने की स्थिति में वर-वधू की कुंडलियों में भकूट दोष बन जाता है। भारतीय ज्योतिष में प्रचलित धारणा के अनुसार इन दोनों दोषों को अत्यंत हानिकारक माना जाता है तथा ये दोनों दोष वर-वधू के वैवाहिक जीवन में अनेक तरह के कष्टों का कारण बन सकते हैं और वर-वधू में से किसी एक या दोनों की मृत्यु का कारण तक बन सकते हैं। तो आइए आज भारतीय ज्योतिष की एक प्रबल धारणा के अनुसार अति महत्वपूरण माने जाने वाले इन दोनों दोषों के बारे में चर्चा करते हैं। 

                                                                      आइए सबसे पहले यह जान लें कि नाड़ी और भकूट दोष वास्तव में होते क्या हैं तथा ये दोनों दोष बनते कैसे हैं। नाड़ी दोष से शुरू करते हुए आइए सबसे पहले देखें कि नाड़ी नाम का यह कूट वास्तव में होता क्या है। नाड़ी तीन प्रकार की होती है, आदि नाड़ी, मध्या नाड़ी तथा अंत नाड़ी। प्रत्येक व्यक्ति की जन्म कुंडली में चन्द्रमा की किसी नक्षत्र विशेष में उपस्थिति से उस व्यक्ति की नाड़ी का पता चलता है। नक्षत्र संख्या में कुल 27 होते हैं तथा इनमें से किन्हीं 9 विशेष नक्षत्रों में चन्द्रमा के स्थित होने से कुंडली धारक की कोई एक नाड़ी होती है। उदाहरण के लिए :

चन्द्रमा के निम्नलिखित नक्षत्रों में स्थित होने से कुंडली धारक की आदि नाड़ी होती है :

अश्विनी, आर्द्रा, पुनर्वसु, उत्तर फाल्गुणी, हस्त, ज्येष्ठा, मूल, शतभिषा तथा पूर्व भाद्रपद। 

चन्द्रमा के निम्नलिखित नक्षत्रों में स्थित होने से कुंडली धारक की मध्य नाड़ी होती है :

भरणी, मृगशिरा, पुष्य, पूर्व फाल्गुणी, चित्रा, अनुराधा, पूर्वाषाढ़ा, धनिष्ठा तथा उत्तर भाद्रपद।

चन्द्रमा के निम्नलिखित नक्षत्रों में स्थित होने से कुंडली धारक की अंत नाड़ी होती है :

कृत्तिका, रोहिणी, श्लेषा, मघा, स्वाती, विशाखा, उत्तराषाढ़ा, श्रवण तथा रेवती।

                                                                        गुण मिलान करते समय यदि वर और वधू की नाड़ी अलग-अलग हो तो उन्हें नाड़ी मिलान के 8 में से 8 अंक प्राप्त होते हैं, जैसे कि वर की आदि नाड़ी तथा वधू की नाड़ी मध्या अथवा अंत। किन्तु यदि वर और वधू की नाड़ी एक ही हो तो उन्हें नाड़ी मिलान के 8 में से 0 अंक प्राप्त होते हैं तथा इसे नाड़ी दोष का नाम दिया जाता है। नाड़ी दोष की प्रचलित धारणा के अनुसार वर-वधू दोनों की नाड़ी आदि होने की स्थिति में तलाक या अलगाव की प्रबल संभावना बनती है तथा वर-वधू दोनों की नाड़ी मध्य या अंत होने से वर-वधू में से किसी एक या दोनों की मृत्यु की प्रबल संभावना बनती है। नाड़ी दोष को निम्नलिखित स्थितियों में निरस्त माना जाता है :

यदि वर-वधू दोनों का जन्म एक ही नक्षत्र के अलग-अलग चरणों में हुआ हो तो वर-वधू की नाड़ी एक होने के बावजूद भी नाड़ी दोष नहीं बनता।

यदि वर-वधू दोनों की जन्म राशि एक ही हो किन्तु नक्षत्र अलग-अलग हों तो वर-वधू की नाड़ी एक होने के बावजूद भी नाड़ी दोष नहीं बनता।

यदि वर-वधू दोनों का जन्म नक्षत्र एक ही हो किन्तु जन्म राशियां अलग-अलग हों तो वर-वधू की नाड़ी एक होने के बावजूद भी नाड़ी दोष नहीं बनता।

                                 नाड़ी दोष के बारे में विस्तारपूर्वक जानने के बाद आइए अब देखें कि भकूट दोष क्या होता है। यदि वर-वधू की कुंडलियों में चन्द्रमा परस्पर 6-8, 9-5 या 12-2 राशियों में स्थित हों तो भकूट मिलान के 0 अंक माने जाते हैं तथा इसे भकूट दोष माना जाता है। उदाहरण के लिए मान लीजिए कि वर की जन्म कुंडली में चन्द्रमा मेष राशि में स्थित हैं, अब :

यदि कन्या की जन्म कुंडली में चन्द्रमा कन्या राशि में स्थित हैं तो इसे षड़-अष्टक भकूट दोष का नाम दिया जाता है क्योंकि मेष राशि से गिनती करने पर कन्या राशि छठे तथा कन्या राशि से गिनती करने पर मेष राशि आठवें स्थान पर आती है।

यदि कन्या की जन्म कुंडली में चन्द्रमा धनु राशि में स्थित हैं तो इसे नवम-पंचम भकूट दोष का नाम दिया जाता है क्योंकि मेष राशि से गिनती करने पर धनु राशि नवम तथा धनु राशि से गिनती करने पर मेष राशि पांचवे स्थान पर आती है।

यदि कन्या की जन्म कुंडली में चन्द्रमा मीन राशि में स्थित हैं तो इसे द्वादश-दो भकूट दोष का नाम दिया जाता है क्योंकि मेष राशि से गिनती करने पर मीन राशि बारहवें तथा मीन राशि से गिनती करने पर मेष राशि दूसरे स्थान पर आती है।


                                                                   भकूट दोष की प्रचलित धारणा के अनुसार षड़-अष्टक भकूट दोष होने से वर-वधू में से एक की मृत्यु हो जाती है, नवम-पंचम भकूट दोष होने से दोनों को संतान पैदा करने में मुश्किल होती है या फिर सतान होती ही नहीं तथा द्वादश-दो भकूट दोष होने से वर-वधू को दरिद्रता का सामना करना पड़ता है। भकूट दोष को निम्नलिखित स्थितियों में निरस्त माना जाता है :

यदि वर-वधू दोनों की जन्म कुंडलियों में चन्द्र राशियों का स्वामी एक ही ग्रह हो तो भकूट दोष खत्म हो जाता है। जैसे कि मेष-वृश्चिक तथा वृष-तुला राशियों के एक दूसरे से छठे-आठवें स्थान पर होने के बावजूद भी भकूट दोष नहीं बनता क्योंकि मेष-वृश्चिक दोनों राशियों के स्वामी मंगल हैं तथा वृष-तुला दोनों राशियों के स्वामी शुक्र हैं। इसी प्रकार मकर-कुंभ राशियों के एक दूसरे से 12-2 स्थानों पर होने के बावजूद भी भकूट दोष नहीं बनता क्योंकि इन दोनों राशियों के स्वामी शनि हैं।

यदि वर-वधू दोनों की जन्म कुंडलियों में चन्द्र राशियों के स्वामी आपस में मित्र हैं तो भी भकूट दोष खत्म हो जाता है जैसे कि मीन-मेष तथा मेष-धनु में भकूट दोष नहीं बनता क्योंकि इन दोनों ही उदाहरणों में राशियों के स्वामी गुरू तथा मंगल हैं जो कि आपसे में मित्र माने जाते हैं।

इसके अतिरिक्त अगर दोनो कुंडलियों में नाड़ी दोष न बनता हो, तो भकूट दोष के बनने के बावजूद भी इसका असर कम माना जाता है।

                                                                     किन्तु इन दोषों के द्वारा बतायी गईं हानियां व्यवहारिक रूप से इतने बड़े पैमाने पर देखने में नहीं आतीं और न ही यह धारणाएं तर्कसंगत प्रतीत होती हैं। उदाहरण के लिए नाड़ी दोष लगभग 33 प्रतिशत कुंडलियों के मिलान में देखने में आता है कयोंकि कुल तीन नाड़ियों में से वर और वधू की नाड़ी एक होने की सभावना लगभग 33 प्रतिशत बनती है। इसी प्रकार की गणना भकूट दोष के विषय में भी करके यह तथ्य सामने आता है कि कुंडली मिलान की लगभग 50 से 60 प्रतिशत उदाहरणों में नाड़ी या भकूट दोष दोनों में से कोई एक अथवा दोनों ही उपस्थित होते हैं। और क्योंकि बिना कुंडली मिलाए विवाह करने वाले लोगों में से 50-60 प्रतिशत लोग ईन दोनों दोषों के कारण होने वाले भारी नुकसान नहीं उठा रहे इसलिए इन दोनों दोषों से होने वाली हानियों तथा इन दोनों दोषों की सार्थकता पर प्रश्नचिन्ह लग जाता है। 

                                                                  मेरे अपने अनुभव के अनुसार नाड़ी दोष तथा भकूट दोष अपने आप में दो लोगों के वैवाहिक जीवन में उपर बताई गईं विपत्तियां लाने में सक्षम नहीं हैं तथा इन दोषों और इनके परिणामों को कुंडली मिलान के अन्य महत्वपूर्ण पहलुओं के साथ ही जोड़ कर देखना चाहिए। कुंडली मिलान के इन महत्वपूर्ण पहलुओं के बारे में जानने के लिए कुंडली मिलान नामक लेख पढ़ें। नाड़ी दोष तथा भकूट दोष से होने वाले बुरे प्रभावों को ज्योतिष के विशेष उपायों से काफी हद तक कम किया जा सकता है।

नाड़ी दोष, भकूट दोष

Janam Patrika Kya kehti hai l जन्म पत्रिका क्या कहती है ? l What does your Birth chart Tells?

जन्म पत्रिका बनाना सीखने से पहले हमें जान लेना होगा कि जन्म पत्रिका क्या कहती है व इससे क्या जाना जा सकता है? जन्म पत्रिका वह है, जिसमें जन्म के समय किन ग्रहों की स्थिति किस प्रकार थी व कौन-सी लग्न जन्म के समय थी। जन्म पत्रिका में बारह खाने होते हैं, जो इस प्रकार हैं-

उपरोक्त कुंडली में प्रथम भाव लिया है, उसमें जो भी नंबर हो उसे जन्म लग्न कहते हैं। उदाहरण के तौर पर यदि उस भाव में 1 नंबर है तो मेष लग्न होगा, उसी प्रकार 2 नंबर को वृषभ, 3 नंबर को मिथुन, 4 को कर्क, 5 को सिंह, 6 को कन्या, 7 को तुला, 8 को वृश्चिक, 9 को धनु, 10 को मकर, 11 को कुंभ व 12 नंबर को मीन लग्न कहेंगे। इसी प्रकार पहले घर को प्रथम भाव कहा जाएगा, इसे लग्न भी कहते हैं।

जन्म पत्रिका के अलग-अलग भावों से हमें अलग-अलग जानकारी मिलती है, इसे हम निम्न प्रकार जानेंगे-

प्रथम भाव से हमें शारीरिक आकृति, स्वभाव, वर्ण चिन्ह, व्यक्तित्व, चरित्र, मुख, गुण व अवगुण, प्रारंभिक जीवन विचार, यश, सुख-दुख, नेतृत्व शक्ति, व्यक्तित्व, मुख का ऊपरी भाग, जीवन के संबंध में जानकारी मिलती है। इस भाव से जनस्वास्थ्य, मंत्रिमंडल की परिस्थितियों पर भी विचार जाना जा सकता है।

द्वितीय भाव से हमें कुटुंब के लोगों के बारे में, वाणी विचार, धन की बचत, सौभाग्य, लाभ-हानि, आभूषण, दृष्टि, दाहिनी आँख, स्मरण शक्ति, नाक, ठुड्डी, दाँत, स्त्री की मृत्यु, कला, सुख, गला, कान, मृत्यु का कारण एवं राष्ट्रीय विचार में राजस्व, जनसाधारण की आर्थिक दशा, आयात एवं वाणिज्य-व्यवसाय आदि के बारे में जाना जा सकता है। इस भाव से कैद यानी राजदंड भी देखा जाता है।

तृतीय भाव से भाई, पराक्रम, साहस, मित्रों से संबंध, साझेदारी, संचार-माध्यम, स्वर, संगीत, लेखन कार्य, वक्ष स्थल, फेफड़े, भुजाएँ, बंधु-बांधव। राष्ट्रीय ज्योतिष के लिए रेल, वायुयान, पत्र-पत्रिकाएँ, पत्र व्यवहार, निकटतम देशों की हलचल आदि के बारे में जाना जाता है।

चतुर्थ भाव में माता, स्वयं का मकान, पारिवारिक स्थिति, भूमि, वाहन सुख, पैतृक संपत्ति, मातृभूमि, जनता से संबंधित कार्य, कुर्सी, कुआँ, दूध, तालाब, गुप्त कोष, उदर, छाती, राष्ट्रीय ज्योतिष हेतु शिक्षण संस्थाएँ, कॉलेज, स्कूल, कृषि, जमीन, सर्वसाधारण की प्रसन्नता एवं जनता से संबंधित कार्य एवं स्थानीय राजनीति, जनता के बीच पहचान- यह सब देखा जाता है।

पंचम भाव में विद्या, विवेक, लेखन, मनोरंजन, संतान, मंत्र-तंत्र, प्रेम, सट्टा, लॉटरी, अकस्मात धन लाभ, पूर्वजन्म, गर्भाशय, मूत्राशय, पीठ, प्रशासकीय क्षमता, आय भी जानी जाती है क्योंकि यहाँ से कोई भी ग्रह सप्तम दृष्टि से आय भाव को देखता है।

षष्ठ भाव इस भाव से शत्रु, रोग, ऋण, विघ्न-बाधा, भोजन, चाचा-चाची, अपयश, चोट, घाव, विश्वासघात, असफलता, पालतू जानवर, नौकर, वाद-विवाद, कोर्ट से संबंधित कार्य, आँत, पेट, सीमा विवाद, आक्रमण, जल-थल सैन्य के बारे में जाना जा सकता है।

सप्तम भाव स्त्री से संबंधित, विवाह, सेक्स, पति-पत्नी, वाणिज्य, क्रय-विक्रय, व्यवहार, साझेदारी, मूत्राशय, सार्वजनिक, गुप्त रोग, राष्ट्रीय नैतिकता, वैदेशिक संबंध, युद्ध का विचार भी किया जाता है। इसे मारक भाव भी कहते हैं।

अष्टम भाव से मृत्यु, आयु, मृत्यु का कारण, स्त्री धन, गुप्त धन, उत्तराधिकारी, स्वयं द्वारा अर्जित मकान, जातक की स्थिति, वियोग, दुर्घटना, सजा, लांछन आदि इस भाव से विचार किया जाता है।

नवम भाव से धर्म, भाग्य, तीर्थयात्रा, संतान का भाग्य, साला-साली, आध्यात्मिक स्थिति, वैराग्य, आयात-निर्यात, यश, ख्याति, सार्वजनिक जीवन, भाग्योदय, पुनर्जन्म, मंदिर-धर्मशाला आदि का निर्माण कराना, योजना, विकास कार्य, न्यायालय से संबंधित कार्य जाने जाते हैं।

दशम भाव से पिता, राज्य, व्यापार, नौकरी, प्रशासनिक स्तर, मान-सम्मान, सफलता, सार्वजनिक जीवन, घुटने, संसद, विदेश व्यापार, आयात-निर्यात, विद्रोह आदि के बारे में जाना जाता है। इस भाव से पदोन्नति, उत्तरदायित्व, स्थायित्व, उच्च पद, राजनीतिक संबंध, जाँघें एवं शासकीय सम्मान आदि के बारे में जाना जाता है।

एकादश भाव से मित्र, समाज, आकांक्षाएँ, इच्छापूर्ति, आय, व्यवसाय में उन्नति, ज्येष्ठ भाई, रोग से मुक्ति, टखना, द्वितीय पत्नी, कान, वाणिज्य-व्यापार, परराष्ट्रों से लाभ, अंतरराष्ट्रीय संबंध आदि जाना जाता है।

द्वादश भाव से व्यय, हानि, दंड, गुप्त शत्रु, विदेश यात्रा, त्याग, असफलता, नेत्र पीड़ा, षड्यंत्र, कुटुंब में तनाव, दुर्भाग्य, जेल, अस्पताल में भर्ती होना, बदनामी, भोग-विलास, बायाँ कान, बाईं आँख, ऋण आदि के बारे में जाना जाता है।

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